बिहार डी.एल.एड. (D.El.Ed) और बी.एड. (B.Ed) के प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम में पत्र S2 (संज्ञान, सीखना और बाल विकास) के अंतर्गत तीसरी इकाई सबसे अधिक व्यावहारिक और सैद्धांतिक मानी जाती है। इस पत्र की तृतीय इकाई "सीखने के व्यवहारवादी एवं सूचना प्रसंस्करण सिद्धांतों की समझ" के अंतर्गत **अध्याय I: "सीखने की प्रकृति और उसके तीन प्रमुख पक्ष (संज्ञानात्मक, भावात्मक, मनोगत्यात्मक)"** संपूर्ण शिक्षण प्रक्रिया का केंद्र बिंदु है। एक भावी शिक्षक के लिए यह समझना अनिवार्य है कि 'सीखना' वास्तव में क्या है, इसकी आंतरिक और बाह्य प्रकृति कैसी होती है, और यह बच्चों के संपूर्ण व्यक्तित्व के किन तीन आयामों को रूपांतरित करता है।
---I. प्रस्तावना: सीखने की परिचयात्मक समझ (Introduction to Learning)
बच्चे के व्यवहार को नियंत्रित, परिमार्जित और व्यवस्थित करने में 'सीखना' (Learning) एक आधारभूत प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया जीवन के शुरुआती काल से ही आरंभ हो जाती है तथा जीवन भर अनवरत चलती रहती है। यह बच्चे के व्यवहार के प्रत्येक पक्ष को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। चाहे वह बच्चों की आदतें हों, उनकी रुचियाँ हों, विश्वास हो, दृष्टिकोण हो या सामाजिक परंपराएँ—ये सभी सीखने की प्रक्रिया के माध्यम से ही विकसित और संवर्धित होती हैंं।
'सीखना' शब्द मूल रूप से क्रिया बोधक है, अतः मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से जानने और व्यवहार में प्रगतिशील परिवर्तन लाने की क्रिया ही 'सीखना' कहलाती है। जब कोई बच्चा अपने स्वयं के प्रयत्नों से सक्रिय रूप में कुछ नया परिचय या ज्ञान अर्जित करता है, तो उसे सक्रिय सीखना (Active Learning) कहा जाता है। इसके विपरीत, जब वह किसी अन्य माध्यम या मध्यस्थता से निष्क्रिय होकर केवल सूचनाएं दर्ज करता है, तो उसे निष्क्रिय सीखना (Passive Learning) कहा जाता है। चाहे सीखने का स्वरूप जो भी हो, इसके द्वारा प्राप्त अनुभव और ज्ञान बच्चों को अपने निरंतर बदलते हुए वातावरण में सफलतापूर्वक समायोजन करने और जीवन की कठिन व उलझनपूर्ण समस्याओं को सुलझाने में पूरी तरह समर्थ बनाते हैंं।
---II. सीखने की वास्तविक परिभाषाएँ (Psychological Definitions of Learning)
मनोविज्ञान के इतिहास में अलग-अलग विचारकों ने सीखने की प्रक्रिया को अपने-अपने दृष्टिकोण से परिभाषित किया है, जिनमें से कुछ प्रमुख और प्रामाणिक परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं:
- वुडवर्थ (Woodworth) के अनुसार: "नये ज्ञान और नई अनुक्रियाओं को ग्रहण करने की प्रक्रिया ही सीखना है।" (The Process of Acquiring new knowledge and new response is the process of learning)ं।
- क्रो एण्ड क्रो (Crow and Crow) के अनुसार: "आदतों, ज्ञान एवं अभिवृत्तियों को ग्रहण करना ही सीखना है।" (Learning is the acquisition of habits, knowledge and attitude)ं।
- जे.पी. गिलफोर्ड (J.P. Guilford) के अनुसार: "व्यवहार के परिणामस्वरूप व्यवहार में होने वाला कोई भी परिवर्तन ही सीखना है।" (Learning is any change in behavior resulting from behaviour)ं।
- गेट्स (Gates) के अनुसार: "सीखना अनुभव और प्रशिक्षण द्वारा व्यवहार का शोधन या परिमार्जन है।" (Learning is modification of behavior through experience and training)ं।
III. सीखने की प्रकृति एवं वैज्ञानिक विशेषताएँ (Nature & Characteristics of Learning)
सीखने की प्रकृति को गहराई से समझने के लिए अमेरिकन मनोवैज्ञानिक **'अर्नेस्ट हिलगर्ड' (Ernest Hilgard)** द्वारा उठाए गए कुछ प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हैं; जैसे—क्या बालकों में उत्पन्न होने वाले सभी अस्थायी परिवर्तन सीखना हैं? क्या सभी प्रकार के सार्थक और निरर्थक अनुभव सीखने की श्रेणी में आते हैं?
मनोविज्ञान यह स्पष्ट करता है कि बीमारी, अत्यधिक थकान, मानसिक संवेग, परिपक्वता, दवाओं या मादक पदार्थों के सेवन के कारण व्यवहार में होने वाले अस्थायी परिवर्तनों को कभी भी सीखने में सम्मिलित नहीं किया जा सकता है। सीखने का अभिप्राय केवल उन्हीं परिवर्तनों से होता है जो दीर्घकालिक, अपेक्षाकृत स्थायी और पूरी तरह से अभ्यास, प्रशिक्षण या व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित होते हैंं।
सीखने की मुख्य वैज्ञानिक प्रकृतियाँ और विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- सीखना एक आंतरिक प्रक्रिया है: यह व्यक्ति के बाहर प्रकट होने वाली कोई अचानक या मूर्त घटना नहीं है, बल्कि मस्तिष्क के भीतर चलने वाली एक जटिल आनुक्रमिक प्रक्रिया है, जिसका अनुमान केवल प्राणी के बदले हुए व्यवहार के आधार पर लगाया जाता हैं।
- सीखना सार्वभौमिक (Universal) है: यह किसी विशिष्ट आयु, लिंग, जाति, प्रजाति या देश तक सीमित नहीं होता। संसार के सभी जीवधारी (मनुष्य और पशु दोनों) अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप निरंतर सीखते रहते हैंं।
- सीखना सदैव उद्देश्यपूर्ण होता है: जब तक बालक के सामने कोई निश्चित लक्ष्य या प्रयोजन नहीं होता, वह सीखने के लिए तत्पर नहीं होता। उद्देश्य जितना स्पष्ट होगा, सीखने की प्रक्रिया उतनी ही तीव्र और स्थायी होगीं।
- सीखना परिमार्जन और विकास है: इसके अंतर्गत व्यवहार का निरंतर शोधन होता है। परंतु यह परिमार्जन हमेशा सकारात्मक ही हो, यह आवश्यक नहीं है; बच्चा समाज में रहकर अच्छी बातें भी सीखता है और बुरी आदतें भी, इसलिए सीखना सकारात्मक व नकारात्मक दोनों हो सकता हैं।
- सीखना वातावरण की उपज और अनुकूलन है: व्यक्ति अपने आस-पास के भौतिक और सामाजिक पर्यावरण के साथ अंतःक्रिया करके ही नए अनुभव संचित करता है, जो उसे नए वातावरण में सफलतापूर्वक अनुकूलन करने की शक्ति देते हैंं।
IV. सीखने के तीन प्रमुख पक्ष (Three Major Domains of Learning)
आधुनिक शिक्षाशास्त्र और बाल-मनोविज्ञान (विशेषकर बेंजामिन ब्लूम के वर्गीकरण के आलोक में) यह स्पष्ट करता है कि सीखने का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। सीखने की प्रक्रिया मानव व्यवहार के सभी आयामों को गहराई से प्रभावित करती है, जिन्हें मुख्य रूप से तीन प्रमुख पक्षों में विभाजित करके समझा जाता है:
- संज्ञानात्मक पक्ष (Cognitive Domain) - मस्तिष्क पर आधारित पक्ष
- भावात्मक पक्ष (Affective Domain) - हृदय व भावनाओं पर आधारित पक्ष
- मनोगत्यात्मक पक्ष (Psychomotor Domain) - शारीरिक क्रियाओं पर आधारित पक्ष
आइए इन तीनों पक्षों का दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक उदाहरणों के साथ अत्यंत विस्तृत विश्लेषण करें:
१. संज्ञानात्मक पक्ष (Cognitive Domain):
संज्ञानात्मक पक्ष का सीधा संबंध बालक की मानसिक और बौद्धिक शक्तियों से होता है, जिसका केंद्र बिंदु उसका मस्तिष्क (मन) है। ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से किसी भी बाह्य विषय-वस्तु को संज्ञान में लेना और उस पर मानसिक मंथन करना इसी पक्ष के अंतर्गत आता हैं।
- निहित मानसिक प्रक्रियाएँ: इसके अंतर्गत बुद्धि, ज्ञान अर्जन, विचार करना, ध्यान केंद्रित करना (अवधान), स्मरण शक्ति (मेमोरी), तार्किक चिंतन, सूक्ष्म विश्लेषण, विभेदीकरण, संप्रत्यय निर्माण (Concept Formation) और जटिल समस्या समाधान की योग्यताएं विकसित होती हैंं।
- व्यावहारिक उदाहरण I (गुलाब का फूल): जब एक बच्चा किसी बगीचे में एक सुंदर पीले रंग का गुलाब का फूल देखता है, तो उसका मस्तिष्क सक्रिय हो जाता है। वह उसके आकार-प्रकार को ध्यान से देखता है, उसकी तुलना अन्य फूलों से करता है, और यह पहचानता है कि यह 'गुलाब' है। यह पूरी बौद्धिक गतिविधि उसके संज्ञानात्मक पक्ष के सीखने को दर्शाती हैं।
- व्यावहारिक उदाहरण II (कुत्ते का प्रत्यक्षीकरण): यदि बच्चा रास्ते में एक बड़े काले रंग के रॉटवीलर कुत्ते को देखता है, तो वह उसके चार पैर, नुकीले दाँत और भारी डील-डौल का मानसिक विश्लेषण करता है। वह अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर यह पहचानता है कि यह एक आक्रामक कुत्ता है। यह बौद्धिक क्रिया भी संज्ञानात्मक अधिगम का हिस्सा हैं।
२. भावात्मक पक्ष (Affective Domain):
भावात्मक पक्ष का सीधा संबंध बालक के हृदय, आंतरिक संवेगों, भावनाओं, रुचियों और अभिवृत्तियों (Attitudes) से होता है। यह उत्तेजना की वह आंतरिक अवस्था है जो बच्चे के चेहरे के हाव-भाव, उसकी पसंदगी-नापसंदगी और उसके जीवन-मूल्यों के माध्यम से बाहर परिलक्षित होती हैं।
- निहित संवेगात्मक प्रक्रियाएँ: इसके अंतर्गत प्रेम, दया, करुणा, सहानुभूति, भय, क्रोध, घृणा, आश्चर्य, और किसी विषय के प्रति सकारात्मक या नकारात्मक दृष्टिकोण का निर्माण शामिल हैं। व्यक्ति का भावात्मक व्यवहार उसकी शारीरिक और मानसिक वृद्धि को गहराई से नियंत्रित करता हैं।
- व्यावहारिक उदाहरण I (गुलाब का फूल): जब बच्चा उसी पीले गुलाब के फूल को देखकर उसके सौंदर्य पर पूरी तरह मोहित हो जाता है, उसके मन में फूल के प्रति अत्यधिक प्रेम, आनंद और उसे सहेजने का भाव जाग्रत होता है, तो यह संवेगात्मक झुकाव उसके भावात्मक पक्ष के सीखने को प्रदर्शित करता हैं।
- व्यावहारिक उदाहरण II (कुत्ते का प्रत्यक्षीकरण): जब बच्चा उस खूंखार कुत्ते को पास आते देखकर अचानक अत्यधिक डर (Fear) जाता है, उसका दिल तेजी से धड़कने लगता है और उसके चेहरे पर भय के संवेग दिखाई देने लगते हैं, तो यह अनुक्रिया पूरी तरह से उसके भावात्मक व्यवहार और संवेगात्मक अधिगम की श्रेणी में रखी जाती हैं।
३. मनोगत्यात्मक पक्ष (Psychomotor Domain):
मनोगत्यात्मक (या क्रियात्मक) पक्ष का सीधा संबंध बालक की शारीरिक गतिविधियों, मांसपेशियों के नियंत्रण और तंत्रिका तंत्र के संयोजन (Neuromuscular Coordination) से होता है। जब मन और मस्तिष्क के आदेश पर शरीर के विभिन्न अंग कोई भौतिक कार्य या दक्षता का निष्पादन करते हैं, तो उसे मनोगत्यात्मक पक्ष कहा जाता हैं।
- निहित गत्यात्मक प्रक्रियाएँ: इसके अंतर्गत शारीरिक कौशल, कार्यकुशलता, तकनीकी दक्षता, और नियंत्रण की क्षमताएं आती हैं। इसे दो भागों में देखा जाता है—स्थूल गत्यात्मक कौशल (Gross Motor Skills - जैसे दौड़ना, कूदना) और सूक्ष्म गत्यात्मक कौशल (Fine Motor Skills - जैसे लिखना, चित्र बनाना, सुई में धागा पिरोना)ं।
- व्यावहारिक उदाहरण I (गुलाब का फूल): जब बच्चा आगे बढ़कर अपनी उंगलियों के सूक्ष्म नियंत्रण से उस पीले गुलाब के फूल को टहनी से बहुत सावधानीपूर्वक तोड़ता है (सूक्ष्म गत्यात्मक) और फिर फूल लेकर बगीचे से दौड़कर भाग जाता है (स्थूल गत्यात्मक), तो यह शारीरिक क्रियाकलाप उसके मनोगत्यात्मक पक्ष के विकास को पूरी तरह सिद्ध करता हैं।
- व्यावहारिक उदाहरण II (कुत्ते का प्रत्यक्षीकरण): जब बच्चा कुत्ते को अपनी ओर झपटते हुए देखकर अपनी जान बचाने के लिए पूरी शारीरिक ताकत लगाकर विपरीत दिशा में तेजी से दौड़ने या भागने लगता है, तो शरीर और मांसपेशियों की यह त्वरित गत्यात्मक प्रतिक्रिया उसके मनोगत्यात्मक व्यवहार को प्रकट करती हैं।
V. तीनों पक्षों का तुलनात्मक एवं एकीकृत अवलोकन
शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया की व्यापकता को स्पष्ट करने के लिए नीचे दी गई सरल रॉ-तालिका (बिना किसी सीएसएस के) के माध्यम से इन तीनों पक्षों के अंतर्संबंधों को एक साथ समझा जा सकता है:
| पक्ष का नाम (DOMAINS) | मानसिक व शारीरिक केंद्र (CENTER) | मुख्य प्रक्रिया तत्व (CORE PROCESS) | व्यावहारिक कौशल का उदाहरण (EXAMPLES) |
|---|---|---|---|
| संज्ञानात्मक पक्ष (Cognitive) | मस्तिष्क / मन (Head) | बुद्धि, ज्ञान, विचार, तुलना, विभेदीकरण, चिंतन और जटिल तर्क शक्ति। | गणित के कठिन प्रश्नों को हल करना, कविता याद रखना, नक्शा पढ़ना। |
| भावात्मक पक्ष (Affective) | हृदय / आत्मा (Heart) | भावनाएं, संवेग (भय, क्रोध, प्रेम), अभिरुचियां, मूल्य और दृष्टिकोण। | देशभक्ति के गीत सुनकर भावुक होना, दूसरों के प्रति दया व करुणा दिखाना। |
| मनोगत्यात्मक पक्ष (Psychomotor) | शारीरिक अंग / मांसपेशियां (Hand) | शारीरिक कौशल, गामक गतियां, मांसपेशियों व तंत्रिकाओं का सटीक समन्वय। | कंप्यूटर कीबोर्ड पर टाइपिंग करना, साइकिल या स्कूटी चलाना, चित्र बनाना। |
एक कुशल शिक्षक को यह सदैव याद रखना चाहिए कि ये तीनों पक्ष कक्षा कक्ष में अलग-अलग टुकड़ों में काम नहीं करते हैं। जब बच्चा कक्षा में कोई पाठ पढ़ता है, तो वह उसे बुद्धि से समझता भी है (संज्ञानात्मक), उसके प्रति एक सकारात्मक रुचि भी विकसित करता है (भावात्मक), और उसे अपनी कॉपी पर पेन की सहायता से लिखता भी है (मनोगत्यात्मक)। इन तीनों पक्षों का यह एकीकृत स्वरूप ही वास्तविक और संपूर्ण अधिगम की रीढ़ हैं।
---VI. सीखने के प्रमुख सैद्धांतिक दृष्टिकोण: एक विहंगम विमर्श (Theoretical Views)
मनोविज्ञान के इतिहास में सीखने की इस पूरी प्रकृति और पक्षों को स्पष्ट करने के लिए कई बड़े सैद्धांतिक दृष्टिकोणों का जन्म हुआ, जिनका संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है:
- प्रयास और त्रुटि दृष्टिकोण (Trial and Error View): इसका प्रतिपादन अमेरिकी व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिक **थॉर्नडाइक (Thorndike)** ने किया था। उनका मानना था कि सीखने का मूल आधार उपयुक्त उद्दीपक (Stimulus) और अनुक्रिया (Response) के बीच मजबूत संबंध स्थापित करना है। व्यक्ति बार-बार प्रयास करता है, अनेक त्रुटियाँ करता है, और अंततः सही अनुक्रिया का चयन करना सीख जाता हैं। यह सिद्धांत अभ्यास और तत्परता पर सबसे अधिक बल देता हैं।
- गेस्टाल्ट दृष्टिकोण या सूझ का सिद्धांत (Gestalt / Insight View): इसका प्रतिपादन वर्दीमर, कोफ्का और **कोहलर (Kohler)** ने किया था। व्यवहारवादियों के विपरीत, इनका मानना था कि सीखना कोई यांत्रिक या अंधेरे में हाथ-पैर मारना नहीं है, बल्कि पूरी परिस्थिति के संपूर्ण ढांचे (Whole Situation) का बारीकी से अवलोकन करके अचानक उत्पन्न होने वाली अपनी सूझबूझ और अंतःदृष्टि (Insight) का प्रयोग करना हैं।
- होरमिक दृष्टिकोण (Hormic View): यह दृष्टिकोण सीखने की प्रक्रिया में 'लक्ष्य' (Goal) को केंद्र में रखता है। इसके अनुसार, मनुष्य या कोई भी प्राणी अपनी आंतरिक प्रेरणा और किसी निश्चित उद्देश्य को सम्मुख रखकर ही सीखने की क्रिया को सफलतापूर्वक संपन्न करता हैं।
VII. शिक्षकों के लिए इस अध्याय का नीतिगत व व्यावहारिक महत्व (Educational Implications)
एक प्राथमिक या उच्च प्राथमिक शिक्षक के लिए सीखने की प्रकृति और उसके इन तीनों पक्षों का गहरा ज्ञान होना निम्नलिखित कारणों से अत्यंत अनिवार्य माना जाता है:
- सर्वांगीण विकास की रूपरेखा (Holistic Development): यह अध्याय शिक्षकों को यह व्यावहारिक समझ देता है कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य बच्चों को केवल 'तथ्य' रटवाकर परीक्षा पास करवाना (केवल संज्ञानात्मक विकास) नहीं है। एक सफल शिक्षक को अपनी कक्षा में ऐसी गतिविधियाँ रूपायित करनी चाहिए जिससे बच्चों के ज्ञान के साथ-साथ उनके संवेगों का उदात्तीकरण हो (भावात्मक) और उनके शारीरिक कौशलों (मनोगत्यात्मक) को भी फलने-फूलने का पूरा मौका मिलें।
- पाठ्यपुस्तकों और टीएलएम (TLM) का वैज्ञानिक चयन: विभिन्न आयु-स्तरों पर बच्चों की मानसिक क्षमताओं और गामक कौशलों का स्वरूप अलग होता है। इस अध्याय के ज्ञान की मदद से शिक्षक अपनी कक्षा कक्ष में बच्चों के स्तर के अनुकूल रुचिकर सहायक सामग्रियों (जैसे—दृश्य-श्रव्य सामग्री, व्यावहारिक प्रोजेक्ट, रंगीन खल्ली) और आनंदमयी खेल विधियों का सटीक चुनाव कर सकते हैंं।
- रचनात्मक प्रतिपुष्टि और सतत मूल्यांकन (CCE): आकलन की प्रक्रिया में यह सिद्धांत शिक्षकों को पारंपरिक कड़े लिखित टेस्टों से बाहर निकालता है। शिक्षक यह जान पाता है कि यदि कोई बच्चा स्वतंत्र रूप से या अपने सहपाठियों के साथ अंतःक्रिया करके सीख रहा है, तो उसकी सीखने की शैली क्या है? वह किस पक्ष में अधिक दक्ष है और किस पक्ष में उसे सुधारात्मक उपचारात्मक शिक्षण की आवश्यकता हैं?
निष्कर्ष (Conclusion):
सीखने की प्रकृति और उसके विविध पक्षों का यह गहन और विस्तृत मनोवैज्ञानिक विमर्श हमें यह समृद्ध चेतना प्रदान करता है कि सीखना कोई सरल या यांत्रिक रेखा नहीं है, बल्कि यह एक अत्यंत गतिशील, बहु-आयामी और जीवन पर्यंत चलने वाली आंतरिक विकासात्मक यात्रा है। संवेदी ज्ञानेंद्रियों के प्राथमिक अनुभवों से शुरू होकर, यह हमारे मस्तिष्क के तार्किक चिंतन (संज्ञानात्मक), हृदय की संवेगात्मक गहराइयों (भावात्मक), और शरीर की मांसपेशियों की क्रियात्मक कुशलताओं (मनोगत्यात्मक) को पूरी तरह परिमार्जित और रूपांतरित करता हैं।
एक भावी राष्ट्र-निर्माता शिक्षक के रूप में, आपका यह नैतिक और व्यावसायिक उत्तरदायित्व है कि आप अपनी कक्षाओं को केवल शुष्क व्याख्यानों तक सीमित न रखकर, रचनावाद के सिद्धांतों के आलोक में बच्चों को सक्रिय खोजबीन, संवाद, प्रयोग और अपनी स्वाभाविक जिज्ञासा व्यक्त करने के पूर्ण लोकतांत्रिक अवसर प्रदान करें, ताकि प्रत्येक बच्चा अपनी अनूठी क्षमता के साथ ज्ञान का वास्तविक सृजन स्वयं कर सकें।
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