एस.सी.ई.आर.टी. (SCERT), बिहार के डी.एल.एड. (D.El.Ed.) पाठ्यक्रम के आधिकारिक पत्र S3 (कार्य और शिक्षा) के तृतीय इकाई "प्रशिक्षण केन्द्र तथा विद्यालय में कार्य और शिक्षा का संदर्भ" के अंतर्गत यह अध्याय सामाजिक जुड़ाव, कलात्मक संवेदीकरण और सामूहिक सहकारिता को विकसित करने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह अध्याय "सहकर्मियों और बच्चों के साथ मिलकर मिट्टी के रचनात्मक कार्य व मूर्तिकला का आयोजन" प्रशिक्षुओं और भावी प्राथमिक शिक्षकों को इस योग्य बनाता है कि वे संस्थान और विद्यालय स्तर पर सामूहिक गतिविधियों के माध्यम से बच्चों के रचनात्मक आयामों को निखार सकें। आपकी मुख्य परीक्षा की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए तैयार किया गया है |
---1. प्रस्तावना: सामूहिक मृदा-शिल्प कला का शैक्षिक एवं सामाजिक दर्शन (Introduction)
मृदा-शिल्प या मिट्टी का काम (Clay Modeling) मानव इतिहास की सबसे बुनियादी और प्राकृतिक कलाओं में से एक है। पिछले अध्यायों में हमने व्यक्तिगत स्तर पर मिट्टी तैयार करने और आकृतियाँ बनाने की वैज्ञानिक विधियों का अध्ययन किया था। परंतु जब इसी मृदा-शिल्प को विद्यालय या शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान के संदर्भ में 'सहकर्मियों और बच्चों के साथ सामूहिक रूप से' आयोजित किया जाता है, तो इसका स्वरूप केवल एक हस्तकला न रहकर एक अत्यंत शक्तिशाली सामाजिक और शिक्षाशास्त्रीय माध्यम (Pedagogical Medium) बन जाता है।
बाल-मनोविज्ञान और आधुनिक रचनावादी सिद्धांतों के अनुसार, सामूहिक कलात्मक गतिविधियाँ बच्चों के भीतर सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करती हैं। जब बच्चे अपने सहपाठियों, दोस्तों और शिक्षकों के साथ मिलकर मिट्टी गूँधते हैं या किसी बड़ी सामूहिक मूर्ति का निर्माण करते हैं, तो रटंत विद्या का औपनिवेशिक कड़ापन स्वतः समूल नष्ट हो जाता है। यह पहल बच्चों को प्रकृति से जोड़ती है, उनमें 'श्रम की गरिमा' (Dignity of Labor) का बीज बोती है और सहयोगात्मक अधिगम (Collaborative Learning) का व्यावहारिक धरातल प्रदान करती है।
---2. सहकर्मियों और बच्चों के साथ सामूहिक आयोजन के मुख्य उद्देश्य (Core Objectives)
संस्थान या विद्यालय स्तर पर सामूहिक रूप से मिट्टी के रचनात्मक कार्यों और मूर्तिकला को आयोजित करने के पीछे निम्नलिखित गहरे संवेगात्मक और संज्ञानात्मक उद्देश्य अंतर्निहित हैं:
- सहयोगात्मक अधिगम और सामाजिकता (Socialization): विद्यार्थियों में समूह भावना, सहकारिता, आपसी तालमेल और 'मैं' के स्थान पर 'हम' की भावना का विकास करना।
- सूक्ष्म और स्थूल गामक कौशलों का सुदृढ़ीकरण: सामूहिक रूप से भारी मात्रा में मिट्टी तैयार करने और बारीक नक्काशी करने के दौरान बच्चों के गत्यात्मक कौशलों (Gross & Fine Motor Skills) को पुख्ता करना।
- रचनात्मक स्व-अभिव्यक्ति और सौंदर्यबोध: कल्पना शक्ति को मूर्त रूप देने के अवसर प्रदान करना, जिससे बच्चों में कलात्मक संवेदनशीलता और स्थानीय लोक-कलाओं के प्रति आदर पैदा हो।
- संवेगात्मक संतुलन और उदात्तीकरण (Sublimation): मिट्टी के स्पर्श और रचनात्मक सृजन के माध्यम से बच्चों के आंतरिक संवेगों, तनाव और चंचलता को सकारात्मक दिशा प्रदान करना।
3. सामूहिक मिट्टी कार्य एवं मूर्तिकला के आयोजन की समेकित योजना (Planning for Group Clay Work)
विद्यालय स्तर पर बच्चों और सहकर्मियों के साथ मिलकर एक सफल सामूहिक आयोजन करने के लिए एक सुव्यवस्थित और चरणबद्ध समेकित योजना (Integrated Plan) का निर्माण करना अनिवार्य शर्त है। इसके क्रियान्वयन के मुख्य चरण निम्नलिखित हैं:
क. स्थान का चयन और सुरक्षात्मक नियम (Site Selection and Safety):
इस गतिविधि के लिए संस्थान के किसी खुले, हवादार और छायादार स्थान (जैसे—विद्यालय का प्रांगण, पेड़ की छांव, या कला कक्ष) का चयन किया जाता है। चूंकि मिट्टी के काम में पानी और कीचड़ का उपयोग होता है, इसलिए फर्श पर पुराने टाट के बोरे या प्लास्टिक शीट बिछाई जानी चाहिए। बच्चों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से यह कड़ाई से सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि मिट्टी में काँच के टुकड़े, लोहे की कीलें या कड़े पत्थर बिल्कुल न हों।
ख. मिश्रित योग्यता समूहों का गठन (Group Formation):
शिक्षक को पूरी कक्षा को ५ से ६ बच्चों के छोटे-छोटे 'मिश्रित योग्यता समूहों' (Mixed-ability Groups) में विभाजित करना चाहिए। प्रत्येक समूह में कुशाग्र, सामान्य, और विशेष आवश्यकता वाले (दिव्यांग) बच्चों का संतुलित समावेशन होना चाहिए। समूह के भीतर कार्यों का सुस्पष्ट श्रम-विभाजन किया जाता है; जैसे—कोई बच्चा मिट्टी गूँधने का काम करेगा, कोई आधार ढांचा तैयार करेगा, और कोई उस पर बारीक टूल्स से डिजाइनिंग करेगा।
ग. विषय-वस्तु (Themes) का तार्किक निर्धारण:
सामूहिक मूर्तिकला के लिए ऐसी विषय-वस्तुओं का चयन किया जाना चाहिए जो बच्चों के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश और पाठ्यक्रम से जुड़ी हों:
- स्थानीय पशु-पक्षी और प्रकृति: हाथी, घोड़ा, बैल, चिड़िया, पेड़-पौधे और फल-सब्जियों के यथार्थवादी मॉडल।
- सांस्कृतिक व ऐतिहासिक प्रतिमान: स्थानीय त्योहारों के दीये, खिलौने, ऐतिहासिक किले, या बिहार की पारंपरिक मिट्टी के बर्तनों की आकृतियाँ।
- पाठ्यक्रम आधारित टीएलएम (TLM): गणितीय ज्यामितीय आकृतियाँ (घन, बेलन, शंकु), या भूगोल के लिए पृथ्वी का ग्लोब और पहाड़ों के मॉडल।
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4. सामूहिक आयोजन की व्यावहारिक प्रयोगात्मक प्रक्रिया (Execution Process)
योजना के बाद वास्तविक क्रियान्वयन के दौरान शिक्षक और सहकर्मियों की भूमिका एक कड़े शासक की नहीं, बल्कि एक सहानुभूतिपूर्ण सुविधादाता (Facilitator) की होती है। प्रक्रिया को निम्नलिखित तीन चरणों में पूरा किया जाता है:
- 1. सामूहिक मिट्टी की तैयारी (Preparation): सभी बच्चे और सहकर्मी मिलकर सूखी काली या चिकनी मिट्टी को कूटते हैं, छानते हैं और पानी मिलाकर पैरों व हाथों से अच्छी तरह गूँधते हैं। यह चरण बच्चों में कठिन शारीरिक परिश्रम और सहभागिता के मूल्य को पुख्ता करता है।
- 2. सह-सृजन और मूर्तिकला (Co-creation): समूहों में बच्चे पिंच, कोइल या स्लैब विधि से बड़ी आकृतियों का निर्माण शुरू करते हैं। उदाहरण के लिए—यदि समूह 'मिट्टी का घर' बना रहा है, तो कुछ बच्चे स्लैब से दीवारें बनाते हैं और कुछ कोइल से छत गढ़ते हैं। शिक्षक जहाँ बच्चे अटकते हैं, वहाँ लेव वायगोत्स्की के सिद्धांत के अनुसार 'स्काफ़ोल्डिंग' (पाड़ या अस्थायी सहायता) प्रदान करता है।
- 3. फिनिशिंग और सुखाना (Drying): बाँस के छिले हुए पतले औजारों (Tools) की मदद से आकृतियों को अंतिम रूप दिया जाता है। इसके बाद सामूहिक कृतियों को छायादार स्थान पर सुखाने के लिए रखा जाता है।
5. सामूहिक मिट्टी के कार्य और मूर्तिकला का सुस्पष्ट एकीकृत ढांचा
मुख्य परीक्षाओं में उत्तर लेखन को अधिक प्रामाणिक, तार्किक और विज़ुअल बनाने के लिए इस पूरे अध्याय के व्यावहारिक व सामाजिक पक्षों को नीचे एक सरल रॉ-तालिका (बिना किसी सीएसएस के) के माध्यम से संकलित किया गया है:
| सामूहिक आयोजन के मुख्य चरण | सहकर्मियों व बच्चों की प्रयोगात्मक भूमिका | अनिवार्य वैज्ञानिक व सामाजिक सावधानियाँ | विकसित होने वाले जीवन कौशल एवं मूल्य |
|---|---|---|---|
| 1. योजना व समूह निर्माण | स्थान की सफ़ाई करना, टाट बिछाना, मिश्रित समूहों का गठन। | कक्षा में पूर्ण समावेशन, जेंडर तटस्थता का कड़ा पालन। | योजना निर्माण, स्थान प्रबंधन और यथार्थवादी सोच। |
| 2. मिट्टी गूँधना व सह-सृजन | मिट्टी साफ करना, पानी मिलाना, आकृतियों का सामूहिक निर्माण। | मिट्टी को कड़ों व पत्थरों से मुक्त रखना, सीधी सहायता न देकर संकेत देना। | सूक्ष्म व स्थूल गामक कौशल, हाथ-आँख समन्वय, धैर्य। |
| 3. प्रदर्शन व मूल्यांकन (CCE) | बाल-कला प्रदर्शनी का आयोजन, कृतियों की सामूहिक समीक्षा। | बच्चों के त्रुटिपूर्ण उत्पादों का उपहास न उड़ाना, पोर्टफोलियो सहेजना। | सृजनात्मकता, सहकारिता (Teamwork), आत्म-सम्मान और सौंदर्यबोध। |
6. समकालीन चुनौतियाँ: सिद्धांतों के आदर्श बनाम भारतीय स्कूलों की जमीनी हकीकत
यद्यपि पाठ्यपुस्तकों में सामूहिक मूर्तिकला की अवधारणा अत्यंत सुंदर और प्रगतिशील दिखाई देती है, परंतु समकालीन बिहार के स्कूलों के धरातल पर निम्नलिखित गंभीर और कड़े सामाजिक-प्रशासनिक अवरोध मौजूद हैं:
- 1. व्यावसायिक व जातिगत संकीर्णता: हमारे समाज में आज भी यह संकीर्ण मानसिक रूढ़िवादिता व्याप्त है कि मिट्टी सानने या गूँधने का कार्य कुछ विशिष्ट 'निचली जातियों' का पारंपरिक पेशा है। जब स्कूल में सामूहिक मिट्टी का काम आयोजित होता है, तो कुछ रूढ़िवादी अभिभावक इसका कड़ा विरोध करते हैं, जो बच्चों में श्रम की गरिमा विकसित करने के मार्ग में सबसे बड़ा रोड़ा है।
- 2. एकरस समय-सारणी (Rigid Time Table): मिट्टी तैयार करने, मूर्ति बनाने और सफ़ाई करने में कम से कम २ से ३ घंटे का निरंतर समय आवश्यक होता है। परंतु स्कूलों की समय-सारणी कड़े ४0-४0 मिनट के कालखंडों में बंटी होती है, जिससे प्रयोगात्मक गतिविधियों का प्रवाह टूट जाता है।
- 3. संसाधनों और उचित स्थान की कमी: शहरी क्षेत्रों के कंक्रीट परिसरों वाले स्कूलों में अच्छी चिकनी या काली मिट्टी आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाती, जिससे शिक्षक इस रचनात्मक विधा को केवल कागजी औपचारिकता तक सीमित रखने पर विवश हो जाते हैं।
7. सामूहिक मृदा-शिल्प को सफल बनाने में प्रोग्रेसिव शिक्षक की व्यावहारिक भूमिका
एक प्रगतिशील शिक्षक केवल चारदीवारी के भीतर शुष्क अक्षर बांचने वाला क्लर्क नहीं है, बल्कि वह बच्चों में सामाजिक समरसता और आत्मनिर्भरता गढ़ने वाला वास्तविक सामाजिक इंजीनियर (Social Engineer) है। आपको अपने संस्थान में निम्नलिखित रणनीतियाँ अपनानी चाहिए:
- शारीरिक श्रम को उत्सव का रूप देना: आरटीई 2009 के आलोक में, आपको यह कड़ाई से सुनिश्चित करना होगा कि मिट्टी का काम कभी भी बच्चों के लिए 'दण्ड' (Punishment) न बने। विद्यालय में 'बाल मृदा-कला उत्सव' या 'खिलौना मेला' का आयोजन करना चाहिए। बच्चों द्वारा बनाई गई मूर्तियों और बर्तनों की सुंदर प्रदर्शनी लगाकर अभिभावकों को आमंत्रित करना चाहिए, जिससे बच्चों का आत्म-सम्मान (Self-esteem) अत्यंत सुदृढ़ होगा।
- स्थानीय कुम्हारों को 'रोल-मॉडल' (MKO) के रूप में आमंत्रित करना: विद्यालय और समुदाय के बीच की दूरी को समाप्त करने के लिए शिक्षक को गाँव के स्थानीय कुशल कुम्हार या मूर्तिकार को विद्यालय में आमंत्रित करना चाहिए। जब वे बच्चों के साथ बैठकर सामूहिक रूप से मिट्टी तैयार करेंगे और अपने हुनर का प्रदर्शन करेंगे, तो बच्चों को कड़ियों के वैज्ञानिक सिद्धांतों की समझ तो मिलेगी ही, साथ ही समाज के श्रमजीवी वर्ग के प्रति उनके मन में गहरा संवेगात्मक आदर स्थापित हो सकेगा।
- Evaluation का पूर्णतः रचनात्मक प्रतिमान (CCE): सामूहिक मूर्तिकला के मूल्यांकन के लिए कभी भी बंद कमरे की शुष्क लिखित परीक्षा नहीं ली जानी चाहिए। शिक्षक को सतत एवं व्यापक मूल्यांकन (CCE) के तहत 'सीखने के लिए आकलन' (Assessment for Learning) की रणनीति अपनानी चाहिए। गतिविधि के दौरान बच्चों के भीतर विकसित होने वाले सामाजिक गुणों; जैसे—सहयोग की भावना, समूह में द्वंद्व सुलझाने की क्षमता, धैर्य, और संवेदनशीलता का सूक्ष्म अवलोकन (Observation) करना चाहिए और उनके प्रयासों को उनके पोर्टफोलियो में दर्ज कर उनका संवेगात्मक उत्साहवर्धन करना चाहिए।
- जेंडर रूढ़िवादिता का कड़ा प्रतिवाद (Deconstructing Gender Stereotypes): प्रोग्रेसिव शिक्षक के रूप में आपको समाज की इस सोच को कड़ाई से तोड़ना होगा कि "मिट्टी सानना, भारी कीचड़ का काम केवल लड़कों का है और मूर्तियों पर केवल बिंदी लगाना या रंगाई करना लड़कियों का काम है।" समावेशी शिक्षा के तहत सभी छात्र-छात्राओं को प्रत्येक चरण में समान रूप से सहभागिता के अवसर मिलने चाहिए ताकि एक समतामूलक समाज की स्थापना हो सके।
8. निष्कर्ष (Conclusion)
सहकर्मियों और बच्चों के साथ मिलकर मिट्टी के रचनात्मक कार्य व मूर्तिकला का आयोजन का यह गहन, व्यापक और प्रामाणिक मनोवैज्ञानिक अध्ययन हमें यह अमूल्य चेतना प्रदान करता है कि "मिट्टी की सोंधी महक, सहपाठियों का साथ और उंगलियों के सामूहिक सृजन में ही सच्चे संज्ञान और समतावादी संवेगों का संतुलित सर्वांगीण विकास छिपा होता है।" सामूहिक मृदा-शिल्प बच्चों को केवल खिलौने बनाना नहीं सिखाता, बल्कि उन्हें एक-दूसरे से जोड़कर एक न्यायपूर्ण समाज का निर्माण करना सिखाता है।
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