बिहार डी.एल.एड. (D.El.Ed) और बी.एड. (B.Ed) के प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम में पत्र S2 (संज्ञान, सीखना और बाल विकास) बाल-मनोविज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण आधार स्तंभ है। इस पत्र की प्रथम इकाई "बच्चे में संज्ञानात्मक एवं संप्रत्यय विकास" के अंतर्गत पहला अध्याय "संज्ञानात्मक विकास का अर्थ, संकल्पना एवं संज्ञान में निहित प्रमुख प्रक्रियाएँ (संवेदीकरण, प्रत्यक्षीकरण)" है। विद्यालय में बच्चों के सीखने-सिखाने की पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए शिक्षकों के लिए इस विषय पर एक सुदृढ़ और व्यापक समझ होना अनिवार्य है। आपकी वेबसाइट के पाठकों और प्रशिक्षुओं के लिए परीक्षा के दृष्टिकोण से तैयार किया गया कम से कम 1500 शब्दों का अत्यंत विस्तृत और प्रामाणिक नोट्स नीचे दिया गया है:

1. प्रस्तावना: संज्ञान क्या है? (Introduction to Cognition)

एक शिक्षक के रूप में हमारे सामने प्रतिदिन यह सवाल उठता है कि बच्चे किस प्रकार से सोचते हैं? वे अपने आस-पास के परिवेश और पर्यावरण का अनुभव कैसे करते हैं? रोजमर्रा के जीवन में आने वाली छोटी-बड़ी समस्याओं का समाधान वे किस प्रकार निकालते हैं? वास्तव में ज्ञान, कौशल, समस्या समाधान एवं किसी भी विषय-वस्तु को बेहतर ढंग से समझने की इसी क्षमता के क्रमिक विकास को हम मानसिक या संज्ञानात्मक विकास कहते हैं। यह विकास बच्चे को उसकी दुनिया के बारे में सोचने, तर्क करने और एक परिपक्व दृष्टिकोण विकसित करने में मदद करता है।

मनोवैज्ञानिक अवधारणा के अनुसार, संज्ञान (Cognition) वह आंतरिक मानसिक क्रिया या प्रक्रिया है जिसके द्वारा ज्ञानार्जन (Acquisition of Knowledge) संभव होता है। शिक्षाशास्त्र में संज्ञान शब्द का प्रयोग अक्सर 'सीखने' और 'चिंतन' की जटिल प्रक्रियाओं की व्याख्या करने के लिए किया जाता है। यदि इसके भाषाई मूल को देखें, तो कॉगनिशन (Cognition) शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के 'कॉगनोसियर' (Cognoscere) शब्द से हुई है, जिसका सीधा और स्पष्ट अर्थ होता है—'जानना या ज्ञान प्राप्त करना'

2. संज्ञानात्मक विकास का अर्थ एवं संकल्पना (Concept of Cognitive Development)

संज्ञानात्मक विकास से तात्पर्य बच्चे की उन सभी मानसिक शक्तियों और योग्यताओं के क्रमिक विकास से है, जिसमें सोचना, समझना, स्मरण करना (मेमोरी), विचार करना, ध्यान लगाना (अवधान), प्रत्यक्ष ज्ञान, संप्रत्यय निर्माण, जिज्ञासा और कठिन परिस्थितियों में तार्किक चिंतन करना शामिल है। संज्ञानात्मक सिद्धांत के अंतर्गत मुख्य रूप से इस बात की विवेचना की जाती है कि मनुष्यों में स्वयं के प्रति और उनके संपूर्ण वातावरण के प्रति विवेक किस प्रकार जाग्रत और विकसित होता है।

मनुष्यों द्वारा किए जाने वाले लगभग सभी कार्यों में मानसिक प्रक्रियाएँ शामिल रहती हैं। बच्चे जैसे-जैसे आयु और परिपक्वता के स्तर पर बड़े होते जाते हैं, वैसे-वैसे उनकी मानसिक योग्यताएँ और क्षमताएँ भी बढ़ती जाती हैं। यही कारण है कि जिन समस्याओं को वे अपने बचपन (शैशवावस्था) में नहीं सुलझा पाते थे, उन्हें बाल्यावस्था या किशोरावस्था में पहुँचते ही अपनी तार्किक शक्तियों के बल पर आसानी से सुलझाने लगते हैं।

मनोवैज्ञानिक एस.के. मंगल (2016) के अनुसार, मानसिक या संज्ञानात्मक विकास का वास्तविक तात्पर्य बालक की उन सभी मानसिक योग्यताओं और क्षमताओं में वृद्धि और विकास से है, जिसके परिणामस्वरूप वह अपने निरंतर बदलते हुए वातावरण में ठीक प्रकार से समायोजन (Adjustment) करता है और बड़ी से बड़ी कठिन तथा उलझनपूर्ण समस्याओं को सुलझाने में अपनी मानसिक शक्तियों को पूरी तरह समर्थ पाता है।

3. संज्ञान में निहित प्रमुख प्रक्रियाएँ (Important Processes in Cognition)

संज्ञानात्मक विकास कोई एकाकी चरण नहीं है, बल्कि यह कई छोटी-बड़ी मानसिक प्रक्रियाओं का एक सुव्यवस्थित और क्रमिक समुच्चय है। जब बच्चा किसी उद्दीपक (Object/Situation) के संपर्क में आता है, तो उसका मस्तिष्क ज्ञान निर्माण के लिए कई स्तरों पर कार्य करता है। इस अध्याय के संदर्भ में संज्ञान में निहित दो सबसे प्राथमिक और महत्वपूर्ण प्रक्रियाएँ निम्नलिखित हैं:

  • संवेदीकरण या संवेदना (Sensation)
  • प्रत्यक्षीकरण (Perception)

आइए इन दोनों प्रक्रियाओं का दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक संदर्भ में विस्तृत विश्लेषण करें:

4. संवेदीकरण या संवेदना: ज्ञान की पहली सीढ़ी (Sensation)

संवेदीकरण संज्ञान की सबसे प्राथमिक और सरलतम मानसिक प्रक्रिया है। हमारे शरीर में बाह्य वातावरण के उद्दीपनों को ग्रहण करने के लिए पांच ज्ञानेंद्रियाँ मौजूद हैं—आँख (दृश्य), कान (श्रवण), नाक (घ्राण), जीभ (स्वाद), और त्वचा (स्पर्श)। इन ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से हमें अपने चारों ओर के वातावरण से जो कुछ भी प्रारंभिक और अनफ़िल्टर्ड अनुभूति होती है, उसे मनोवैज्ञानिक भाषा में 'संवेदना' (Sensation) कहते हैं।

संवेदना को "ज्ञान का प्रवेश द्वार" भी कहा जाता है। जब कोई प्रकाश तरंग हमारी आँखों से टकराती, या कोई ध्वनि तरंग हमारे कानों के परदे को छूती है, तो हमारा मस्तिष्क केवल एक संवेदी इनपुट दर्ज करता है। इस स्थिति में मस्तिष्क को केवल यह आभास होता है कि "कुछ है", लेकिन वह "क्या है", इसका कोई निश्चित अर्थ या पहचान इस चरण में नहीं बन पाती है।

शैशवावस्था में, विशेष रूप से जीवन के शुरुआती महीनों में, baby की ज्ञानेंद्रियाँ पूरी तरह से परिपक्व और प्रशिक्षित नहीं होती हैं। फलस्वरूप, वे अपने आस-पास की वस्तुओं को केवल एक धुंधली संवेदना के रूप में महसूस करते हैं, लेकिन उनसे कोई विशेष अर्थ या निष्कर्ष निकालने में पूरी तरह असमर्थ होते हैं।

5. प्रत्यक्षीकरण: संवेदना को अर्थ देना (Perception)

प्रत्यक्षीकरण संज्ञानात्मक विकास का एक उच्चतर और अर्थपूर्ण पहलू है। जब हमारा मस्तिष्क ज्ञानेंद्रियों से प्राप्त 'संवेदना' (Sensation) की व्याख्या करता है, उसे अपने पुराने अनुभवों के साथ जोड़ता है और उसका एक निश्चित, स्पष्ट और तार्किक नाम या अर्थ निकालने की चेष्टा करता है, तो वह प्रक्रिया 'प्रत्यक्षीकरण' (Perception) कहलाती है।

सरल शब्दों में कहें तो: संवेदना + अर्थ = प्रत्यक्षीकरण

जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते जाते हैं, उनके अनुभवों का दायरा बढ़ता है और उनकी ज्ञानेंद्रियों की कार्यकुशलता में सुधार होता है। इसके परिणामस्वरूप उनके प्रत्यक्षीकरण का अनुभव अधिक निश्चित, अर्थपूर्ण और वैज्ञानिक होता जाता है। बच्चों में प्रत्यक्षीकरण की योग्यता उनकी जिज्ञासा और उनके द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तर खोजने के प्रयासों से अत्यधिक तीव्र होती है।

6. संवेदीकरण और प्रत्यक्षीकरण को दृष्टांत से समझें (The Burning Candle Example)

पाठ्य-पुस्तक में दिया गया 'जलती मोमबत्ती' का उदाहरण संवेदना और प्रत्यक्षीकरण के अंतर और उनके अंतर्संबंध को समझने का सबसे बेहतरीन और प्रामाणिक माध्यम है:

एक छोटा शिशु जब पहली बार कमरे में जलती हुई मोमबत्ती या दीपक की रोशनी को देखता है, तो वह उसकी चमक की ओर आकर्षित होता है और खुश होता है। इस पहले चरण में, आँखों के माध्यम से केवल प्रकाश की अनुभूति होना 'संवेदना' (Sensation) है। चूंकि बच्चे के पास पूर्व का कोई कड़वा अनुभव नहीं है, इसलिए वह यह नहीं समझ पाता कि इस चमकती हुई सुंदर वस्तु को छूने से उसका हाथ जल सकता है।

एक दिन जब अभिभावकों की अनुपस्थिति में वह बच्चा कौतूहलवश उस जलती हुई मोमबत्ती की लौ को अपनी उंगलियों से छू लेता है, तो उसकी त्वचा को अत्यधिक जलन का तीखा अनुभव होता है और वह रोने लगता है। यह जलन का अनुभव भी एक शारीरिक संवेदना है।

लेकिन इसके बाद, भविष्य में जब वह बच्चा कभी किसी अन्य जलते हुए दीपक, बिजली के चमकते बल्ब या आग को देखता है, तो उसका मस्तिष्क तुरंत पुराने जलने वाले अनुभव को याद करता है। वह समझ जाता है कि 'चमकने वाली और गर्म दिखने वाली चीजों को छूने से हाथ जल सकता है'। अब वह चमकते हुए दीपक को देखकर अपना हाथ पीछे खींच लेता है। इस अवस्था में, प्रकाश की संवेदना को 'खतरे या जलन' के अर्थ के साथ जोड़कर देखना ही वास्तविक 'प्रत्यक्षीकरण' (Perception) कहलाता है।

7. संज्ञानात्मक विकास और सीखने का अंतर्संबंध (Cognition and Learning)

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF 2005) के अनुसार, सीखना (Learning) ज्ञान के निर्माण की एक सक्रिय प्रक्रिया है। बच्चे किसी भी कक्षा कक्ष में मूक दर्शक या निष्क्रिय प्राप्तकर्ता (Passive Learners) नहीं होते हैं, बल्कि वे अपने परिवेश में स्वयं खोज करके, प्रमाण जुटाकर और अपने अनुभवों को पुराने ज्ञान के साथ पुनः व्यवस्थित करके ज्ञान का सृजन करते हैं।

यदि बच्चों को विद्यालय में आत्म-अभिव्यक्ति की, खुलकर अपने मन की शंकाएं रखने की या प्रश्न पूछने की अनुमति नहीं दी जाती, तो वे पूरी तरह निष्क्रिय हो जाते हैं और उनका संज्ञानात्मक मूल्य समाप्त हो जाता है। इसके विपरीत, ऐतिहासिक रूप से जे.बी. वाटसन जैसे पारंपरिक व्यवहारवादी विचारक बच्चे को एक 'खाली स्लेट' (Tabula Rasa) मानते थे, जिस पर पर्यावरण के दबावों द्वारा कुछ भी लिखा जा सकता है। वाटसन का प्रसिद्ध कथन था: "मुझे एक दर्जन स्वस्थ बच्चे दें, आप जैसा चाहें मैं उनको उस रूप (डॉक्टर, वकील या चोर) में बना दूँगा।"

परंतु आधुनिक बाल-मनोविज्ञान और शिक्षाशास्त्र (विशेषकर जीन पियाजे का रचनावाद) यह स्पष्ट करता है कि बच्चों का सीखना उनकी संज्ञानात्मक परिपक्वता और उनके द्वारा की जाने वाली सक्रिय अंतःक्रियाओं पर निर्भर करता है। कोहलर ने भी अपने प्रयोगों में प्रमाणित किया कि सीखना केवल हाथ-पैर मारना नहीं है, बल्कि अपनी सूझबूझ और अतंदृष्टि (Insight) का प्रयोग करना है। लेविन ने भी स्पष्ट किया कि सीखना व्यक्ति और उसके संपूर्ण वातावरण दोनों का संयुक्त प्रतिफल होता है।

8. शिक्षकों के लिए इस अध्याय का नीतिगत व व्यावहारिक महत्व

एक प्राथमिक या उच्च प्राथमिक शिक्षक के लिए बच्चों के संवेदीकरण और प्रत्यक्षीकरण की सीमाओं को जानना निम्नलिखित कारणों से अत्यंत आवश्यक है:

  • यह जानने में मदद करता है कि विभिन्न आयु वर्ग में बच्चों के परिवेशीय अनुभवों का स्वरूप कैसा होता है।
  • शिक्षक अपनी कक्षा कक्ष की गतिविधियों को इस प्रकार रूपायित कर सकते हैं जिससे बच्चों की सभी ज्ञानेंद्रियों को सक्रिय होने का अवसर मिले (जैसे दृश्य-श्रव्य सामग्री का संतुलित उपयोग)।
  • बच्चों के त्रुटिपूर्ण प्रत्यक्षीकरण या गलत अवधारणाओं को डांटने के बजाय, उन्हें नए प्रत्यक्ष अनुभव देकर सुधारा जा सकता है (जैसे कि मोमबत्ती के उदाहरण से स्पष्ट है)।

निष्कर्ष:

संज्ञानात्मक विकास कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं है जो अचानक घटित हो जाए, बल्कि यह संवेदीकरण से शुरू होकर प्रत्यक्षीकरण, संप्रत्यय निर्माण और समस्या समाधान की उच्चतर सीढ़ियों तक पहुँचने वाला एक निरंतर चलने वाला विकासात्मक सफर है। विद्यालयी संदर्भ में, एक संवेदनशील शिक्षक वही है जो यह समझ सके कि प्रत्येक बच्चे के प्रत्यक्षीकरण की गति और उसका परिवेशीय अनुभव भिन्न हो सकता है। कक्षा को केवल व्याख्यान तक सीमित न रखकर, बच्चों को सक्रिय खोजबीन और वास्तविक अनुभवों के अवसर प्रदान करके ही हम उनके संज्ञानात्मक विकास को सही दिशा दे सकते हैं।