बिहार डी.एल.एड. (D.El.Ed) और बी.एड. (B.Ed) के प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम में पत्र S2 (संज्ञान, सीखना और बाल विकास) के अंतर्गत समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) का दृष्टिकोण विकसित करना एक प्राथमिक लक्ष्य है। इस पत्र की द्वितीय इकाई "बाल विकास एवं सीखना" के अंतर्गत अध्याय 4: "सीखने की योग्यता एवं निर्योग्यता (Learning Disability)" सबसे अधिक संवेदनशील, व्यावहारिक और परीक्षा-उपयोगी अध्याय है। एक शिक्षक के रूप में कक्षा कक्ष में हमारा सामना अक्सर ऐसे बच्चों से होता है जो अत्यधिक प्रयास और सामान्य या उच्च बौद्धिक क्षमता के बावजूद पढ़ने, लिखने या गणित के कौशलों में निरंतर कठिनाई महसूस करते हैं ।
---1. सीखने की निर्योग्यता / अक्षमता का अर्थ एवं संकल्पना (Concept of Learning Disability)
'अधिगम अक्षमता' या 'सीखने की निर्योग्यता' शब्द दो अलग-अलग पदों—'अधिगम' (सीखने) और 'अक्षमता' (क्षमता का अभाव या अनुपस्थिति) से मिलकर बना है। सामान्य भाषा में, इसका तात्पर्य सीखने की योग्यता में कमी या आंशिक/पूर्ण अनुपस्थिति से है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से, सीखने की अक्षमता एक न्यूरोलॉजिकल (Neurological - तंत्रिका तंत्र से जुड़ी) समस्या है, जो संदेश भेजने, ग्रहण करने और उन्हें प्रोसेस करने की मस्तिष्क की आंतरिक क्षमता को प्रभावित करती है। इसके कारण सामान्य या तीव्र बुद्धि वाले बच्चों को भी पढ़ने, लिखने, बोलने, सुनने, तथा गणित के सवालों और सूत्रों को समझने में गंभीर कठिनाई आ सकती है।
विशेष नोट (भ्रांतियों का निवारण): सीखने की अक्षमता कोई मानसिक मंदता (Mental Retardation) या बौद्धिक अक्षमता नहीं है। यह किसी शारीरिक अंग की प्रत्यक्ष विकलांगता, खराब आर्थिक हालात, आलसीपन या सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की वजह से भी नहीं होती है। यह केवल मस्तिष्क द्वारा सूचनाओं के विशिष्ट प्रसंस्करण (Information Processing) में आने वाली विकृति है। इससे ग्रस्त बच्चे मंदबुद्धि नहीं होते, बल्कि वे अत्यंत प्रतिभावान भी हो सकते हैं (जैसे—अल्बर्ट आइंस्टीन और थॉमस एडिसन भी बचपन में इससे ग्रसित थे)।
प्रामाणिक मनोवैज्ञानिक परिभाषाएँ:
- फेडरल महोदय के अनुसार: "सीखने की निर्योग्यता से तात्पर्य मौखिक अथवा लिखित भाषा सीखने में, मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया को समझने के क्रम में आने वाली विकृति से है जो व्यक्ति के श्रवण, सोच, वाक, पठन, लेखन एवं अंकगणित सम्बन्धी गणना को पूर्ण या आंशिक रूप से प्रभावित करती हैं। इसके अंतर्गत मस्तिष्क क्षति, अल्परूप में असामान्य दिमागी प्रक्रिया (Minimal Brain Dysfunction), डिस्लेक्सिया और विकासात्मक वाचाघात (Developmental Aphasia) सरीखी स्थितियाँ शामिल हैं।"
- अमेरिका की राष्ट्रीय संयुक्त समिति (NJCLD, 1994) के अनुसार: "यह एक व्यापक शब्द है जो सुनने, बोलने, पढ़ने, लिखने, तर्क करने या गणितीय क्षमताओं के अर्जन (Acquisition) एवं उपयोग में आने वाली गंभीर कठिनाइयों के विशिष्ट विकृति समूह को दर्शाता है।"
आंकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 13% से 14% बच्चे किसी न किसी प्रकार की सीखने की अक्षमता या निर्योग्यता से ग्रस्त होते हैं, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण वे पहचान से वंचित रह जाते हैंं
---2. विभिन्न प्रकार की सीखने की योग्यता-निर्योग्यताएँ (Types of Learning Disabilities)
ब्रिटिश कोलम्बिया (2011) और ब्रिटेन के शिक्षा मंत्रालय द्वारा प्रकाशित प्रामाणिक मार्गदर्शिका 'सपोर्टिंग स्टूडेंट्स विद लर्निंग डिसेबिलिटीज़: गाइड फॉर टीचर्स' के आलोक में, सीखने की अक्षमताओं को मुख्य रूप से निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:
(क) डिस्लेक्सिया (Dyslexia) - पठन सम्बन्धी विकार:
यह सबसे आम अधिगम अक्षमता है, जिसका सीधा संबंध पढ़ने और भाषाई प्रसंस्करण से है। डिस्लेक्सिया से पीड़ित बच्चे लिखित शब्दों को पहचानने, वर्णमाला के अक्षरों को क्रमिक रूप से याद रखने और उनका सही उच्चारण करने में असमर्थ होते हैं। वे अक्सर वर्णों के दर्पण प्रतिबिंब (Mirror Images) से भ्रमित हो जाते हैंं।
(ख) डिस्ग्राफिया (Dysgraphia) - लेखन सम्बन्धी विकार:
इसका संबंध लेखन क्षमता और गामक कौशलों में आने वाली विकृति से है। इस विकार से ग्रसित बच्चों के मस्तिष्क और हाथों की उंगलियों की मांसपेशियों के बीच उचित समन्वय नहीं हो पाता। इसके कारण उनकी लिखावट अत्यंत अस्पष्ट, टेढ़ी-मेढ़ी और त्रुटिपूर्ण होती हैं।
(ग) डिसकैलकुलिया (Dyscalculia) - गणितीय कौशल सम्बन्धी विकार:
यह अंकगणितीय गणनाओं और गणितीय संक्रियाओं से जुड़ा विशिष्ट विकार है। इससे पीड़ित बच्चे गणित के बुनियादी प्रतीकों (जैसे—+, -, ×, ÷), अंकों के स्थानीय मान, और गणितीय सारणी (Tables) को याद रखने व उनका व्यावहारिक उपयोग करने में गंभीर अक्षमता प्रदर्शित करते हैंं।
(घ) डिस्प्रेक्सिया (Dyspraxia) - समन्वय व चित्रांकन सम्बन्धी विकार:
यह एक जटिल गामक अक्षमता (Motor Disability) है, जो बच्चे के शारीरिक संतुलन, मांसपेशियों के नियंत्रण और चित्रांकन कौशलों को प्रभावित करती है। ऐसे बच्चे पेंसिल पकड़ने, बटन बंद करने, या सीधी रेखा में चित्र बनाने में अत्यधिक कठिनाई महसूस करते हैंं।
(ङ) डिसऑर्थोग्राफिया (Dysorthographia) - वर्तनी सम्बन्धी विकार:
इस विकार का सीधा संबंध व्याकरण और वर्तनी (Spelling) की शुद्धता से है। बच्चा वर्णों को सही क्रम में व्यवस्थित नहीं कर पाता और शब्दों का बार-बार गलत उच्चारण व त्रुटिपूर्ण लेखन करता हैं।
(च) ऑडिटरी प्रोसेसिंग डिसऑर्डर (Auditory Processing Disorder) - श्रवण सम्बन्धी विकार:
इस विकार में बच्चे के कान तो पूरी तरह स्वस्थ होते हैं, लेकिन उसका मस्तिष्क कानों द्वारा सुनी गई ध्वनियों और वाक्यों के अर्थ का विश्लेषण करने में असमर्थ होता है। बच्चा मौखिक निर्देशों को अधिक देर तक याद नहीं रख पाता है।
(छ) विजुअल परसेप्शन डिसऑर्डर (Visual Perception Disorder) - दृश्य प्रत्यक्षण विकार:
इसके अंतर्गत बच्चों की आँखें तो ठीक होती हैं, लेकिन उनका मस्तिष्क आँखों द्वारा देखी गई वस्तुओं, आकृतियों, और अक्षरों के बीच विभेदीकरण और गहराई का प्रत्यक्षण करने में त्रुटि करता है। वे दाएँ और बाएँ के अंतर को लेकर हमेशा भ्रम की स्थिति में रहते हैंं।
---3. अक्षमताग्रस्त बच्चों के विशिष्ट लक्षण एवं पहचान (Identification & Symptoms)
एक शिक्षक के रूप में कक्षा कक्ष के भीतर इन बच्चों की समय पर पहचान करना उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए अति महत्वपूर्ण है। यदि समय पर इनकी पहचान न हो, तो बच्चों का आत्म-सम्मान और आत्मविश्वास पूरी तरह टूट जाता है और वे तनाव, चिंता व दब्बूपन का शिकार हो जाते हैं। कक्षा में निम्नलिखित व्यवहारिक लक्षणों के आधार पर इन बच्चों की पहचान की जा सकती है:
पठन और भाषा सम्बन्धी विशिष्ट लक्षण:
- पढ़ते समय बार-बार पंक्तियाँ छोड़ देना अथवा एक ही पंक्ति को भ्रमवश बार-बार पढ़ना।
- शब्दों को विपरीत क्रम में पढ़ना; जैसे—'कल' को 'लक' पढ़ना या वर्तनी को अलग-अलग अक्षरों में पढ़ने के बाद भी उससे पूरा शब्द बनाकर उच्चारण करने में असमर्थ होना।
- शब्दों को छोटा बनाकर या गलत क्रम में बोलना; जैसे—'सडेनली' को 'सेनली', 'रिमेम्बर' को 'रेम्बर', या 'प्लेट' को 'ऐक्ट' बोलना।
- बीच के अक्षर या मात्राएँ छोड़ देना; जैसे—'शावक' को केवल 'शाक' पढ़ना।
- बहुत ऊँचे या बहुत धीमे स्वर में बोलना तथा बहुत तेज या बहुत धीमा पढ़ना।
लेखन और गामक सम्बन्धी विशिष्ट लक्षण:
- पेंसिल अथवा पेन को अत्यंत अव्यवस्थित और कड़े तरीके से पकड़ना।
- लिखते समय कॉपी में हाँशिया (Margin) नहीं छोड़ना और अक्षरों के आकार को अत्यंत असमान रखना।
- उच्चारण सही करने के बावजूद लिखते समय सही अक्षरों का चयन न कर पाना और विराम चिह्नों का प्रयोग बिल्कुल न करना।
गणितीय और संज्ञानात्मक विशिष्ट लक्षण:
- अंकों को गलत पढ़ना और लिखना; जैसे—'6' को '9', '3' को '8', या '36' को '63' समझना।
- समय बताने, घड़ी देखने, दिन, महीने व ऋतुओं के नाम का क्रमिक उल्लेख करने में अत्यधिक कठिनाई का अनुभव करना।
- अपना दैनिक काम व्यवस्थित (Organise) करने में कठिनाई महसूस करना और कक्षा में क्षणभर के लिए भी शांत होकर न बैठ पाना।
4. अधिगम अक्षमता के प्रमुख कारण (Causes of Learning Disabilities)
यद्यपि इन अक्षमताओं के होने का कोई एक निश्चित और स्पष्ट कारण पूरी तरह नहीं खोजा जा सका है, परंतु न्यूरोलॉजिकल शोधों के अनुसार निम्नलिखित कारक इसके लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी माने जाते हैं:
- जैविक और वंशानुगत कारक: यदि परिवार में माता-पिता या पूर्वजों को सीखने की कठिनाई रही हो, तो बच्चों में इसकी संभावना बढ़ जाती है.
- गर्भावस्था के दौरान जटिलताएं: गर्भावस्था के दौरान माताओं को सही और संतुलित पोषण न मिलना, या उनके द्वारा धूम्रपान, मदिरा व अन्य किसी प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन करने से शिशु के मस्तिष्क में Neurological Disorder (तंत्रिका तंत्रीय विकृति) पैदा हो जाते हैं।
- प्रसव के समय दुर्घटनाएं: प्रसव के समय शिशु के मस्तिष्क में चोट लगना, या ऑक्सीजन की आंशिक कमी होना भी अल्प रूप में असामान्य दिमागी प्रक्रिया का कारण बन सकता है।
5. निदान और नैदानिक जाँच के उपकरण (Diagnostic Tools)
जब शिक्षक प्राथमिक लक्षणों के आधार पर बच्चे में अक्षमता का अंदेशा लगाता है, तो उसके सटीक मूल्यांकन और निदान के लिए मनोवैज्ञानिकों द्वारा विकसित निम्नलिखित प्रामाणिक जाँच उपकरणों (Tools) का उपयोग किया जाता है:
| जाँच उपकरण का नाम (DIAGNOSTIC TOOLS) | मापन का मुख्य क्षेत्र एवं उद्देश्य (PURPOSE OF TESTING) |
|---|---|
| Information Reading Inventory (IRI) | बच्चों के पठन स्तर, वाचन गति और पढ़ने के दौरान होने वाली त्रुटियों (डिस्लेक्सिया) का विश्लेषण करना। |
| Informal Graded Word Test | शब्दों की पहचान, शब्दावली के स्तर और वर्णों के क्रमिक उच्चारण की क्षमता की जाँच करना। |
| Informal Arithmetic Test | बच्चों के गणितीय कौशलों, अंकों के स्थानीय मान की समझ और बुनियादी संक्रियाओं (डिसकैलकुलिया) का मापन करना। |
| Wechsler Intelligence Scale for Children (WISC) | बच्चों के संज्ञानात्मक और बौद्धिक स्तर का व्यापक मापन करना, ताकि मानसिक मंदता और अधिगम अक्षमता का अंतर स्पष्ट हो सके। |
| Stanford-Binet Intelligence Scale | बच्चों की मानसिक आयु और उनकी सामान्य संज्ञानात्मक योग्यताओं की गहन जाँच करना। |
| Peabody Picture Vocabulary Test (PPVT) | बच्चों की भाषायी ग्रहणशीलता, मौखिक समझ और शाब्दिक संप्रत्ययों के विकास को जाँचना। |
| Vineland Social Maturity Scale | अक्षमताग्रस्त बच्चों के सामाजिक परिपक्वता, अनुकूलन क्षमता और दैनिक जीवन के कौशलों का आकलन करना। |
| Detroit Test of Learning Aptitude (DTLA) | बच्चों के विशिष्ट सीखने की अभिक्षमता, ध्यान केन्द्रीकरण और अल्पकालिक/दीर्घकालिक स्मृति की कड़ियों को जाँचना। |
6. अक्षमताग्रस्त बच्चों के लिए शैक्षिक कार्यक्रम एवं रणनीतियाँ (Educational Programs)
सीखने की अक्षमता से ग्रस्त बच्चों के शैक्षिक पुनर्वास और उनके सीखने को सुगम बनाने के लिए आधुनिक शिक्षाशास्त्र में निम्नलिखित विशेष प्रावधान और रणनीतियाँ उपलब्ध हैं:
(क) समकालीन समावेशी व समन्वित शिक्षा (Integrated Education):
इन बच्चों को सामान्य बच्चों से अलग किसी पृथक स्कूल में नहीं भेजना चाहिए, बल्कि समन्वित और समावेशी शिक्षा के तहत उन्हें मुख्य धारा में लाकर सामान्य शिक्षार्थियों के साथ ही पढ़ाना चाहिए, ताकि उनमें हीनभावना पैदा न हो। आवश्यकतानुसार सामान्य विद्यालयों में विशिष्ट कक्षाओं या संसाधन कक्षों (Resource Rooms) की व्यवस्था की जा सकती हैं।
(ख) उपचारात्मक शिक्षण रणनीतियाँ (Remedial Teaching Strategies):
इसके अंतर्गत बच्चों की विशिष्ट कठिनाई के आधार पर शिक्षण पद्धतियों का कायाकल्प किया जाता है:
- बहु-संवेदी आयाम (Multi-Sensory Approaches): इन बच्चों को केवल किताबी अक्षरों से न पढ़ाकर दृश्य, श्रव्य, स्पर्श और शारीरिक गतियों के मिश्रण से पढ़ाना चाहिए। जैसे—अक्षरों के संप्रत्यय को सिखाने के लिए रंगीन खल्ली, सैंडपेपर पर बने अक्षर या मिट्टी के मॉडलों का प्रयोग करना।
- संरचना व उद्दीपन घटाव (Structure and Stimulus Reduction): विकर्षणों को कम करने के लिए कक्षा कक्ष को पूरी तरह ध्वनि प्रदूषण मुक्त रखना चाहिए और भारी व खतरनाक सामानों को बच्चों की पहुँच से दूर रखना चाहिए।
- संज्ञानात्मक व व्यवहार संशोधन प्रशिक्षण (Cognitive & Behaviour Modification): बच्चों को छोटे-छोटे टुकड़ों में कार्यों का विश्लेषण करके सिखाना चाहिए और उनके प्रत्येक सही कदम पर सकारात्मक पुनर्बलन देना चाहिए।
7. अक्षमताग्रस्त बच्चों की शिक्षा में शिक्षक की भूमिका (Role of a Teacher)
एक शिक्षक केवल ज्ञान परोसने वाला डाकिया नहीं है, बल्कि वह सीखने की अक्षमता से जूझ रहे बच्चों के लिए एक संसाधन और सहानुभूतिपूर्ण मार्गदर्शक के रूप में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। कक्षा कक्ष के भीतर और बाहर शिक्षक की भूमिका को निम्नलिखित आयामों में विभाजित किया जा सकता है:
कक्षा कक्ष का भौतिक व मानसिक प्रबंधन (Classroom Management):
- बैठने की विशेष व्यवस्था: कक्षा में जो बच्चे ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते या उदासीन रहते हैं, शिक्षक को उन्हें सबसे आगे या अपने ठीक मध्य में बैठाना चाहिए ताकि उन पर निरंतर सकारात्मक निगरानी रखी जा सके।
- भयमुक्त वातावरण का निर्माण: शिक्षक को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कक्षा का कोई भी छात्र इन बच्चों की त्रुटियों या उनके गलत उच्चारण का उपहास न उड़ाए। शिक्षक को स्वयं उनकी गलत अनुक्रियाओं पर शारीरिक या मानसिक दंड देने का कड़ाई से विरोध करना चाहिए।
अनुदेशन और शिक्षण तकनीकों में सुधार:
- कार्यों का विश्लेषण (Task Analysis): पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम और गृहकार्य को छोटे-छोटे अंशों में विभाजित करना चाहिए और बच्चे के सीखने हेतु एक निश्चित, सुव्यवस्थित क्रम का अनुसरण करवाना चाहिए।
- साथियों द्वारा अधिगम (Peer Tutoring): कक्षा के तीव्र और संवेदनशील सहपाठियों के सहयोग से 'पीयर लर्निंग' को बढ़ावा देना चाहिए, जहाँ सामान्य बच्चे इन अक्षमताग्रस्त बच्चों को खेल-खेल में सीखने में मदद कर सकें।
- वैकल्पिक विषयों का सुझाव: यदि कोई बच्चा कड़े प्रयासों के बाद भी डिसकैलकुलिया के कारण गणित या विज्ञान की अमूर्त संक्रियाओं को नहीं सीख पा रहा है, तो उस पर अत्यधिक मानसिक दबाव बनाने के बजाय उसे उसकी रुचि के अनुकूल संगीत, खेलकूद, चित्रकला या व्यावहारिक हस्तशिल्प जैसे वैकल्पिक क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
अभिभावकों के साथ समन्वय और प्रगति का मूल्यांकन:
- शिक्षक को बच्चों के माता-पिता/अभिभावकों के साथ निरंतर औपचारिक तथा अनौपचारिक बैठकें करनी चाहिए और उनके साथ एक घनिष्ठ संबंध स्थापित करना चाहिए।
- अभिभावकों को यह समझाना शिक्षक का नैतिक दायित्व है कि उनका बच्चा कमजोर या आलसी नहीं है, बल्कि उसे केवल घर पर भी एक विशेष सहयोगात्मक और तनाव-मुक्त वातावरण की आवश्यकता है।
8. सीखने का आकलन बनाम सीखने के लिए आकलन (Assessment Paradigms)
इस अध्याय का एक अन्य महत्वपूर्ण नीतिगत पहलू यह समझना है कि इन विशिष्ट बच्चों की प्रगति का आकलन किस प्रकार किया जाए। इसके लिए दो प्रतिमान काम करते हैं:
(१) सीखने का आकलन (Assessment of Learning): यह मूल्यांकन की पारंपरिक, योगात्मक (Summative) और व्यवहारवादी प्रकृति की ओर संकेत करता है। इसके अंतर्गत केवल साल के अंत में होने वाली तीन घंटे की लिखित परीक्षा द्वारा बच्चों की शैक्षिक उपलब्धि को मापा जाता है और उन्हें ग्रेड या अंक दे दिए जाते हैं। यह आकलन यह बताने में पूरी तरह असमर्थ होता है कि बच्चा *कैसे सीखता है* या उसकी सीखने की विशिष्ट शैली क्या है? यह व्यवस्था अंकों की होड़ को बढ़ावा देती है जिससे अक्षमताग्रस्त बच्चों के भीतर परीक्षा के प्रति गहरा भय और कुंठा का भाव पैदा हो जाता है, इसलिए इन बच्चों के लिए यह प्रणाली पूरी तरह अनुपयुक्त हैं।
(२) सीखने के लिए आकलन (Assessment for Learning): यह आकलन के निर्माणवादी (Constructivist), रचनात्मक और निदानात्मक प्रकृति की ओर संकेत करता है, जो इन बच्चों के लिए वरदान सिद्ध होता है। इसके अंतर्गत आकलन शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का एक अभिन्न हिस्सा होता है जो पाठ्यक्रम के छोटे-छोटे अंशों में निरंतर चलता रहता है। यह शिक्षक को यह जानने में मदद करता है कि यदि बच्चा सीख नहीं पा रहा तो क्यों? उसकी कठिनाई का मूल कारण क्या है? इसमें बच्चों को उनकी अभिरुचि के अनुरूप वैकल्पिक आकलन उपकरणों (जैसे—मौखिक परीक्षा, पोर्टफोलियो, व्यावहारिक प्रोजेक्ट) को चुनने का अवसर प्राप्त होता है, जिससे रटने की प्रवृत्ति के स्थान पर विचारशील चिंतन का विकास होता है और परीक्षा का भय पूरी तरह समाप्त हो जाता हैं।
---निष्कर्ष (Conclusion):
सीखने की योग्यता और निर्योग्यता का यह गहन वैज्ञानिक और नीतिगत अध्ययन हमें यह अमूल्य चेतना देता है कि शिक्षा की वास्तविक सफलता केवल कुशाग्र बुद्धि वाले बच्चों को अच्छे अंक दिलवाना नहीं है, बल्कि कक्षा के अंतिम पायदान पर खड़े अक्षमताग्रस्त बच्चे को भी उसकी विशिष्ट क्षमता के साथ फलने-फूलने का भयमुक्त अवसर प्रदान करना है।
एक भावी डी.एल.एड./बी.एड. प्रशिक्षु के रूप में, आपका यह नैतिक और व्यावसायिक उत्तरदायित्व है कि आप अपनी कक्षा कक्ष को प्रशासनिक बेड़ियों और यांत्रिक ढर्रों से मुक्त करें। जब आप इन बच्चों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाएंगे, बहु-संवेदी आयामों से उपचारात्मक शिक्षण देंगे, और 'सीखने के लिए आकलन' के रचनात्मक सिद्धांतों को लागू करेंगे, तभी वास्तविक अर्थों में एक समतामूलक, न्यायपूर्ण और समावेशी राष्ट्र का निर्माण संभव हो सकेगा।
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