बिहार डी.एल.एड. (D.El.Ed) और बी.एड. (B.Ed) के प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम में पत्र S2 (संज्ञान, सीखना और बाल विकास) के अंतर्गत व्यवहारवादी और सामाजिक-संज्ञानात्मक सिद्धांतों की व्यापक समझ होना परम आवश्यक है। इस पत्र की तृतीय इकाई "सीखने के व्यवहारवादी एवं सूचना प्रसंस्करण सिद्धांतों की समझ" के अंतर्गत अध्याय 7: "अन्य व्यवहारवादी सिद्धांत (थॉर्नडाइक का प्रयत्न एवं भूल, हल का प्रबलन, गुथरी का समीपता, बंडुरा का सामाजिक अधिगम सिद्धांत)" बाल-मनोविज्ञान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विस्तृत अध्याय है। यह अध्याय हमें यह समझने की बहुआयामी दृष्टि देता है कि पशुओं और मनुष्यों में अभ्यास, जैविक आवश्यकताओं, समीपता और सामाजिक अनुकरण के माध्यम से व्यवहार का परिमार्जन कैसे होता है।
---1. एडवर्ड एल. थॉर्नडाइक का प्रयत्न एवं भूल का सिद्धांत (Trial and Error Theory of Learning)
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक एडवर्ड ली थॉर्नडाइक (Edward Lee Thorndike) को प्रथम शैक्षिक मनोवैज्ञानिक (First Educational Psychologist) माना जाता है। उन्होंने वर्ष 1898 में अपने शोध प्रबंध 'Animal Intelligence' में सीखने के एक सुव्यवस्थित सिद्धांत का प्रतिपादन किया, जिसे 'प्रयत्न एवं भूल का सिद्धांत' (Trial and Error Theory) या 'उद्दीपक-अनुक्रिया सिद्धांत' (Stimulus-Response Theory / S-R Theory) कहा जाता है। इसे साहचर्यवाद (Connectionism) भी कहते हैं।
सिद्धांत का मूल दर्शन (Core Philosophy):
थॉर्नडाइक के अनुसार, सीखने की प्रक्रिया में शारीरिक या मानसिक स्तर पर एक उद्दीपक (Stimulus - S) प्राणी के सामने उपस्थित होता है, जिसके कारण वह उसके प्रति अनेक प्रकार की अनुक्रियाएँ (Responses - R) करता है। शुरुआत में ये अनुक्रियाएँ बेतरतीब, त्रुटिपूर्ण और भूलों से भरी होती हैं। परंतु बार-बार प्रयास करने पर प्राणी निरर्थक अनुक्रियाओं को छोड़ देता है और सही अनुक्रिया का चयन करना सीख जाता है। जब उद्दीपक और सही अनुक्रिया के बीच एक मजबूत संबंध बन जाता है, तो उसे S-R बॉण्ड (S-R Bond) या संबंधन कहा जाता है।
थॉर्नडाइक का भूखी बिल्ली पर सुप्रसिद्ध प्रयोग (The Puzzle Box Experiment):
थॉर्नडाइक ने एक भूखी बिल्ली को एक विशेष रूप से निर्मित बक्से में बंद कर दिया जिसे 'पहेली बॉक्स' (Puzzle Box) कहा जाता है। इस बॉक्स का दरवाजा एक खटके या लीवर (Lever) के दबने से खुलता था। बक्से के बाहर बिल्ली को दिखाई देने वाले स्थान पर एक मृत मछली (भोजन) को उद्दीपक के रूप में रख दिया गया।
मछली की गंध पाकर भूखी बिल्ली ने बाहर निकलने के लिए कई प्रकार की क्रियाप्रसूत अनुक्रियाएँ (प्रयत्न व भूल) शुरू कीं; जैसे—सलाखों पर पंजा मारना, बक्से को काटना और दीवारों पर कूदना। इन बेतरतीब गतियों के दौरान अचानक बिल्ली का पैर उस लीवर या खटके पर पड़ गया। खटका दबा, दरवाजा खुला और बिल्ली ने बाहर आकर भोजन प्राप्त कर लिया। थॉर्नडाइक ने इस प्रयोग को कई दिनों तक बार-बार दोहराया। उन्होंने देखा कि प्रत्येक अगले प्रयास में बिल्ली द्वारा की जाने वाली गलतियों (भूलों) की संख्या कम होती गई और बाहर निकलने में लगने वाला समय भी घटता गया। अंततः एक ऐसी स्थिति आई जब बिल्ली को बक्से में बंद करते ही उसने बिना कोई भूल किए सीधे लीवर दबाकर दरवाजा खोलना सीख लिया। यहाँ मछली स्वाभाविक उद्दीपक (S) है और लीवर दबाना सही अनुक्रिया (R) है।
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित सीखने के मुख्य नियम (Primary Laws of Learning):
थॉर्नडाइक ने अपने प्रयोगों के आधार पर सीखने के तीन मुख्य और सार्वभौमिक नियम दिए हैं, जो प्राथमिक शिक्षकों के लिए अचूक मार्गदर्शक हैं:
- 1. तत्परता का नियम (Law of Readiness): यह नियम स्पष्ट करता है कि जब कोई प्राणी किसी कार्य को सीखने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह तैयार या तत्पर होता है, तो वह उसे बहुत तीव्रता और आनंद के साथ सीखता है। यदि छात्र सीखने के लिए तैयार नहीं है, तो जबरन पढ़ाना कुंठा को जन्म देता है।
- 2. अभ्यास का नियम (Law of Exercise): इसके दो उप-नियम हैं—(अ) उपयोग का नियम (Law of Use): यदि किसी सीखे गए कार्य का बार-बार अभ्यास किया जाए, तो S-R बॉण्ड मजबूत होता है। (ब) अनुपयोग का नियम (Law of Disuse): यदि अभ्यास छोड़ दिया जाए, तो संबंध कमजोर हो जाता है और विस्मरण होने लगता है।
- 3. प्रभाव या संतोष का नियम (Law of Effect): यह थॉर्नडाइक का सबसे महत्वपूर्ण नियम है। इसके अनुसार, जिस कार्य को करने से प्राणी को सुख, संतोष या सुखद परिणाम प्राप्त होता है, वह उसे जल्दी सीखता है और दोबारा दोहराना चाहता है। जिस कार्य से दुःख या असंतोष मिलता है, प्राणी उसे छोड़ देता है। यह नियम आधुनिक 'पुनर्बलन' का आधार बना।
2. क्लार्क एल. हल का सबलीकरण या प्रबलन का सिद्धांत (Drive Reduction Theory of Learning)
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक क्लार्क लियोनार्ड हल (Clark L. Hull) ने वर्ष 1943 में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'Principles of Behavior' में सीखने के एक अत्यंत व्यवस्थित और गणितीय सिद्धांत का प्रतिपादन किया, जिसे 'प्रबलन या सबलीकरण का सिद्धांत' (Reinforcement Theory) या 'चालक न्यूनता का सिद्धांत' (Drive Reduction Theory) कहा जाता है। थॉर्नडाइक और स्किनर की तरह हल भी एक कड़े व्यवहारवादी थे, लेकिन उनका सिद्धांत जैविक आवश्यकताओं पर सबसे अधिक बल देता है।
सिद्धांत का मूल दर्शन (Core Philosophy):
हल का मानना था कि कोई भी प्राणी केवल बाह्य उद्दीपक के दिखने से या यांत्रिक अभ्यास से नहीं सीखता, बल्कि सीखने की मूल प्रेरणा उसकी अपनी जैविक आवश्यकताएँ (Biological Needs) होती हैं। जब शरीर में किसी चीज़ की कमी होती है, तो एक 'आवश्यकता' (Need) पैदा होती है। यह आवश्यकता प्राणी के भीतर एक मानसिक और शारीरिक तनाव पैदा करती है, जिसे 'चालक' (Drive) कहा जाता है (जैसे—भोजन की कमी से 'भूख' नामक चालक पैदा होता है)।
इस तनाव या चालक को शांत करने के लिए प्राणी वातावरण में अनेक गतियाँ और अनुक्रियाएँ करता है। जब किसी अनुक्रिया से प्राणी को वह वस्तु प्राप्त हो जाती है जिससे उसकी जैविक आवश्यकता पूरी हो जाए, तो उसका चालक कम हो जाता है। इसे ही चालक न्यूनता (Drive Reduction) या सबलीकरण कहा जाता है। हल के अनुसार, जिस अनुक्रिया से प्राणी की आवश्यकता की पूर्ति होती है, प्राणी केवल उसी अनुक्रिया को सीखता है।
हल का चूहों पर प्रयोगात्मक अध्ययन:
हल ने भूलभुलैया (Maze) में भूखे चूहों को छोड़कर यह सिद्ध किया कि चूहों के दौड़ने की गति और सही रास्ता खोजने की क्षमता इस बात पर निर्भर करती थी कि वे कितने भूखे थे (चालक की तीव्रता) और उन्हें भूलभुलैया के अंत में मिलने वाला भोजन उनकी भूख को कितनी संतुष्टि प्रदान करता था। यदि चूहा भूखा न हो, तो वह सीखने के लिए कोई अनुक्रिया नहीं करेगा।
हल के सिद्धांत का तार्किक अनुक्रम सूत्र:
$$\text{आवश्यकता (Need)} \longrightarrow \text{चालक (Drive)} \longrightarrow \text{सक्रियता (Action)} \longrightarrow \text{आवश्यकता पूर्ति (Reinforcement)} \longrightarrow \text{चालक न्यूनता (Drive Reduction)} \longrightarrow \text{अधिगम/सीखना}$$
---3. एडविन आर. गुथरी का समीपता का सिद्धांत (Contiguity Theory of Learning)
अमेरिकी व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिक एडविन रे गुथरी (Edwin R. Guthrie) ने वर्ष 1935 में अपनी पुस्तक 'The Psychology of Learning' में सीखने के एक अत्यंत सरल और अनोखे सिद्धांत का प्रतिपादन किया, जिसे 'समीपता का सिद्धांत' (Contiguity Theory) या 'एकल प्रयास अधिगम' (One-Trial Learning) कहा जाता है। गुथरी का सिद्धांत थॉर्नडाइक के अभ्यास के नियम और स्किनर के पुनर्बलन (पुरस्कार) के नियमों का कड़ा खंडन करता है।
सिद्धांत का मूल दर्शन (Core Philosophy):
गुथरी के अनुसार, सीखने के लिए किसी पुरस्कार, भोजन या बार-बार के अभ्यास की कोई आवश्यकता नहीं होती है। उनके सिद्धांत की मूल स्थापना यह है कि यदि कोई उद्दीपक (Stimulus) और कोई अनुक्रिया (Response) समय और स्थान के स्तर पर एक-दूसरे के अत्यधिक 'समीप' (Contiguous) घटित होते हैं, तो उनके बीच केवल एक ही प्रयास में अनुबंधन स्थापित हो जाता है। यानी प्राणी अपने पहले ही सफल प्रयास (One-Trial) में पूरी तरह सीख लेता है।
गुथरी ने स्पष्ट किया कि थॉर्नडाइक के प्रयोग में बिल्ली को लीवर दबाना सीखने में कई प्रयास इसलिए लगे क्योंकि बक्से का वातावरण जटिल था और लीवर दबाने व दरवाजा खुलने के बीच कई कड़ियाँ थीं। यदि उद्दीपक और अनुक्रिया के बीच पूर्ण समीपता हो, तो साहचर्य तुरंत बन जाता है। गुथरी के अनुसार, पुरस्कार या भोजन केवल पुरानी आदत को टूटने से बचाता है, वह नया व्यवहार नहीं सिखाता।
गुथरी और होर्ट का बिल्लियों पर प्रयोग (The Guthrie-Horton Experiment):
गुथरी और होर्ट ने लगभग 800 से अधिक बिल्लियों पर एक पहेली बॉक्स में प्रयोग किया। उन्होंने देखा कि जब बिल्ली बक्से में बंद होती थी, तो वह जिस विशिष्ट शारीरिक मुद्रा या तरीके (जैसे—अपनी पूँछ से लीवर को छूना या पीठ रगड़ना) से पहली बार लीवर दबाकर बाहर निकलती थी, अगली बार बक्से में रखने पर वह हूबहू उसी विशिष्ट शारीरिक गामक पैटर्न को दोहराती थी। यह सिद्ध करता है कि उद्दीपक और उस अंतिम अनुक्रिया के बीच की **समीपता** ही सीखने का एकमात्र आधार है।
---4. अल्बर्ट बंडुरा का सामाजिक अधिगम सिद्धांत (Social Learning Theory)
कनाडा के मूल निवासी और अमेरिकी मनोवैज्ञानिक अल्बर्ट बंडुरा (Albert Bandura) ने वर्ष 1977 में व्यवहारवाद और संज्ञानात्मक मनोविज्ञान के बीच एक मजबूत सेतु का निर्माण किया, जिसे 'सामाजिक अधिगम सिद्धांत' (Social Learning Theory) कहा जाता है। वर्ष 1986 में उन्होंने इसका नाम बदलकर 'सामाजिक संज्ञानात्मक सिद्धांत' (Social Cognitive Theory) रख दिया। बंडुरा ने व्यवहारवादियों की इस बात को खारिज किया कि मनुष्य केवल प्रयोगशाला के चूहों की तरह पुरस्कार और दण्ड के प्रभाव में यांत्रिक रूप से सीखता है।
सिद्धांत का मूल दर्शन (Core Philosophy):
बंडुरा के अनुसार, मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसके सीखने का अधिकांश भाग समाज में रहने वाले अन्य व्यक्तियों, बड़ों, माता-पिता, शिक्षकों और मीडिया के नायकों के व्यवहारों का बारीकी से निरीक्षण या प्रेक्षण (Observation) करने और उनका अनुकरण (Imitation) करने से संपन्न होता है। बंडुरा ने जिन व्यक्तियों के व्यवहार का अनुकरण किया जाता है, उन्हें 'मॉडल' (Model) या प्रतिरूप कहा। इसलिए इस सिद्धांत को 'प्रेक्षणात्मक अधिगम' (Observational Learning) या 'प्रतिरूपण' (Modeling) भी कहा जाता है।
सुप्रसिद्ध 'बोबो डॉल' प्रयोग (The Famous Bobo Doll Experiment):
बंडुरा ने बच्चों के तीन अलग-अलग समूहों पर एक ऐतिहासिक प्रयोग किया। उन्होंने बच्चों को एक बंद कमरे में एक लघु फिल्म (Video Clip) दिखाई, जिसमें एक बड़े कमरे में कई खिलौने रखे थे और उनके बीच एक बड़ा हवा से भरा प्लास्टिक का जोकर रखा था जिसे 'बोबो डॉल' (Bobo Doll) कहा जाता है। एक वयस्क व्यक्ति कमरे में आता है और उस बोबो डॉल के साथ अत्यधिक हिंसक व्यवहार करता है, उसे मुक्के मारता है, उसे नीचे गिराता है और डंडे से पीटता है। बंडुरा ने इस फिल्म के अंत को तीन अलग-अलग रूपों में तीनों समूहों को दिखाया:
- समूह 1 के लिए: फिल्म के अंत में उस हिंसक व्यक्ति को बहुत बड़ा पुरस्कार और शाबाशी दी जाती है।
- समूह 2 के लिए: फिल्म के अंत में उस हिंसक व्यक्ति को समाज द्वारा कड़ा दण्ड और प्रताड़ना दी जाती है।
- समूह 3 के लिए: फिल्म के अंत में न तो कोई पुरस्कार दिया जाता है और न ही कोई दण्ड (तटस्थ परिणाम)।
फिल्म देखने के बाद बंडुरा ने तीनों समूहों के बच्चों को एक-एक करके एक ऐसे ही संसाधन कक्ष में छोड़ दिया जहाँ एक हूबहू बोबो डॉल और पिटने वाले खिलौने रखे थे। बंडुरा ने एक छिपे हुए शीशे से बच्चों के व्यवहार का अवलोकन किया। परिणाम अत्यंत क्रांतिकारी था—जिन बच्चों ने आक्रामक व्यवहार पर पुरस्कार पाने वाली फिल्म देखी थी (समूह 1), उन्होंने कमरे में जाते ही बोबो डॉल पर टूट पड़ना और उसे कड़े मुक्के मारना शुरू कर दिया। जिन बच्चों ने दण्ड वाली फिल्म देखी थी (समूह 2), उन्होंने जोकर के प्रति कोई आक्रामकता नहीं दिखाई। यह प्रयोग पूरी तरह सिद्ध करता है कि बच्चे समाज में केवल देखकर और मॉडलों के परिणामों का प्रेक्षण करके ही अपने व्यवहार का ताना-बाना बुनते हैं। इसे बंडुरा ने 'प्रतिनिधिक पुनर्बलन' (Vicarious Reinforcement) का नाम दिया।
प्रेक्षणात्मक अधिगम के चार अनिवार्य क्रमिक चरण (4 Steps of Modeling Process):
बंडुरा ने स्पष्ट किया कि किसी मॉडल को देखकर व्यवहार को अपने भीतर आत्मसात करने के लिए छात्र के मस्तिष्क को चार अनिवार्य मानसिक चरणों से क्रमिक रूप से गुजरना पड़ता है, जिनका अनुक्रम परीक्षाओं के लिए अति महत्वपूर्ण है:
- 1. अवधान या ध्यान देना (Attention): किसी भी व्यवहार का अनुकरण करने के लिए सबसे पहली शर्त यह है कि छात्र उस मॉडल की क्रियाओं पर सचेत होकर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करे। यदि मॉडल आकर्षक, प्रसिद्ध, या शक्तिशाली (जैसे—शिक्षक या कोई लोकप्रिय अभिनेता) हो, तो अवधान बहुत तेजी से आकर्षित होता है।
- 2. धारणा या प्रतिधारण (Retention): ध्यान से देखे गए व्यवहार, कड़ियों और दृश्यों को अपने मस्तिष्क में सूचना के रूप में संचित करना, उसकी एक मानसिक प्रतिमा (Mental Image) बनाना या भाषाई कोड के रूप में कूटबद्ध करके अपनी स्मृति फाइलों में सुरक्षित रखना धारणा कहलाता है।
- 3. पुनः प्रस्तुतीकरण या उत्पादन (Production / Reproduction): मस्तिष्क में सुरक्षित रखी गई उस मानसिक छवि या स्मृति को आवश्यकता पड़ने पर स्वयं अपने शारीरिक अंगों और मांसपेशियों के संयोजन द्वारा बाह्य जगत में हूबहू क्रिया के रूप में प्रकट करना उत्पादन कहलाता है। इसके लिए गामक परिपक्वता अनिवार्य है।
- 4. अभिप्रेरणा या अनुबलन (Motivation / Reinforcement): छात्र ने व्यवहार सीख तो लिया है, लेकिन वह उसे भविष्य में दोबारा प्रदर्शित करेगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसे उस व्यवहार को करने पर कैसा पुनर्बलन या अभिप्रेरणा प्राप्त होती है। यदि समाज उसकी तारीफ करता है, तो वह व्यवहार स्थायी हो जाता है; यदि डाँट मिलती है, तो छात्र उसे छोड़ देता है।
5. चारों सिद्धांतों का कड़ा तुलनात्मक वैज्ञानिक विमर्श
डी.एल.एड. और बी.एड. के प्रशिक्षुओं की परीक्षाओं में उत्तर लेखन की सुस्पष्टता के लिए इस अध्याय के चारों सिद्धांतों के मुख्य अंतरों को नीचे एक सरल रॉ-तालिका (बिना किसी सीएसएस के) के माध्यम से वर्गीकृत किया गया है:
| सिद्धांत का नाम | मूल प्रवर्तक (Pioneer) | सीखने का मुख्य आधार / रीढ़ | प्रयोग का मुख्य जीव | |
|---|---|---|---|---|
| प्रयत्न एवं भूल का सिद्धांत | एडवर्ड एल. थॉर्नดाइक | निरंतर कड़ा अभ्यास, भूलों में क्रमिक सुधार और S-R बॉण्ड का सुदृढ़ीकरण। | एक भूखी बिल्ली (पहेली बॉक्स में)। | यह सिद्धांत गणित, विज्ञान, हस्तशिल्प और शुद्ध हस्तलेखन के विकास में अत्यधिक उपयोगी माना जाता है। |
| प्रबलन या सबलीकरण सिद्धांत | क्लार्क एल. हल | प्राणी की जैविक आवश्यकताएँ और चालक न्यूनता (Drive Reduction) की तृप्ति। | भूखे और प्यासे चूहे (भूलभुलैया में)। | यह सिद्धांत कक्षा कक्ष में स्पष्ट उद्देश्यों, प्रेरणा और आंतरिक आवश्यकताओं की पूर्ति पर बल देता है। |
| समीपता का सिद्धांत | एडविन आर. गुथरी | उद्दीपकों और अनुक्रियाओं के बीच समय और स्थान की पूर्ण समीपता (Contiguity)। | सैकड़ों बिल्लियाँ (गुथरी-होर्ट बॉक्स में)। | यह सिद्धांत पुरानी बुरी आदतों को तोड़ने और एकल प्रयास द्वारा त्वरित अनुबंधन गढ़ने में सहायक है। |
| सामाजिक अधिगम सिद्धांत | अल्बर्ट बंडुरा | सामाजिक मॉडलों का प्रेक्षण (Observation), मानसिक कूटसंकेतन और अनुकरण। | मानव शिशु / बच्चे (बोबो डॉल फिल्म प्रयोग)। | यह सिद्धांत बच्चों में नैतिक विकास, सामाजिक आदतों और व्यक्तित्व निर्माण में शिक्षकों के लिए सर्वोत्तम है। |
6. इन व्यवहारवादी सिद्धांतों की समकालीन सीमाएँ और आलोचनाएँ (Critical Analysis)
आधुनिक संज्ञानात्मक, रचनावादी और प्रोग्रेसिव शिक्षाविदों द्वारा इन पारंपरिक सिद्धांतों की निम्नलिखित कड़ियाँ दिखाकर आलोचना की गई है:
- थॉर्नडाइक, हल और गुथरी के सिद्धांतों का विकास प्रयोगशाला के बंद, संकीर्ण और कृत्रिम वातावरण में चूहों, बिल्लियों और भूखे पशुओं पर प्रयोग करके किया गया था। इन विवेकहीन पशुओं के यांत्रिक निष्कर्षों को एक अत्यंत संवेदनशील, सामाजिक, और संज्ञानात्मक रूप से समृद्ध मानव शिशु पर हूबहू थोपना पूरी तरह अमानवीय और अतार्किक माना जाता है।
- व्यवहारवाद ने बच्चों को केवल पर्यावरण के थपेड़े खाने वाला एक निष्क्रिय 'खाली बर्तन' या जैविक रोबोट मान लिया, जो केवल भूख शांत करने के लिए या बाह्य पुरस्कार के लालच में क्रिया करता है। यह बालकों की अपनी स्वतंत्र सोच, सृजनात्मकता, मौलिकता, और सूझबूझ (Insight) जैसी उच्च मानसिक शक्तियों की पूरी उपेक्षा करता है।
- आलोचकों का मानना है कि बंडुरा का सिद्धांत यद्यपि संज्ञानात्मक पक्षों को शामिल करता है, फिर भी यह बच्चों के जैविक और आनुवंशिक विकास की गतियों को पूरी तरह न्याय नहीं दे पाता।
7. शिक्षकों के लिए इस अध्याय के व्यावहारिक शैक्षिक निहितार्थ (Educational Implications)
तमाम समकालीन आलोचनाओं के बावजूद, प्राथमिक और उच्च प्राथमिक कक्षाओं के कक्षा कक्ष प्रबंधन (Classroom Management), नैतिक शिक्षा, और बुनियादी कौशलों के विकास में इन चारों सिद्धांतों का ज्ञान शिक्षकों के लिए एक वरदान की तरह काम करता है:
- थॉर्नडाइक के नियमों द्वारा कक्षा कक्ष का संचालन (Application of Thorndike's Laws):
- तत्परता: एक शिक्षक को कक्षा में सीधे नया कठिन पाठ पढ़ाना शुरू नहीं करना चाहिए। शिक्षक को 'प्रस्तावना प्रश्नों' या टीएलएम (TLM) के प्रयोग द्वारा सबसे पहले बच्चों को मानसिक रूप से सीखने के लिए तैयार (Ready) करना चाहिए।
- अभ्यास: भाषा के अक्षरों की शुद्ध बनावट, वर्तनी, गणितीय पहाड़े (Tables) और हस्तशिल्प के कौशलों को पुख्ता करने के लिए प्राथमिक कक्षाओं में सुसंगत पुनरावृत्ति और निरंतर अभ्यास को स्थान दिया जाना चाहिए।
- प्रभाव का नियम: शिक्षक को बच्चों के सही उत्तरों पर तुरंत धनात्मक प्रतिपुष्टि (जैसे—पुरस्कार, शाबाशी) देनी चाहिए ताकि संतोष की प्राप्ति से उनका अधिगम स्थायी हो सके।
- हल के सिद्धांत द्वारा प्रेरणा का संवर्धन (Application of Hull's Theory): यह सिद्धांत शिक्षकों को यह कड़ा निर्देश देता है कि बच्चों को बिना किसी उद्देश्य या आवश्यकता के जबरन कोई तथ्य न रटवाया जाए। शिक्षक को विषय-वस्तु को बच्चों की वास्तविक दैनिक जीवन की आवश्यकताओं के साथ जोड़कर प्रस्तुत करना चाहिए, जिससे छात्रों के भीतर सीखने की 'आंतरिक तड़प या चालक' पैदा हो सके। जब छात्र अपनी आवश्यकता देखेगा, तो वह स्वयं सक्रिय होकर सीखेगा।
- गुथरी के सिद्धांत द्वारा बुरी आदतों का परिमार्जन (Application of Guthrie's Theory): गुथरी ने पुरानी अवांछित आदतों को तोड़ने और उनके स्थान पर अच्छी आदतें गढ़ने के लिए तीन व्यावहारिक मनोवैज्ञानिक प्रविधियाँ दी हैं, जिन्हें एक प्रगतिशील शिक्षक को अवश्य अपनाना चाहिए:
- थकान विधि (Exhaustion Method): अवांछित कार्य को बच्चे से इतनी बार लगातार करवाया जाए कि उसका शरीर बुरी तरह थक जाए और वह स्वयं उस क्रिया से नफरत करने लगे (जैसे—दीवार पर लिखने वाले बच्चे को तब तक लिखवाया जाए जब तक उंगलियाँ थक न जाएँ)।
- दहलीज विधि (Threshold Method): अवांछित उद्दीपक की मात्रा को इतनी धीमी और सूक्ष्म गति से बच्चे के सामने लाया जाए कि उसका तंत्रिका तंत्र बिना किसी डर या चिड़चिड़ाहट के उसे धीरे-धीरे सहन करना सीख जाए (जैसे—अंधेरे या किसी जानवर से डरने वाले बच्चे का डर धीरे-धीरे दूर करना)।
- परस्पर विरोधी उद्दीपन विधि (Incompatible Response Method): अवांछित उद्दीपक के साथ कोई ऐसा दूसरा अत्यंत शक्तिशाली और सुखद उद्दीपक जोड़ दिया जाए जिसके कारण बच्चा पुरानी बुरी अनुक्रिया छोड़कर नई अच्छी अनुक्रिया करने पर विवश हो जाए (जैसे—पढ़ाई से भागने वाले बच्चे को कार्टून या शैक्षणिक खेलों के माध्यम से पढ़ाना)।
- बंडुरा के सिद्धांत द्वारा नैतिक व सामाजिक विकास (Application of Bandura's Theory): यह सिद्धांत वर्तमान समावेशी शिक्षा में सबसे क्रांतिकारी भूमिका निभाता है:
- शिक्षकResource के रूप में आदर्श मॉडल: चूंकि बच्चे अनुकरण द्वारा सबसे तेजी से सीखते हैं, इसलिए एक शिक्षक को कक्षा कक्ष के भीतर और बाहर अपना चरित्र, भाषा, पहनावा, और सामाजिक व्यवहार अत्यंत उच्च, सुसंस्कृत और मर्यादित रखना चाहिए। शिक्षक ही बच्चों का सबसे बड़ा 'जीवंत मॉडल' (Live Model) होता है। यदि शिक्षक स्वयं जोर से चिल्लाएगा या अभद्र भाषा बोलेगा, तो बच्चे भी वही सीखेंगे।
- दृश्य-श्रव्य मीडिया और रोल-प्ले का विवेकपूर्ण उपयोग: विद्यालय की प्रार्थना सभाओं या कक्षाओं में महापुरुषों (जैसे—महात्मा गांधी, डॉ. आंबेडकर, स्वामी विवेकानंद) की जीवनियों पर आधारित नाटकों, रोल-प्ले (भूमिका निर्वहन), और प्रेरणादायक लघु फिल्मों का प्रदर्शन करना चाहिए। जब बच्चे इन चरित्रों के सकारात्मक सामाजिक परिणामों का प्रेक्षण करते हैं, तो उनके भीतर नैतिकता, सहानुभूति, देशभक्ति, और करुणा जैसे मानवीय भावात्मक मूल्यों का उदात्तीकरण अत्यंत सुगमता से हो जाता है।
- कुप्रथाओं और हिंसा से बचाव: यह सिद्धांत अभिभावकों और शिक्षकों को यह कड़ा सचेत करता है कि बच्चों के सामने किसी भी प्रकार की घरेलू हिंसा, कड़े गाली-गलौज, या टीवी/मोबाइल पर अत्यधिक मारधाड़ वाले हिंसक वीडियो गेम न परोसे जाएं, क्योंकि बच्चे प्रतिनिधियों के रूप में उन आक्रामक व्यवहारों को बहुत बारीकी से आत्मसात कर लेते हैं और अपने वास्तविक व्यवहार में आक्रामक बन जाते हैं।
निष्कर्ष (Conclusion):
इन अन्य व्यवहारवादी और सामाजिक अधिगम सिद्धांतों का यह गहन और विस्तृत सैद्धांतिक विश्लेषण हमें यह समृद्ध चेतना प्रदान करता है कि बच्चों के व्यवहार का परिमार्जन और उनका अधिगम किसी एक ढर्रे या एकाकी नियम से संचालित नहीं होता है। थॉर्नडाइक जहाँ हमें कड़े अभ्यास और संतोष के नियमों की ताकत दिखाते हैं, हल हमें जैविक आवश्यकताओं की तड़प से परिचित कराते हैं, गुथरी हमें समीपता की त्वरित कड़ियों द्वारा आदतें बदलना सिखाते हैं, तो वहीं बंडुरा हमें यह अमूल्य सामाजिक दृष्टि देते हैं कि बच्चे अपने परिवेश के मॉडलों को देखकर कैसे अपने चरित्र का निर्माण करते हैं।
एक भावी डी.एल.एड./बी.एड. प्रगतिशील और संवेदनशील शिक्षक के रूप में, आपका यह प्राथमिक उत्तरदायित्व है कि आप मैकाले की पारंपरिक शुष्क और डंडे वाली रटंत प्रणालियों को समूल नष्ट करें। जब आप अपनी समावेशी कक्षा की दैनिक प्रविधियों में थॉर्नडाइक की तत्परता, हल की आवश्यकता-उन्मुख अभिप्रेरणा, गुथरी के व्यवहार परिमार्जन और बंडुरा के सामाजिक प्रतिरूपण (Modeling) के सिद्धांतों का एक सुंदर और मानवीय समन्वय स्थापित करेंगे, तभी प्रत्येक शिक्षार्थी को अपनी अनूठी क्षमता के साथ फलने-फूलने का एक समतामूलक, भयमुक्त और लोकतांत्रिक अवसर प्राप्त हो सकेगा, जिससे राष्ट्र निर्माण का वास्तविक मानवीय स्वप्न साकार हो सकेगा।
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