भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास में वर्ष 1991 एक विभाजक रेखा है, जब देश गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा था। तत्कालीन सरकार ने इस संकट से उबरने के लिए LPG (उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण) की नीति को अपनाया। इन आर्थिक सुधारों ने न केवल देश के बाज़ार को बदला, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की सामाजिक अपेक्षाओं और ढांचे को भी पूरी तरह पुनर्गठित कर दिया। डी.एल.एड. और बी.एड. के 'S1' पत्र की इकाई-4 के इस अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय का विस्तृत परीक्षा-उन्मुख नोट्स आपकी वेबसाइट के लिए नीचे टेबल और विनिर्दिष्ट प्रारूप में दिया गया है:
1. आर्थिक सुधार (1991) और शिक्षा का नया परिप्रेक्ष्य
1991 के बाद शिक्षा को केवल एक सामाजिक सेवा नहीं, बल्कि एक 'वैश्विक उत्पाद' और 'मानव पूंजी' (Human Capital) के निर्माण के मुख्य स्रोत के रूप में देखा जाने लगा। बाज़ार की शक्तियों ने शिक्षा की प्राथमिकताओं को तय करना शुरू किया, जिससे शिक्षा का तेजी से उदारीकरण और वैश्वीकरण हुआ।
2. शिक्षा पर आर्थिक सुधारों का सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव
नीचे दी गई तालिका में उदारीकरण और वैश्वीकरण के कारण भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर पड़े दोनों पक्षों के प्रभावों का व्यापक तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:
| सकारात्मक प्रभाव (POSITIVE IMPACTS) | नकारात्मक प्रभाव (NEGATIVE IMPACTS) |
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1. सूचना एवं संचार तकनीक (ICT) का समावेशन: वैश्वीकरण के कारण भारतीय कक्षाओं में कंप्यूटर, इंटरनेट, स्मार्ट बोर्ड और डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म (जैसे दीक्षा, स्वयं, ई-पाठशाला) का तेजी से प्रसार हुआ, जिससे वैश्विक स्तर का ज्ञान स्थानीय बच्चों तक पहुँचा। 2. वैश्विक रोजगार और कौशल विकास: शिक्षा के पाठ्यक्रम में बाज़ार की मांग के अनुसार बदलाव आया। तकनीकी शिक्षा, व्यावसायिक कोर्सेज (Vocational Courses) और कोडिंग व डेटा साइंस जैसे आधुनिक कौशलों को प्राथमिकता मिली, जिससे भारतीय युवाओं के लिए वैश्विक स्तर पर रोजगार के नए द्वार खुले। 3. उच्च शिक्षा संस्थानों का विस्तार: उदारीकरण के कारण निजी क्षेत्र को शिक्षण संस्थान खोलने की अनुमति आसानी से मिली। इससे देश में बड़ी संख्या में निजी विश्वविद्यालयों, इंजीनियरिंग और प्रबंधन कॉलेजों की स्थापना हुई, जिससे उच्च शिक्षा की 'सिट कैपेसिटी' में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। 4. अनुसंधान और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: भारतीय विश्वविद्यालयों का विदेशी शिक्षण संस्थानों के साथ तालमेल (MOU) बढ़ा। छात्र विनिमय कार्यक्रम (Student Exchange Programs) और वैश्विक शोध पद्धतियों के आने से भारत में अनुसंधान का स्तर उन्नत हुआ। |
1. शिक्षा का व्यावसायिकरण और बाज़ारीकरण: निजीकरण की अंधी दौड़ ने शिक्षा को 'सेवा' से हटाकर 'व्यापार' (Commodity) बना दिया। ऊँची फीस वसूलने वाले निजी स्कूलों और कोचिंग संस्थानों की बाढ़ आ गई, जिससे शिक्षा एक मुनाफे का धंधा बन गई। 2. दोहरी शिक्षा प्रणाली और सामाजिक खाई: समाज स्पष्ट रूप से दो भागों में बँट गया। समृद्ध वर्ग के बच्चों के लिए बेहतरीन वातानुकूलित निजी स्कूल और गरीब व वंचित वर्ग के बच्चों के लिए बुनियादी सुविधाओं से जूझते सरकारी स्कूल। यह व्यवस्था संवैधानिक 'समानता और सामाजिक न्याय' के सिद्धांत पर गहरा प्रहार करती है। 3. डिजिटल डिवाइड (Digital Divide): वैश्वीकरण ने तकनीक तो दी, लेकिन आर्थिक विषमता के कारण ग्रामीण और अभिवंचित पृष्ठभूमि के बच्चे (जैसे मलिन बस्तियों के बच्चे) इस डिजिटल क्रांति से दूर रह गए, जिससे उनके और शहरी बच्चों के बीच सीखने की खाई (Learning Gap) और चौड़ी हो गई। 4. भाषाई और सांस्कृतिक संकट: वैश्विक बाज़ार के दबाव में 'अंग्रेजी भाषा' का वर्चस्व अत्यधिक बढ़ गया। इससे क्षेत्रीय और घरेलू मातृभाषाओं (जैसे भोजपुरी, मैथिली, मगही) को निम्न दृष्टि से देखा जाने लगा। साथ ही, उपभोक्तावादी वैश्विक संस्कृति के प्रभाव में हमारी लोक-सांस्कृतिक जड़ों और नैतिक मूल्यों का ह्रास हुआ। |
3. सामाजिक अपेक्षाएँ और राज्य की बदलती भूमिका
इन सुधारों के दौर में राज्य (Government) की भूमिका 'नियंत्रक' से बदलकर एक 'सुविधाप्रदाता' (Facilitator) की हो गई है। समाज की इस चुनौती से निपटने के लिए राज्य ने कई कड़े कदम भी उठाए हैं:
- RTE Act 2009 की धारा 12(1)(c): निजीकरण के दौर में भी समता बनाए रखने के लिए सरकार ने निजी स्कूलों में वंचित वर्ग के बच्चों के लिए 25% सीटें आरक्षित करने का कानूनी नियम बनाया।
- समान गुणवत्ता का प्रयास: सरकारी स्कूलों के कायाकल्प के लिए 'समग्र शिक्षा अभियान' और बिहार के परिप्रेक्ष्य में 'सात निश्चय' जैसी योजनाओं के तहत इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल प्रयोगशालाओं का निर्माण किया जा रहा है ताकि दोहरी शिक्षा प्रणाली के प्रभाव को कम किया जा सके।
निष्कर्ष:
1991 के आर्थिक सुधारों ने भारतीय शिक्षा को आधुनिक, गतिशील और वैश्विक तो बनाया, लेकिन इसके साथ ही इसने समतामूलक समाज के सपने के सामने एक बड़ी चुनौती भी खड़ी कर दी। शिक्षा को बाज़ार की ताकतों के हाथों पूरी तरह नहीं छोड़ा जा सकता। एक भावी शिक्षक के रूप में आपका यह उत्तरदायित्व है कि आप अपनी कक्षा के भीतर वैश्वीकरण की आधुनिक तकनीकों का लाभ अंतिम पायदान पर खड़े बच्चे तक पहुँचाएं, ताकि आर्थिक सुधारों का लाभ समावेशी रूप से सामाजिक न्याय में बदल सके।
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