बिहार डी.एल.एड. (D.El.Ed) और बी.एड. (B.Ed) के प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम में पत्र S2 (संज्ञान, सीखना और बाल विकास) के अंतर्गत मूल्यांकन और आकलन की रणनीतियों का विशेष महत्व है। इस पत्र की द्वितीय इकाई "बाल विकास एवं सीखना" के अंतर्गत अध्याय 5: "आकलन के बदलते प्रतिमान: सीखने का आकलन (Assessment of Learning) एवं सीखने के लिए आकलन (Assessment for Learning) की रचनात्मक प्रकृति" शैक्षणिक सुधारों की दिशा में एक क्रांतिकारी विषय है। पारंपरिक परीक्षा प्रणाली ने बच्चों में जो डर पैदा किया था, उसे दूर करने के लिए आधुनिक शिक्षाशास्त्र में आकलन के प्रतिमानों (Paradigms of Assessment) को पूरी तरह बदल दिया गया है।
---1. आकलन के बदलते प्रतिमान: एक परिचयात्मक विमर्श (Changing Paradigms of Assessment)
पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था में मूल्यांकन का सीधा और एकमात्र अर्थ 'परीक्षा' (Examination) से लगाया जाता था। साल के अंत में तीन घंटे की एक लिखित परीक्षा ली जाती थी, जिसके अंकों के आधार पर बच्चों को 'पास' या 'फेल', 'तेज' या 'मूर्ख' की श्रेणियों में विभाजित कर दिया जाता था। इस पुरानी व्यवस्था में बच्चों के सीखने की प्रक्रिया पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था, बल्कि केवल उनके द्वारा रटे गए तथ्यों (Information) की मात्रा को ही सफलता का पैमाना माना जाता था।
परंतु आधुनिक बाल-मनोविज्ञान, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF 2005) और शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE 2009) ने इस संकुचित दृष्टिकोण को पूरी तरह बदल दिया है। वर्तमान समकालीन संदर्भ में यह माना जाता है कि आकलन केवल बच्चों की ग्रेडिंग करने का साधन नहीं है, बल्कि यह शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का एक अभिन्न और जीवंत हिस्सा है। इसी वैचारिक बदलाव के कारण आकलन के दो मुख्य प्रतिमान हमारे सम्मुख उभरकर आते हैं:
- सीखने का आकलन (Assessment of Learning)
- सीखने के लिए आकलन (Assessment for Learning)
इन दोनों प्रतिमानों की प्रकृति, उद्देश्यों और क्रियान्वयन के तरीकों को समझे बिना कोई भी शिक्षक अपनी कक्षा कक्ष में वास्तविक और प्रगतिशील अधिगम का माहौल तैयार नहीं कर सकता।
---2. सीखने का आकलन (Assessment of Learning)
सीखने का आकलन मूल्यांकन के पारंपरिक, योगात्मक (Summative Assessment) और व्यवहारवादी प्रकृति की ओर संकेत करता है। यह प्रक्रिया तब अपनाई जाती है जब शिक्षण-अधिगम का कार्य पूरी तरह समाप्त हो चुका होता है।
मूल दर्शन एवं मुख्य विशेषताएं:
- उपलब्धि का मापन: इसके अंतर्गत मुख्य रूप से बच्चों के सीखने की अंतिम उपलब्धि (Achievement) का आकलन किया जाता है। इसका मुख्य प्रयोजन यह जाँचना होता है कि बच्चे ने क्या सीखा है और कितना सीखा है?
- पूर्वनिर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति: यह इस बात की समीक्षा करता है कि पूर्व निर्धारित शिक्षण उद्देश्यों तथा अपेक्षित सीखने के परिणामों (Learning Outcomes) की पूर्ति किस सीमा तक हुई है।
- प्रक्रिया पर नियंत्रण का अभाव: इस आकलन में बच्चे के सीखने की आंतरिक प्रक्रिया पर शिक्षक या छात्र का कोई नियंत्रण नहीं होता। यह केवल अंतिम उत्पाद (Product) को मापता है।
- संज्ञानात्मक और क्रियात्मक पक्षों तक सीमित: यह मुख्यतः बच्चे के सीखने के केवल संज्ञानात्मक (रटने या लिखने की क्षमता) और क्रियात्मक पक्षों का ही आकलन करता है। इसमें सीखने के भावात्मक आयामों (भावनाओं, आदतों, दृष्टिकोणों) के आकलन की कोई समुचित व्यवस्था नहीं होती।
- पाठ्य सहगामी क्रियाओं की उपेक्षा: यह केवल अकादमिक या किताबी ज्ञान को ही महत्व देता है और खेलकूद, कला, संगीत जैसे सह-शैक्षणिक क्षेत्रों की पूरी तरह उपेक्षा करता है।
सीखने के आकलन की सीमाएँ और कमियाँ:
यह आकलन यह बताने में पूरी तरह असमर्थ होता है कि बच्चा कैसे सीखता है? उसके सीखने की व्यक्तिगत शैली क्या है? वह अपने किस विशिष्ट संज्ञानात्मक स्रोत का उपयोग सीखने के लिए करता है? इसके कारण कक्षाओं में रटने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है और बच्चों के मन में मूल्यांकन की प्रक्रिया के प्रति हमेशा एक गहरा भय, तनाव और कुंठा का भाव बना रहता है। इसमें शिक्षण गतिविधियों में गुणात्मक सुधार के लिए आवश्यक प्रतिपुष्टि (Feedback) का कोई अवसर उपलब्ध नहीं होता।
---3. सीखने के लिए आकलन (Assessment for Learning)
सीखने के लिए आकलन मूल्यांकन के निर्माणवादी (Constructivist), रचनात्मक (Formative Assessment) और निदानात्मक (Diagnostic) प्रकृति की ओर संकेत करता है। यह ऐसी आधुनिक व्यवस्था है जो वस्तुतः बच्चों को प्रभावशाली ढंग से सिखाने के लिए ही आयोजित की जाती है।
मूल दर्शन एवं मुख्य विशेषताएं:
- प्रक्रिया पर विशेष ध्यान: इसके अंतर्गत बच्चों के अंतिम अंकों के बजाय उनके सीखने की निरंतर प्रक्रिया (Process of Learning) पर सबसे अधिक ध्यान दिया जाता है।
- समग्रता की समझ: यह समानांतर रूप से तीन बड़े प्रश्नों का उत्तर खोजता है—बच्चा क्या सीखता है? कितना सीखता है? और सबसे महत्वपूर्ण कि वह कैसे सीखता है?
- शैली और मौलिकता की पहचान: यह बच्चे के सीखने के तरीके या उसकी विशिष्ट शैली को पहचानता है। इसके द्वारा यह परखा जाता है कि बच्चे के विचारों, स्पष्टीकरणों और प्रस्तुतीकरणों में कितनी नवीनता, सृजनात्मकता और मौलिकता है।
- निदानात्मक प्रकृति: इससे शिक्षक को यह सटीक पता चलता है कि बच्चा यदि किसी अवधारणा को समझ नहीं पा रहा, तो उसके पीछे क्या कठिनाई है? शिक्षण-सीखने की प्रक्रिया में क्या तात्कालिक सुधार और बदलाव लाए जाएं जिससे कक्षा का प्रत्येक बच्चा आसानी से सीख सके?
सीखने के लिए आकलन की रचनात्मक प्रकृति:
इस प्रतिमान में सीखने एवं आकलन की गतिविधियों के बीच एक गहरा सह-संबंध होता है, यानी आकलन सीखने की प्रक्रिया का कोई अलग हिस्सा नहीं है, बल्कि उसका एक अभिन्न अंग होता है। इसके द्वारा प्राप्त तथ्य और रचनात्मक प्रतिपुष्टि बच्चों की सीखने की युक्तियों में तुरंत सुधार लाते हैं। यह बच्चों के सीखने तथा उनके सर्वांगीण विकास का सतत (Continuous) आकलन करता है, जिससे उनके व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों (शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, सामाजिक) का विकास नियमित रूप से सुनिश्चित होता है।
---4. दोनों प्रतिमानों का तुलनात्मक विश्लेषण
शिक्षक प्रशिक्षण की परीक्षाओं और व्यावहारिक कक्षा कक्ष के संचालन के लिए इन दोनों प्रतिमानों के बीच के सैद्धांतिक अंतर को समझना अनिवार्य है। नीचे दी गई सरल रॉ-तालिका (बिना किसी सीएसएस के) के माध्यम से इन दोनों के स्वरूप को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है:
| तुलना का आधार (CRITERIA) | सीखने का आकलन (ASSESSMENT OF LEARNING) | सीखने के लिए आकलन (ASSESSMENT FOR LEARNING) |
|---|---|---|
| प्रकृति और स्वरूप | यह योगात्मक (Summative), व्यवहारवादी और परिणाम-उन्मुख होता है। | यह रचनात्मक (Formative), निर्माणवादी और प्रक्रिया-उन्मुख होता है। |
| आयोजन का समय | यह शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया या सत्र की समाप्ति के बाद अंत में आयोजित होता है। | यह शिक्षण-अधिगम की प्रक्रिया के साथ-साथ निरंतर और सतत रूप से चलता रहता है। |
| मुख्य प्रयोजन | इसका उद्देश्य बच्चों को ग्रेड, अंक देना, रैंक निर्धारित करना और पास/फेल का ठप्पा लगाना है। | इसका उद्देश्य बच्चों के सीखने की कमियों को पहचानना और उनके अधिगम में क्रमिक संवर्धन करना है। |
| प्रतिपुष्टि (Feedback) | इसमें गुणात्मक सुधार के लिए आवश्यक प्रतिपुष्टि का कोई अवसर उपलब्ध नहीं होता। | इसमें नियमित रूप से बच्चों और शिक्षकों दोनों को अपनी कमियों को सुधारने के लिए तत्काल प्रतिपुष्टि मिलती है। |
| बच्चों की भूमिका | इसमें बच्चा पूरी तरह निष्क्रिय होता है, उसका अपनी मूल्यांकन प्रक्रिया पर कोई नियंत्रण नहीं होता। | इसमें बच्चा पूरी तरह सक्रिय होता है, वह स्व-मूल्यांकन और सहपाठी मूल्यांकन के जरिए भाग लेता है। |
| मानसिक प्रभाव | यह बच्चों में अंकों की होड़, मानसिक तनाव और परीक्षा के प्रति गहरे भय को जन्म देता है। | यह परीक्षा के भय को कम करता है और रटने के स्थान पर विचारशील चिंतन का विकास करता है। |
5. सीखने के लिए आकलन की प्रविधियाँ और वैकल्पिक उपकरण
चूंकि 'सीखने के लिए आकलन' बच्चों के व्यक्तित्व के सभी आयामों को मापता है, इसलिए एक प्रगतिशील शिक्षक केवल कागज़-पेंसिल टेस्ट या लिखित परीक्षा पर निर्भर नहीं रहता। वह अपनी कक्षा में निम्नलिखित विविध रचनात्मक उपकरणों और युक्तियों का प्रयोग करता है:
- पोर्टफोलियो (Portfolio): किसी छात्र द्वारा एक निश्चित समयावधि में किए गए उसके सर्वोत्तम और विशिष्ट कार्यों का एक सुव्यवस्थित संग्रह होता है, जो उसके क्रमिक संज्ञानात्मक विकास को दर्शाता है।
- उपाख्यानात्मक रिकॉर्ड (Anecdotal Records): विद्यालय के भीतर घटित होने वाली किसी विशिष्ट घटना या व्यवहार में बच्चे की प्रतिक्रियाओं और संवेगात्मक संतुलन का लिखित क्रमिक विवरण।
- स्व-मूल्यांकन (Self-Assessment): बच्चों को स्वयं अपनी कमियों, शक्तियों और सीखने के तरीकों को पहचानने के अवसर प्रदान करना, जिससे उनमें जिम्मेदारी और स्व-नियमन (Self-regulation) का भाव पैदा होता है।
- सहपाठी मूल्यांकन (Peer Assessment): कक्षा के सहपाठियों को एक-दूसरे के सामूहिक कार्यों, प्रोजेक्ट्स और विचारों की निष्पक्ष व सहयोगात्मक समीक्षा करने के अवसर देना।
- व्यावहारिक प्रोजेक्ट और शैक्षणिक खेल: बच्चों को वास्तविक परिस्थितियों में स्वतंत्र रूप से प्रयोग करने और अपनी मौलिकता प्रदर्शित करने के लिए विकल्प चयन करने के अवसर प्रदान करना।
6. समावेशी कक्षा कक्ष के संयोजन में 'सीखने के लिए आकलन' की व्यावहारिक भूमिका
एक शिक्षक के रूप में जब हम किसी ऐसी समावेशी कक्षा का संचालन करते हैं जहाँ वैयक्तिक विभिन्नताओं वाले बच्चे मौजूद हैं, तो 'सीखने के लिए आकलन' हमारे लिए एक मार्गदर्शक संसाधन की भूमिका निभाता है:
(क) परीक्षा के प्रति भय का समूल नाश:
पारंपरिक परीक्षाओं का डर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करता है। 'सीखने के लिए आकलन' के तहत पाठ्यक्रम को छोटे-छोटे अंशों में विभाजित करके संवेगात्मक स्तर पर मूल्यांकन किया जाता है। इससे बच्चों का तनाव पूरी तरह समाप्त हो जाता है क्योंकि उन्हें यह डर नहीं होता कि वे एक परीक्षा के कारण फेल हो जाएंगे।
(ख) रुचियों और अभिक्षमताओं के अनुरूप अवसर:
इस रचनात्मक प्रक्रिया में बच्चों को अपनी रुचि के अनुसार अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने के वैकल्पिक अवसर प्राप्त होते हैं। यदि कोई अक्षमताग्रस्त बच्चा (जैसे—डिस्लेक्सिया से पीड़ित बच्चा) लंबे लिखित उत्तर नहीं दे सकता, तो शिक्षक उससे मौखिक रूप से, चित्रों के माध्यम से या किसी व्यावहारिक प्रोजेक्ट के जरिए उसके संज्ञान का रचनात्मक आकलन कर सकता है।
(ग) शिक्षण विधियों में तत्काल परिमार्जन:
यह प्रक्रिया शिक्षक के लिए एक आईने की तरह काम करती है। यदि कक्षा के अधिकांश बच्चे किसी संप्रत्यय (Concept) को समझ नहीं पा रहे हैं, तो शिक्षक 'सीखने के लिए आकलन' के निदानात्मक तथ्यों के आधार पर अपनी शिक्षण विधियों, सहायक सामग्रियों (TLM) और गतिविधियों में तुरंत आवश्यक सुधार लाता है ताकि कक्षा का प्रत्येक बच्चा प्रभावशाली ढंग से सीख सके।
---7. समकालीन चुनौतियाँ: सिद्धांत बनाम जमीनी हकीकत
यद्यपि कागजी तौर पर और सिद्धांतों में 'सीखने के लिए आकलन' की रचनात्मक प्रकृति अत्यंत प्रगतिशील, मानवीय और वैज्ञानिक दिखाई देती है, परंतु वास्तविक सरकारी और निजी स्कूलों के धरातल पर इसे पूर्णतः लागू करने में निम्नलिखित कड़े अवरोधों का सामना करना पड़ता है:
- अत्यधिक छात्र संख्या (PTR का असंतुलन): हमारे बिहार और देश के कई स्कूलों में शिक्षक-छात्र अनुपात बहुत अधिक है। एक ही कक्षा में ६० से ७० बच्चों की उपस्थिति में एक अकेले शिक्षक के लिए प्रत्येक बच्चे का व्यक्तिगत पोर्टफोलियो बनाना, उसकी सीखने की शैली को बारीकी से जाँचना और निरंतर रचनात्मक आकलन करना व्यावहारिक रूप से अत्यंत कठिन और थकाऊ हो जाता है।
- अभिभावकों की पारंपरिक संकीर्ण मानसिकता: हमारा सामाजिक ताना-बाना आज भी 'अंकों की अंधी दौड़' से ग्रसित है। अभिभावक केवल यह देखना चाहते हैं कि उनके बच्चे के रिपोर्ट कार्ड पर कितने प्रतिशत अंक या कौन सा ग्रेड आया है। यदि कोई बच्चा कला, सामाजिक habit या जीवन कौशलों (सह-शैक्षणिक क्षेत्रों) में उत्कृष्ट है, तो उसे सफलता का पैमाना नहीं माना जाता, जिससे इस रचनात्मक आकलन का मूल उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।
- शिक्षकों में प्रशिक्षण और इच्छाशक्ति का अभाव: कई पुराने ढर्रे के शिक्षक आज भी योगात्मक परीक्षाओं और कड़े व्याख्यान प्रणाली को ही मूल्यांकन का एकमात्र तरीका मानते हैं। उनके द्वारा रचनात्मक आकलन को अक्सर केवल एक 'भारी कागजी औपचारिकता' या क्लर्कियल पेपरवर्क समझ लिया जाता है, जिससे इसकी आंतरिक जीवंतता समाप्त हो जाती है।
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