एस.सी.ई.आर.टी. (SCERT), बिहार के डी.एल.एड. (D.El.Ed.) पाठ्यक्रम के आधिकारिक पत्र "S-5 : विद्यालय में स्वास्थ्य, योग एवं शारीरिक शिक्षा" के तृतीय इकाई "विद्यालय में योग" के चतुर्थ अध्याय "प्राणायाम की समझ" का संपूर्ण प्रामाणिक एवं परीक्षा-उन्मुख विस्तृत नोट्स नीचे दिया गया है।
1. प्रस्तावना: प्राणायाम का दार्शनिक व जैविक संप्रत्यय (Introduction to Pranayama)
विद्यालयी शारीरिक शिक्षा और योग-शास्त्र के अंतर्गत प्राणायाम (Pranayama) को केवल एक सामान्य श्वास प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानव शरीर की सूक्ष्म जैव-ऊर्जा को नियंत्रित करने का एक प्रयोगात्मक विज्ञान माना गया है। महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग (Yama, Niyama, Asana, Pranayama, Pratyahara, Dharana, Dhyana, Samadhi) में प्राणायाम को चौथा विधिक स्तंभ स्वीकार किया गया है।
प्राथमिक स्तर के चंचल मन वाले बच्चों के संदर्भ में, प्राणायाम का अभ्यास उनके संज्ञानात्मक स्कीमा को सक्रिय करने का सर्वोत्कृष्ट जरिया है। जब बच्चे अपनी श्वास गतियों पर विधिक नियंत्रण स्थापित करना सीख जाते हैं, तो उनका मन स्वतः शांत हो जाता है। यह पद्धति बच्चों को रटंत विद्या के कड़े बोझ से मुक्त कर उनके भीतर मस्तिष्क की सजगता और संवेगात्मक सामंजस्य गढ़ती है।
2. प्राणायाम की व्युत्पत्ति: प्राण तथा यम का संप्रत्यय (Concept of Prana & Yama)
शाब्दिक दृष्टिकोण से 'प्राणायाम' शब्द का निर्माण दो विधिक संस्कृत शब्दों के सुगठित संयोजन से हुआ है—'प्राण' तथा 'आयाम' (या यम)। इन दोनों तत्वों का दार्शनिक व व्यावहारिक अर्थ निम्नलिखित रूप में विश्लेषित है:
- क. प्राण का संप्रत्यय (The Concept of Prana): सामान्य भाषा में प्राण का अर्थ केवल 'साँस' (Breathing) से लगाया जाता है, परन्तु योग विज्ञान में प्राण का संप्रत्यय अत्यंत व्यापक है। प्राण वह सर्वव्यापी सूक्ष्म जैविक ऊर्जा (Vital Life Force Force) है जो ब्रह्मांड के साथ-साथ मनुष्य के शरीर के प्रत्येक जीवित कोशिका, ऊतक और तंत्रिका तंत्र को संचालित करती है। साँस इस अदृश्य प्राण शक्ति का स्थूल और प्रत्यक्ष व्यावहारिक स्वरूप है।
- ख. यम / आयाम का संप्रत्यय (The Concept of Yama/Ayama): 'यम' का शाब्दिक अर्थ होता है—'अनुशासन' (Discipline), 'नियमन' (Regulation) या 'विधिक नियंत्रण'। वहीं 'आयाम' का अर्थ होता है—'विस्तार देना' या 'लंबा करना'। अतः तकनीकी रूप से, "साँस की स्वाभाविक गति को अनुशासित करना, उसका विधिक नियमन करना तथा प्राण ऊर्जा को शरीर के भीतर विस्तार देना ही प्राणायाम कहलाता है।" महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में स्पष्ट लिखा है कि आसनों की स्थिरता सिद्ध होने के बाद श्वास और प्रश्वास की गतियों का विधिक विच्छेद ही प्राणायाम है।
3. महर्षि पतंजलि के अनुसार प्राणायाम के 3 मुख्य चरण (3 Phases of Pranayama)
महर्षि पतंजलि के योगसूत्र के प्रामाणिक प्रतिमानों के अनुसार, प्राणायाम की संपूर्ण प्रक्रिया वैज्ञानिक रूप से 3 सुस्पष्ट चरणों (Phases) में संपादित की जाती है। इन चरणों का जैविक और तार्किक विवरण निम्नलिखित है:
1. पूरक (श्वास लेना - Inhalation):
प्राणायाम का प्रथम विधिक चरण पूरक (Puraka) कहलाता है। इसका अर्थ है—बाह्य पर्यावरण से स्वच्छ, शुद्ध और प्राणवायु (ऑक्सीजन) को बिना किसी झटके के, अत्यंत धीमी, नियंत्रित और लयबद्ध गति से नासिका मार्ग द्वारा फेफड़ों के भीतर पूरी तरह भरना। पूरक करते समय उदर (पेट) का प्रसरन होता है और फेफड़ों के अंतिम वायु-कोश (Alveoli) शुद्ध वायु से पूरी तरह आपूरित हो जाते हैं।
2. रेचक (श्वास छोड़ना - Exhalation):
प्राणायाम का द्वितीय विधिक चरण रेचक (Rechaka) कहलाता है। इसका अर्थ है—फेफड़ों के भीतर संचित दूषित वायु (कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य अपशिष्ट गैसों) को अत्यंत शांतिपूर्वक, नियंत्रण के साथ और बिना आवाज किए धीरे-धीरे नासिका मार्ग से बाहर उत्सर्जित करना। रेचक की गति पूरक की तुलना में अधिक धीमी और लंबी होनी अनिवार्य है ताकि फेफड़े पूरी तरह खाली होकर विकारों से कड़ाई से मुक्त हो सकें।
3. कुंभक (वायु-धारण - Retention):
प्राणायाम का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक चरण कुंभक (Kumbhaka) कहलाता है। 'कुंभ' का अर्थ होता है घड़ा; जैसे घड़े में पानी स्थिर रहता है, वैसे ही श्वास को शरीर के किसी हिस्से में स्थिर रखना कुंभक है। यह दो प्रकार से नियोजित होता है:
अ. आन्तरिक कुंभक (Internal Retention): पूरक करने के बाद अर्थात् श्वास को पूरी तरह फेफड़ों में भरकर विधिक रूप से भीतर ही रोक कर रखना।
ब. बाह्य कुंभक (External Retention): रेचक करने के बाद अर्थात् श्वास को पूरी तरह बाहर छोड़कर फेफड़ों को खाली अवस्था में बाहर ही रोक देना।
वैज्ञानिक महत्व: कुंभक के दौरान फेफड़ों में गैसों का विनिमय (Diffusion) चरम पर होता है, जिससे रक्त का शुद्धिकरण तीव्र होता है और कोशिकाओं का प्रोग्रेसिव पुनर्निर्माण (Cell Building) सुदृढ़ होता है।
4. प्राणायाम के चरणों व क्रियाओं का सुसुस्पष्ट एकीकृत सांगठनिक ढांचा
उत्तर लेखन की दृश्यता, तार्किकता और परीक्षा में उच्च प्रामाणिकता सुनिश्चित करने के लिए प्राणायाम के इन 3 चरणों को नीचे एक सरल रॉ-तालिका (बिना किसी सीएसएस के) के माध्यम से संकलित किया गया है:
| क्र.सं. | प्राणायाम का विधिक चरण व नाम | जैविक व क्रियात्मक स्वरूप (Action) | शारीरिक व संज्ञानात्मक प्रोग्रेसिव मूल्य |
|---|---|---|---|
| 1 | पूरक (Puraka) | नासिका मार्ग से शुद्ध ऑक्सीजन को नियंत्रित व लयबद्ध रूप से फेफड़ों में पूरी तरह भरना। | शरीर में प्रचुर ऊर्जा का संचार, फेफड़ों की कार्यक्षमता में वृद्धि। |
| 2 | कुंभक (Kumbhaka) | श्वास को स्वेच्छा से भीतर रोकना (आन्तरिक) या पूरी तरह बाहर छोड़ कर रोकना (बाह्य)। | मस्तिष्क की सजगता (Brain Alertness), तीक्ष्ण ध्यान केंद्रण, न्यूरोप्लास्टिसिटी। |
| 3 | रेचक (Rechaka) | फेफड़ों की दूषित कार्बन डाइऑक्साइड गैस को बिना आवाज किए अत्यंत धीमी गति से बाहर छोड़ना। | तनाव व अवसाद से मुक्ति, विषाक्त पदार्थों व विकारों का पूर्ण निष्कासन। |
| 4 | प्राण + यम का मिलन | श्वास-प्रश्वास की स्वाभाविक गति पर सचेतन व विधिक अनुशासन (Discipline) स्थापित करना। | आत्म-अनुशासन, संवेगात्मक स्थिरता, अटूट आत्मविश्वास गढ़ना। |
5. प्रोग्रेसिव शिक्षक के लिए व्यावहारिक शैक्षिक निहितार्थ
बिहार के प्राथमिक विद्यालयों के रचनावादी यथार्थ में एक प्रगतिशील शिक्षक को प्राणायाम के इन सिद्धांतों को लागू करने के लिए निम्नलिखित प्रोग्रेसिव रणनीतियाँ अपनानी चाहिए:
- 3Rs के स्थान पर 7Rs का प्रोग्रेसिव शिक्षाशास्त्र: शिक्षक को प्राणायाम की कठिन परिभाषाएं रटाने के स्थान पर बच्चों को खेल-खेल में 7Rs (Reading, Writing, Arithmetic, Right, Responsibility, Relationship, Recreation) के रचनावादी मार्ग पर ले जाना चाहिए, जहाँ पूरक-रेचक के समय की गिनती (Ratio) द्वारा बच्चों को व्यावहारिक गणित (Arithmetic) और मनोरंजक क्रिया (Recreation) का एक साथ अनुभव कराया जाए।
- जेंडर रूढ़िवादिता का कड़ा प्रतिवाद (Deconstructing Gender Stereotypes): शिक्षक को यह कड़ाई से सुनिश्चित करना होगा कि चेतना सत्र में प्राणायाम कराते समय कोई जेंडर पूर्वाग्रह न झलके; जैसे—"लड़कियां केवल शांत प्राणायाम करेंगी और लड़के कठिन कुंभक करेंगे।" समावेशी शिक्षा के अंतर्गत छात्र-छात्राओं दोनों को प्रत्येक विधा में समान रूप से भाग लेने और अपनी **Voice and Agency** को सुदृढ़ करने के लोकतांत्रिक अवसर मिलने चाहिए।
- Evaluation का रचनात्मक प्रतिमान (CCE): बच्चों के भीतर प्राणायाम से आने वाले संवेगात्मक परिवर्तनों (जैसे एकाग्रता का बढ़ना, चिड़चिड़ेपन का दूर होना) का मूल्यांकन लिखित परीक्षा से असंभव है। शिक्षक को सतत एवं व्यापक मूल्यांकन (CCE) के तहत बच्चों के दैनिक व्यवहार का सूक्ष्म अवलोकन (Observation) कर प्रोग्रेसिव रिकॉर्ड (पोर्टफोलियो) में दर्ज करना चाहिए।
6. निष्कर्ष (Conclusion)
प्राण (साँस) तथा यम (अनुशासन) का संप्रत्यय, महर्षि पतंजलि के योगसूत्र के अनुसार पूरक, रेचक तथा कुंभक के 3 विधिक चरणों का यह गहन सांगोपांग अध्ययन हमें यह अमूल्य चेतना प्रदान करता है कि "प्राणायाम केवल हवा खींचने की बाह्य कसरत नहीं है, बल्कि यह बच्चों के चंचल मन को अनुशासित करने, उनके संज्ञान को प्रखर करने और उनकी आंतरिक जैव-ऊर्जा को समतामूलक व प्रजातांत्रिक बनाने का सर्वोत्कृष्ट रचनावादी विज्ञान है"। जब एक भावी प्रोग्रेसिव शिक्षक इन विधिक और वैज्ञानिक नियमों को विद्यालय की समय-सारणी और चेतना सत्र का हिस्सा बनाता है; तभी वास्तविक अर्थों में प्रत्येक शिक्षार्थी आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी नागरिक बनता है, और एक प्रबुद्ध भारत की नींव मजबूत होती है।
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