बिहार डी.एल.एड. (D.El.Ed) और बी.एड. (B.Ed) के प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम में पत्र S2 (संज्ञान, सीखना और बाल विकास) के अंतर्गत व्यवहारवादी सिद्धांतों का गहरा और तुलनात्मक अध्ययन करना एक अनिवार्य कौशल है। इस पत्र की तृतीय इकाई "सीखने के व्यवहारवादी एवं सूचना प्रसंस्करण सिद्धांतों की समझ" के अंतर्गत अध्याय 5: "अनुक्रिया अनुबंधन (पॉवलॉव) और सक्रिय अनुबंधन (स्किनर) में तुलनात्मक अंतर" बाल-मनोविज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण विमर्श प्रस्तुत करता है। यह अध्याय हमें यह समझने की सूक्ष्म दृष्टि देता है कि वातावरण के उद्दीपनों के प्रति होने वाली निष्क्रिय अनुक्रियाओं और प्राणी द्वारा स्वयं सक्रिय होकर किए जाने वाले व्यवहारों के अनुबंधन में क्या अंतर है।
---1. प्रस्तावना: व्यवहारवाद के दो महान स्तंभ (Introduction to behaviorist pillars)
मनोविज्ञान के इतिहास में सीखने (Learning) की प्रक्रिया को वैज्ञानिक, वस्तुनिष्ठ और प्रयोगधर्मी बनाने का वास्तविक श्रेय व्यवहारवादी दृष्टिकोण (Behaviorist View) को जाता है। व्यवहारवाद यह मानता है कि सीखने का मूल आधार व्यक्ति के बाह्य और प्रकट व्यवहार में होने वाला वह परिवर्तन है जिसे प्रयोगशाला में प्रत्यक्ष रूप से देखा और मापा जा सकता है। इस विचारधारा के अंतर्गत 'अनुबंधन' (Conditioning) को सीखने की सबसे प्रमुख तकनीक माना गया है।
व्यवहारवाद की इस इमारत को पुख्ता करने में दो अलग-अलग कालखंडों में दो महान मनोवैज्ञानिकों का सबसे बड़ा योगदान रहा:
- 1. इवान पेट्रोविच पॉवलॉव (Ivan P. Pavlov): जिन्होंने बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ (1904 के नोबेल पुरस्कार शोध के बाद) में 'शास्त्रीय अनुबंधन सिद्धांत' (Classical Conditioning Theory) का प्रतिपादन किया, जिसे 'टाइप-S अनुबंधन' भी कहा जाता है।
- 2. बुरहस फ्रेडरिक स्किनर (B.F. Skinner): जिन्होंने वर्ष 1938 में पॉवलॉव के यांत्रिक कड़ेपन को चुनौती देते हुए 'सक्रिय अनुबंधन सिद्धांत' (Operant Conditioning Theory) की नींव रखी, जिसे 'टाइप-R अनुबंधन' या क्रियाप्रसूत अनुबंधन कहा जाता है।
जहाँ पॉवलॉव का सिद्धांत प्राणी को पर्यावरण के उद्दीपनों के सामने पूरी तरह 'निष्क्रिय' मानता है, वहीं स्किनर का सिद्धांत प्राणी को अपने पर्यावरण में 'सक्रिय' होकर स्वतंत्र अनुक्रियाएँ करने वाले जीव के रूप में स्थापित करता है। इन दोनों सिद्धांतों के बारीक अंतरों को समझे बिना एक शिक्षक अपनी समावेशी कक्षा में व्यवहार संशोधन (Behavior Modification) की तकनीकों का सटीक उपयोग नहीं कर सकता है।
---2. आई.पी. पॉवलॉव का अनुक्रिया अनुबंधन: एक संक्षिप्त पुनरावलोकन (Classical Conditioning Review)
पॉवलॉव के शास्त्रीय अनुबंधन का मूल दर्शन इस बात पर टिका है कि प्रत्येक प्राणी के भीतर कुछ प्राकृतिक उद्दीपकों (जैसे—भोजन) के प्रति स्वाभाविक अनुक्रिया (जैसे—लार टपकना) करने की जन्मजात जैविक क्षमता होती है। यदि इस स्वाभाविक उद्दीपक के साथ बार-बार कोई कृत्रिम या तटस्थ उद्दीपक (जैसे—घंटी की आवाज) प्रस्तुत किया जाए, तो प्राणी कृत्रिम उद्दीपक के साथ एक साहचर्य (Association) स्थापित कर लेता है।
पॉवलॉव के कुत्ते वाले प्रयोग में, कुत्ता घंटी की आवाज सुनते ही लार टपकाना सीख जाता है, भले ही वहाँ भोजन मौजूद न हो। यहाँ उद्दीपक (Stimulus - घंटी) अनुक्रिया से पहले आता है, इसलिए इसे **'उद्दीपक-उन्मुख' (Stimulus-driven)** या टाइप-S अनुबंधन कहा जाता है। इसमें प्राणी पूरी तरह से नियंत्रित और विवश होता है, वह अपनी मर्जी से कोई स्वतंत्र हलचल नहीं कर सकता।
---3. बी.एफ. स्किनर का सक्रिय अनुबंधन: एक संक्षिप्त पुनरावलोकन (Operant Conditioning Review)
पॉवलॉव के विपरीत, स्किनर का सक्रिय अनुबंधन सिद्धांत यह प्रतिपादित करता है कि प्राणी वातावरण में केवल बाह्य उद्दीपनों के दबाव में ही प्रतिक्रिया नहीं करता, बल्कि वह स्वयं आगे बढ़कर स्वतंत्र रूप से अनेक अनुक्रियाएँ (Operants) करता रहता है। यदि प्राणी द्वारा की गई किसी स्वतंत्र अनुक्रिया के तुरंत बाद उसे कोई सुखद परिणाम या 'पुनर्बलन' (Reinforcement) प्राप्त होता है, तो उसके व्यवहार के दोबारा दोहराए जाने की संभावना बहुत बढ़ जाती है।
स्किनर के बॉक्स प्रयोग में, भूखा चूहा पहले स्वतंत्र रूप से घूमता है और पैर मारता है (अनुक्रिया)। जब अचानक उसका पैर लीवर पर पड़ता है और उसे भोजन (पुनर्बलन) मिलता है, तो वह लीवर दबाना सीख जाता है। यहाँ अनुक्रिया (Response) पहले होती है और उद्दीपक/पुनर्बलन बाद में मिलता है, इसलिए इसे **'अनुक्रिया-उन्मुख' (Response-driven)** या टाइप-R अनुबंधन कहा जाता है।
---4. अनुक्रिया अनुबंधन और सक्रिय अनुबंधन में व्यापक तुलनात्मक अंतर
डी.एल.एड. और बी.एड. की मुख्य परीक्षाओं के दृष्टिकोण से इन दोनों सिद्धांतों के अंतर को एक स्पष्ट और सरल रॉ-तालिका (बिना किसी सीएसएस के) के माध्यम से नीचे वर्गीकृत किया गया है, ताकि प्रशिक्षु इसे आसानी से याद रख सकें:
| तुलना का आधार (CRITERIA) | अनुक्रिया अनुबंधन - पॉवलॉव (CLASSICAL) | सक्रिय अनुबंधन - स्किनर (OPERANT) |
|---|---|---|
| सिद्धांत के अन्य नाम | शास्त्रीय अनुबंधन, सम्बद्ध अनुक्रिया सिद्धांत, टाइप-S अनुबंधन। | क्रियाप्रसूत अनुबंधन, साधनात्मक अनुबंधन, टाइप-R अनुबंधन। |
| प्रवर्तक और देश | इवान पी. पॉवलॉव (रूस, वर्ष 1904 नोबेल पुरस्कार विजेता)। | बुरहस फ्रेडरिक स्किनर (अमेरिका, वर्ष 1938)। |
| प्रयोग का मुख्य जीव | एक भूखा कुत्ता (मेज पर बंधा हुआ)। | एक भूखा सफेद चूहा और कबूतर (स्किनर बॉक्स में)। |
| उद्दीपन व अनुक्रिया का क्रम | यहाँ उद्दीपक (Stimulus) पहले प्रस्तुत किया जाता है और अनुक्रिया बाद में होती है। | यहाँ अनुक्रिया (Response) पहले होती है और उद्दीपक/पुनर्बलन बाद में मिलता है। |
| प्राणी की भूमिका | प्राणी पूरी तरह निष्क्रिय (Passive) होता है, वह उद्दीपक के वश में होता है। | प्राणी पूरी तरह सक्रिय (Active) होता है, वह स्वतंत्र क्रियाएँ करता है। |
| व्यवहार का नियंत्रण | व्यवहार पूरी तरह से स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (Autonomic Nervous System) और अनैच्छिक पेशियों द्वारा नियंत्रित होता है। | व्यवहार केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (Central Nervous System) और ऐच्छिक मांसपेशियों के नियंत्रण में होता है। |
| व्यवहार का स्वरूप | यह व्यवहार 'उत्सर्जित' या निकाला गया (Elicited) होता है (उद्दीपक देखकर लार अपने आप निकलती है)। | यह व्यवहार प्राणी द्वारा स्वयं 'प्रकट' या उत्सर्जित (Emitted) किया जाता है (लीवर दबाना)। |
| सीखने का मुख्य आधार | प्राकृतिक और कृत्रिम उद्दीपकों के बीच स्थापित होने वाला साहचर्य (Association) है। | की गई अनुक्रिया के बाद मिलने वाला सुखद परिणाम या पुनर्बलन (Reinforcement) है। |
| पुनर्बलन की भूमिका | इसमें पुनर्बलन (भोजन) अनुक्रिया से पहले ही स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। | इसमें पुनर्बलन (भोजन) अनुक्रिया के सफल संपादन के बाद ही गुप्त रूप से प्राप्त होता है। |
| विलोपन (Extinction) की प्रकृति | यदि कृत्रिम उद्दीपक (घंटी) के बाद भोजन न दिया जाए, तो अनुक्रिया बहुत तेजी से विलोपित हो जाती है। | आंशिक पुनर्बलन के कारण इसमें सीखे गए व्यवहार का विलोपन बहुत धीरे-धीरे और कठिनता से होता है। |
| शैक्षणिक मुख्य उपयोग | यह शिशुओं में आदतों के निर्माण, शब्दार्थ संबंध और भय दूर करने में सर्वोत्तम है। | यह कठिन संप्रत्ययों को खंडों में सिखाने, शेपिंग (Shaping) और व्यवहार संशोधन में सर्वोत्तम है। |
5. मानसिक प्रक्रियाओं के स्तर पर अंतर (Divergence in Mental Processes)
यद्यपि दोनों ही व्यवहारवादी सिद्धांत हैं, परंतु इनके अंतर्गत होने वाली मानसिक और संज्ञानात्मक कड़ियों में गहरा अंतर पाया जाता है, जिसका सूक्ष्म विश्लेषण निम्नलिखित पाँच बिंदुओं में किया गया है:
1. उद्दीपक सामान्यीकरण (Stimulus Generalization) की भिन्नता:
पॉवलॉव के सिद्धांत में सामान्यीकरण पूरी तरह से उद्दीपक (घंटी) की बनावट या ध्वनि पर निर्भर करता है। कुत्ता मूल घंटी से मिलती-जुलती किसी भी अन्य आवाज पर लार टपका देता है। इसके विपरीत, स्किनर के सिद्धांत में अनुक्रिया का सामान्यीकरण होता है। यदि चूहे ने दाहिने हाथ से लीवर दबाना सीखा है, तो पुनर्बलन मिलने पर वह बाएं हाथ या मुँह से भी लीवर दबाने की कोशिश करता है। स्कूलों में बच्चा जब धनात्मक पुनर्बलन पाता है, तो वह केवल एक विषय में नहीं, बल्कि अन्य विषयों में भी अच्छे उत्तर देने का प्रयास करने लगता है।
2. विभेदीकरण (Discrimination) की कड़ियाँ:
पॉवलॉव में विभेदीकरण का अर्थ दो उद्दीपनों (जैसे—भोजन देने वाली घंटी और भोजन न देने वाली घंटी) के बीच बारीक अंतर को पहचानना है। स्किनर में विभेदीकरण का संबंध 'विभेदात्मक उद्दीपक' (Discriminative Stimulus) से होता है। चूहा यह पहचान जाता है कि बक्से में जब हरी बत्ती जलेगी, तभी लीवर दबाने पर भोजन मिलेगा और लाल बत्ती जलने पर लीवर दबाने से कुछ नहीं मिलेगा। कक्षा में छात्र यह समझ जाता है कि किस शिक्षक के सामने कैसा व्यवहार करने पर प्रशंसा (पुनर्बलन) मिलेगी और किसके सामने अनुशासनहीनता करने पर नकारात्मक परिणाम भुगतने होंगे।
3. विलोपन (Extinction) का स्वरूप:
पॉवलॉव के अनुसार, यदि कृत्रिम उद्दीपक (घंटी) के तुरंत बाद स्वाभाविक उद्दीपक (भोजन) को हमेशा के लिए हटा लिया जाए, तो अनुबंधित अनुक्रिया (लार आना) का बहुत तीव्र गति से विलोपन हो जाता है। स्किनर का सिद्धांत यह प्रमाणित करता है कि यदि सही कार्य के बाद पुनर्बलन मिलना बंद हो जाए, तो व्यवहार तो बंद होगा, लेकिन यदि बच्चे को आंशिक पुनर्बलन अनुसूची (Partial Reinforcement Schedule) के तहत रुक-रुक कर इनाम दिया गया था, तो वह व्यवहार इतनी आसानी से नष्ट नहीं होता। वह लंबे समय तक छात्र की आदतों में बना रहता है।
4. शेपिंग या आकृति निर्माण (Shaping / Successive Approximations):
यह प्रक्रिया केवल स्किनर के सक्रिय अनुबंधन में ही संभव है, पॉवलॉव के सिद्धांत में इसका पूरी तरह से अभाव है। स्किनर के अनुसार, किसी भी जटिल या कठिन व्यवहार को एक बार में नहीं सीखा जा सकता। शिक्षक छात्र के व्यवहार को छोटे-छोटे क्रमिक चरणों में विभाजित करता है और प्रत्येक सफल चरण पर धनात्मक पुनर्बलन देकर उसके व्यवहार को एक वांछित रूप (Shape) प्रदान करता है। मूक-बधिर बच्चों को बोलना सिखाना या गंभीर अधिगम अक्षमता (जैसे—डिस्ग्राफिया, डिस्लेक्सिया) से पीड़ित बच्चों को बुनियादी कौशल सिखाना इसी शेपिंग तकनीक पर निर्भर करता है।
5. पुनर्बलन का नियोजन और समय अंतराल:
पॉवलॉव के अनुक्रिया अनुबंधन में कृत्रिम उद्दीपक और स्वाभाविक उद्दीपक के बीच का समय अंतराल अत्यंत न्यूनतम होना चाहिए (लगभग 0.5 सेकंड)। यदि घंटी बजाने के दस मिनट बाद भोजन दिया जाए, तो कुत्ता कभी अनुबंधित नहीं हो पाएगा। स्किनर के सक्रिय अनुबंधन में समय अंतराल का नियम अनुक्रिया और पुनर्बलन के बीच काम करता है। छात्र द्वारा सही कार्य करने के तुरंत बाद उसे पुरस्कार या प्रतिपुष्टि मिलनी चाहिए। यदि छात्र आज परीक्षा में प्रथम आया है और उसे पुरस्कार एक साल बाद दिया जाए, तो उस पुनर्बलन का संज्ञानात्मक मूल्य पूरी तरह नष्ट हो जाता है।
---6. दोनों सिद्धांतों की समकालीन आलोचनात्मक समीक्षा (Critical Comparison)
आधुनिक संज्ञानात्मक और निर्माणवादी मनोवैज्ञानिकों (जैसे—जीन पियाजे, लेव वायगोत्स्की, जेोम ब्रुनर) ने व्यवहारवाद के इन दोनों महान सिद्धांतों की कड़े शब्दों में समीक्षा की है:
- पॉवलॉव के सिद्धांत की सबसे बड़ी कमी यह है कि यह मनुष्य को पूरी तरह से परिस्थिति का दास या लाचार जीव बना देता है, जो केवल बाहरी घंटी बजने पर अपनी लार टपकाता है। यह मानव मस्तिष्क की स्वतंत्र सोच, चेतना और रचनात्मकता को पूरी तरह खारिज करता है।
- स्किनर के सिद्धांत की आलोचना इस आधार पर की जाती है कि यह बच्चों को केवल 'पुरस्कार या पुनर्बलन' के लालच में काम करने वाला एक यांत्रिक रोबोट बना देता है। यदि कक्षा कक्ष में प्रत्येक छोटे कार्य के लिए बार-बार बाहरी चॉकलेट, स्टार या खिलौने दिए जाएं, तो बच्चों की अपनी वास्तविक आंतरिक अभिप्रेरणा (Intrinsic Motivation) नष्ट हो जाती है। जब पुरस्कार मिलना बंद हो जाता है, तो बच्चे पढ़ना भी बंद कर देते हैं।
- दोनों ही सिद्धांतों का विकास प्रयोगशाला के बंद और कृत्रिम वातावरण में चूहों, बिल्लियों और कुत्तों पर प्रयोग करके किया गया था, इसलिए इनके निष्कर्षों को एक संवेदनशील, चिंतनशील और सामाजिक मानव शिशु पर हूबहू लागू करना पूरी तरह से न्यायसंगत नहीं माना जा सकता है।
7. शिक्षकों के लिए कक्षा कक्ष में व्यावहारिक शैक्षिक निहितार्थ
तमाम आलोचनाओं के बावजूद, एक प्राथमिक और उच्च प्राथमिक शिक्षक के लिए इन दोनों सिद्धांतों का तुलनात्मक ज्ञान होना एक अचूक अस्त्र की तरह काम करता है। शिक्षक अपनी कक्षा की विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए इन दोनों का संयोजन निम्नलिखित रूपों में कर सकता है:
- आदतों के निर्माण और भय निवारण में पॉवलॉव का उपयोग (Habit Formation): प्राथमिक कक्षाओं के बहुत छोटे शिशुओं में, जिनमें अभी तार्किक बुद्धि का विकास नहीं हुआ है, अच्छी सामाजिक आदतें गढ़ने (जैसे—समय पर स्कूल आना, नाखून साफ रखना, बड़ों को प्रणाम करना) के लिए पॉवलॉव का अनुक्रिया अनुबंधन सबसे उत्तम है। इसके साथ ही, यदि किसी बच्चे के मन में स्कूल, परीक्षा या गणित विषय के प्रति कोई अकारण भय (Phobia) बैठ गया है, तो शिक्षक कक्षा में एक अत्यंत प्रेमपूर्ण, आनंदमयी और भयमुक्त वातावरण (सकारात्मक उद्दीपक) प्रस्तुत करके उसके उस डर का वि-अनुबंधन (De-conditioning) कर सकता है।
- कठिन पाठ्यक्रमों और व्यवहार संशोधन में स्किनर का उपयोग (Behavior Modification): जब कक्षा में बच्चों को कोई जटिल संप्रत्यय, विज्ञान के नियम या गणितीय संक्रियाएं सिखानी हों, तो शिक्षक को स्किनर के 'कार्यों के विश्लेषण' (Task Analysis) और 'शेपिंग' (Shaping) की तकनीक का सहारा लेना चाहिए। शिक्षक को पूरे कठिन पाठ को छोटे-छोटे रोचक अंशों में तोड़ देना चाहिए और प्रत्येक अंश को पूरा करने पर छात्र को तत्काल धनात्मक पुनर्बलन (जैसे—"शाबाश!", "बहुत अच्छे!") देना चाहिए, जिससे मंदबुद्धि और पिछड़े बच्चे भी आसानी से सीख जाते हैं।
- दण्ड का पूर्ण निषेध (No Punishment Policy): स्किनर का सिद्धांत बाल-मनोविज्ञान के धरातल पर यह कड़ाई से प्रमाणित करता है कि बच्चों को मारना, डाँटना या मानसिक रूप से प्रताड़ित करना (दण्ड देना) उनके अधिगम को सुधारने में पूरी तरह विफल साबित होता है। दण्ड देने से बच्चे स्कूल से भागने लगते हैं (Drop-out बढ़ता है) और उनमें हीनभावना व विद्रोह के संवेग जाग्रत होते हैं। इसलिए आरटीई 2009 के तहत भी शारीरिक दण्ड को कानूनी रूप से प्रतिबंधित किया गया है। शिक्षक को अवांछित व्यवहार को सुधारने के लिए दण्ड के स्थान पर 'विलोपन' या धनात्मक पुनर्बलन को रोक लेने की नीति अपनानी चाहिए।
- अभिक्रमित अनुदेशन और स्व-अधिगम (Programmed Instruction): स्किनर के सिद्धांत पर आधारित अभिक्रमित अनुदेशन की प्रविधियों द्वारा शिक्षक ऐसी पाठ्य-सामग्रियों का निर्माण कर सकता है जहाँ बच्चे बिना किसी कड़े शिक्षक के दबाव के, अपनी गति से सीखते हुए प्रत्येक पद पर तत्काल प्रतिपुष्टि प्राप्त करते हैं। वर्तमान समय में कंप्यूटर-आधारित अधिगम (CAL) और ई-लर्निंग इसी सिद्धांत की देन हैं।
निष्कर्ष (Conclusion):
अनुक्रिया अनुबंधन (पॉवलॉव) और सक्रिय अनुबंधन (स्किनर) का यह गहन तुलनात्मक अध्ययन हमें यह स्पष्ट चेतना देता है कि बच्चों का सीखना कोई एकतरफा या सरल रेखा नहीं है। पॉवलॉव जहाँ हमें वातावरण के उद्दीपनों के साथ सही साहचर्य स्थापित करके अच्छी आदतें गढ़ना और संवेगात्मक संतुलन बनाना सिखाते हैं, वहीं स्किनर हमें यह मार्ग दिखाते हैं कि बच्चों की स्वतंत्र सक्रियता को दण्ड से कुचलने के बजाय, धनात्मक पुनर्बलन के माध्यम से एक सही और वैज्ञानिक दिशा कैसे प्रदान की जाए।
एक भावी डी.एल.एड./बी.एड. प्रगतिशील शिक्षक के रूप में, आपका यह नैतिक और व्यावसायिक उत्तरदायित्व है कि आप व्यवहारवाद की यांत्रिक कठोरता को छोड़कर उसके केवल मानवीय और सुधारात्मक तत्वों को अपनी समावेशी कक्षा में ईमानदारी से लागू करें। जब आप अपनी शिक्षण प्रविधियों में इन दोनों सिद्धांतों के व्यावहारिक नियमों, शेपिंग की तकनीकों और भयमुक्ति के रचनात्मक प्रतिमानों का संतुलन प्रयुक्त करेंगे, तभी प्रत्येक शिक्षार्थी को अपनी अनूठी क्षमता के साथ फलने-फूलने का एक समतामूलक, न्यायपूर्ण और गरिमापूर्ण अवसर प्राप्त हो सकेगा।
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