बिहार डी.एल.एड. (D.El.Ed) और बी.एड. (B.Ed) के प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम में पत्र S2 (संज्ञान, सीखना और बाल विकास) का बहुत ही केंद्रीय स्थान है। इस पत्र की द्वितीय इकाई "बाल विकास एवं सीखना" के अंतर्गत पहला अध्याय "बाल विकास और सीखने में अंतर्संबंध: परिचयात्मक समझ, परिपक्वता (Maturity) और सीखना" है। एक शिक्षक के लिए यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि बच्चे के बढ़ने की प्रक्रिया (विकास) और उसके द्वारा नए अनुभवों को ग्रहण करने की क्षमता (सीखना) एक-दूसरे से कैसे जुड़े हैं।
1. बाल-विकास की अवधारणा: परिचयात्मक समझ (Concept of Child Development)
हम अपने आस-पास के वातावरण में बच्चों को छोटे स्वरूप से बड़े होते हुए निरंतर देखते रहते हैं। विकास के इस कालक्रम को देखने पर हमारे जेहन में कई स्वाभाविक सवाल उठते हैं—जैसे जन्म से पूर्व एवं जन्म के बाद से परिपक्व होने तक बच्चों में किस-किस प्रकार के परिवर्तन होते हैं? बच्चों में होने वाले परिवर्तनों का विशेष आयु के साथ क्या संबंध होता है? क्या सभी बच्चों में वृद्धि एवं विकास संबंधी परिवर्तनों का क्रम एक जैसा है या उनमें वैयक्तिक भिन्नता पाई जाती है? इन सभी प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने के लिए हमें बाल-विकास की अवधारणा पर स्पष्ट समझ विकसित करने की आवश्यकता होती है।
बाल-विकास का वास्तविक तात्पर्य बच्चों के विकास की उस संपूर्ण प्रक्रिया से है, जो जन्म से पूर्व ही माँ के गर्भ में प्रारंभ हो जाती है। विकास की इस क्रमिक यात्रा में बच्चा गर्भावस्था, शैशवावस्था, बाल्यावस्था, और किशोरावस्था जैसी विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हुए परिपक्वता (Maturity) की स्थिति को प्राप्त करता है। विकास की प्रक्रिया अविरल चलने वाली, क्रमिक तथा सतत गतिशील रहने वाली प्रक्रिया है। इसके अंतर्गत बच्चे का शारीरिक, मानसिक, संज्ञानात्मक, भाषागत, संवेगात्मक एवं सामाजिक विकास समानांतर रूप से होता है।
बच्चों में होने वाले ये विकासात्मक परिवर्तन प्रायः व्यवस्थित, प्रगत्यात्मक और नियमित होते हैं। ये परिवर्तन हमेशा सामान्य से विशिष्ट की ओर और सरल से जटिल की ओर अग्रसर होने के दौरान एक निश्चित पैटर्न का अनुसरण करते हैं। विकास बहु-आयामी (Multi-dimensional) होता है, यानी जीवन की किसी अवधि में कुछ क्षेत्रों में बहुत तीव्र वृद्धि दिखती है, तो किसी अन्य क्षेत्र में गति मन्द हो सकती है। यहाँ यह ध्यान देना आवश्यक है कि मौसम, बीमारी, थकान या किसी अन्य आकस्मिक कारणों से होने वाले अस्थायी व्यवहार परिवर्तनों को हम कभी भी विकास की श्रेणी में नहीं रख सकते हैं।
2. सीखने (Learning) की अवधारणा एवं प्रकृति
'सीखना' सामान्य बोलचाल की भाषा में प्रयुक्त होने वाला एक अत्यंत व्यापक शब्द है, जिसका संबंध सीखे गए ज्ञान, अनुभव व अभ्यास के माध्यम से व्यवहार में होने वाले प्रगतिशील परिवर्तनों से है। मनोविज्ञान के अंतर्गत सीखने शब्द का प्रयोग दो रूपों में होता है—एक प्रक्रिया (Process) के रूप में और दूसरा परिणाम (Product) के रूप में। प्रक्रिया के रूप में सीखने का अर्थ उस मानसिक यात्रा से है जिसके द्वारा बच्चा नए-नए तथ्यों को स्वीकार कर नई क्रियाएँ करना चाहता है। परिणाम के रूप में सीखने का अर्थ मनुष्य के व्यवहार में आने वाले स्थायी रूपांतरण से है, क्योंकि मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि में सीखने का तब तक कोई औचित्य नहीं होता, जब तक उससे बच्चे के व्यवहार में कोई स्पष्ट बदलाव न दिखे।
एन.सी.एफ. 2005 और आधुनिक शिक्षाशास्त्र के अनुसार, सीखना ज्ञान के निर्माण की एक सक्रिय प्रक्रिया है। स्कूल के भीतर और बाहर दोनों ही जगहों पर सीखने की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। यदि इन दोनों जगहों के अनुभवों में परस्पर मजबूत संबंध स्थापित हो जाए, तो बच्चों के सीखने की प्रक्रिया बेहद पुष्ट हो जाती है। सीखने की उचित गति भी सुनिश्चित होनी चाहिए ताकि बच्चा केवल परीक्षा पास करने के लिए यांत्रिक रूप से तथ्यों को न रटे, बल्कि उन अवधारणाओं को समझकर अपने भीतर पूरी तरह आत्मसात कर सके।
3. बाल-विकास और सीखने में अंतर्संबंध (Interrelationship between Development and Learning)
बाल-विकास और सीखने की प्रक्रियाएं एक-दूसरे से पूरी तरह अन्योन्याश्रित (Interdependent) हैं। बच्चे का विकास सीखने को प्रभावित करता है और बच्चे द्वारा सीखी गई चीजें उसके विकास के क्षितिज को विस्तृत करती हैं। इनके अंतर्संबंधों को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से गहराई से समझा जा सकता है:
- शारीरिक विकास और सीखना: स्वस्थ शारीरिक विकास सभी प्रकार के विकास और सीखने की पहली और अनिवार्य शर्त है। बच्चे के शरीर के बाह्य एवं आंतरिक अवयवों का विकास व्यक्तित्व के उचित समायोजन में मदद करता है। यदि कोई बच्चा कुपोषण या शारीरिक बीमारी से ग्रसित है, तो उसकी सीखने की क्षमता और गति स्वतः ही मंद हो जाएगी।
- मानसिक व संज्ञानात्मक विकास का संबंध: कल्पना करना, स्मरण करना, विचार करना, निरीक्षण करना, समस्या समाधान करना और तार्किक निर्णय लेना—ये सभी मानसिक योग्यताएं मानसिक विकास के फलस्वरूप ही विकसित होती हैं। ये योग्यताएं सीधे तौर पर बच्चे के सीखने को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित और नियंत्रित करती हैं। यदि बच्चा मानसिक रूप से परिपक्व है, तो वह कठिन से कठिन संप्रत्ययों को भी आसानी से सीख लेता है।
- सामाजिक-सांस्कृतिक अनुभव और सीखना: कोई बच्चा अपने सहपाठियों के साथ मिलकर कितनी अंतःक्रिया करता है, समाज में कैसे संवाद स्थापित करता है, यह उसकी भाषा और सोचने की क्षमता पर निर्भर करता है। जैसे-जैसे बच्चे की संज्ञानात्मक और सामाजिक क्षमताएं विकसित होती हैं, वे अपने सीखने को स्वयं नियंत्रित (Self-regulated) और नियमित करने में पूरी तरह सक्षम हो जाते हैं।
इस अंतर्संबंध को देखते हुए ही आधुनिक शिक्षाशास्त्र 'बाल-केंद्रित पाठ्यचर्या' (Child-centered Curriculum) के निर्माण पर बल देता है, जिसका निर्माण बच्चों की विभिन्न अवस्थाओं की रुचियों, क्षमताओं तथा विकासात्मक योग्यताओं के अनुसार किया जाता है।
4. परिपक्वता (Maturity) का अर्थ एवं संकल्पना
बाल-मनोविज्ञान में 'परिपक्वता' (Maturity) का एक अत्यंत विशिष्ट और विधिक अर्थ है। परिपक्वता एक ऐसी जैविक और स्वाभाविक प्रक्रिया है, जो व्यक्ति के भीतर वंशानुक्रमणीय (Genetic) गुणों के कारण समय के साथ अपने आप प्रकट होती है। यह एक अबाध रूप से स्वतः चलने वाली आंतरिक प्रक्रिया है, जिसके लिए किसी भी प्रकार के विशेष प्रशिक्षण, अभ्यास या सचेत प्रयास की आवश्यकता नहीं होती है।
उदाहरण के लिए, एक निश्चित समयांतराल या आयु पर पहुँचने पर बच्चे के पैरों की मांसपेशियां इतनी मजबूत हो जाती हैं कि वह खड़ा होना और चलना सीख जाता है। इसी प्रकार, एक निश्चित उम्र में बच्चे के मुँह से 'माँ-पापा' जैसे शब्दों का स्वाभाविक उच्चारण होने लगता है। यह जैविक वृद्धि और संरचनात्मक सुदृढ़ता ही परिपक्वता कहलाती है। परिपक्वता मुख्य रूप से आनुवंशिकता पर आधारित होती है और इसकी एक स्वचालित समय-सीमा निर्धारित होती है।
5. परिपक्वता और सीखने में अंतर और अंतर्संबंध (Maturity vs. Learning)
यद्यपि परिपक्वता और सीखना दोनों ही विकास के मार्ग में परस्पर सम्बद्ध तत्व हैं और दोनों के परिणामस्वरूप बालक के व्यवहार में परिवर्तन आते हैं, परंतु इन दोनों के स्वरूप में गहरा अंतर पाया जाता है। बिना परिपक्वता के सीखना असंभव है और बिना सीखने के परिपक्वता अधूरी है।
इन दोनों के सैद्धांतिक और व्यावहारिक अंतर को समझने के लिए नीचे दी गई रॉ तालिका (बिना किसी सीएसएस के) के माध्यम से इनका स्पष्ट विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:
| परिपक्वता (MATURITY) | सीखना (LEARNING) |
|---|---|
|
• स्वाभाविक एवं स्वचालित प्रक्रिया: यह एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है जो बिना किसी विशिष्ट परिस्थिति के अपने-आप अनवरत चलती रहती है। • आनुवंशिकता पर आधारित: परिपक्वता मुख्य रूप से व्यक्ति के वंशानुक्रम और आंतरिक जैविक संरचनाओं पर आधारित होती है। • निश्चित आयु सीमा: इस स्वचालित प्रक्रिया के लिए प्रकृति द्वारा एक निर्धारित आयु सीमा और पैटर्न तय होता है। • अभ्यास की आवश्यकता नहीं: परिपक्वता के कारण होने वाले परिवर्तनों के लिए व्यवहार में अभ्यास की आवश्यकता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। |
• नियोजित एवं पर्यावरणीय प्रक्रिया: सीखना एक नियोजित क्रिया है, जिसमें बच्चा वातावरण की उत्तेजना और अभ्यास की सहायता से नवीन व्यवहार को अपनाता है। • पर्यावरण पर आधारित: सीखना मुख्य रूप से पर्यावरण, शिक्षण, प्रशिक्षण और बाह्य अनुभवों की समृद्धि पर आधारित होता है। • जीवन पर्यंत चलने वाली: सीखने की कोई निर्धारित आयु-सीमा नहीं होती, यह गतिविधियों और अनुभवों से संबंधित है। • अभ्यास और अनुभव अनिवार्य: सीखने के अंतर्गत व्यवहार में संशोधन और स्थायी परिवर्तन के लिए निरंतर अभ्यास अनिवार्य है। |
परिपक्वता और सीखने का गहरा अंतर्संबंध:
मैकग्रो एवं स्ट्रेयर जैसे मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, परिपक्वता सीखने की गति को सीधे प्रभावित करती है। परिपक्वता के अभाव में किसी भी प्रकार के सीखने की सफलता हमेशा संदिग्ध होती है। विभिन्न क्रियाओं को सीखने के लिए निश्चित परिपक्वता के स्तर की प्राप्ति होना आवश्यक है।
व्यावहारिक उदाहरण: आप ६ महीने के एक छोटे शिशु को कितना भी बेहतरीन प्रशिक्षण दे दें, कितना भी अभ्यास करवा लें, आप उसे पैरों पर चलना या दौड़ना नहीं सिखा सकते। इसका कारण यह है कि अभी उसकी पैरों की हड्डियां और मांसपेशियां शारीरिक रूप से परिपक्व नहीं हुई हैं। यदि इस अवस्था से पूर्व उस पर दबाव डाला जाए, तो इसके परिणाम विपरीत हो सकते हैं। इसी प्रकार, यदि कोई बच्चा मानसिक रूप से अमूर्त चिंतन के लिए परिपक्व नहीं हुआ है, तो आप उसे जबरन जटिल गणितीय संप्रत्यय नहीं सिखा सकते। अतः परिपक्वता सीखने के लिए एक बुनियादी आधार प्रदान करती है।
6. वैयक्तिक विभिन्नता (Individual Differences) और सीखने की प्रक्रिया
जब दो बच्चे विभिन्न समानताएँ रखते हुए भी अपने-आप में भिन्न व्यवहार करते हैं, सोचने का अलग तरीका रखते हैं या उनके सीखने की गति अलग होती है, तो उसे वैयक्तिक विभिन्नता (Individual Differences) कहते हैं। प्रत्येक बच्चे में जैविक, मानसिक, सांस्कृतिक, संवेगात्मक अंतर के कारण एक बच्चे को दूसरे बच्चे से भिन्न माना जाता है; यहाँ तक कि जुड़वाँ बच्चों में भी असमानताएं पाई जाती हैं। इस दृष्टि से वैयक्तिक विभिन्नता प्रकृति द्वारा प्रदत्त स्वाभाविक गुण है।
वैयक्तिक भिन्नता का प्रभाव सीखने की प्रक्रिया व इसकी उपलब्धि पर पड़ता है। बुद्धि तथा व्यक्तित्व इसके मुख्य आधार माने जाते हैं। आधुनिक मनोवैज्ञानिक वैयक्तिक भिन्नता को अत्यधिक महत्व देते हैं, जिसके ज्ञान के माध्यम से एक शिक्षक निम्नलिखित रणनीतियाँ अपना सकता है:
- शिक्षक शिक्षार्थी की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुकूल शिक्षा प्रदान कर सकते हैं।
- कक्षा कक्ष में गृहकार्य देते समय या गतिविधियों का निर्माण करते समय बच्चों की क्षमताओं व योग्यताओं का पूरा ध्यान रखा जा सकता है।
- एक ही कक्षा के बच्चों की रुचियों, अभिवृत्तियों एवं मानसिक योग्यताओं में अंतर होने के कारण पाठ्यक्रम का विभिन्नीकरण आवश्यक है। बच्चे को अपनी रुचि, योग्यता और इच्छा के अनुसार विषय चयन की छूट होनी चाहिए।
निष्कर्ष एवं शिक्षकों के लिए शैक्षणिक निहितार्थ:
बाल विकास और सीखने के अंतर्संबंधों का यह पूरा अध्याय शिक्षकों को यह व्यावहारिक समझ देता है कि शिक्षा को कभी भी बच्चों पर जबरन थोपा नहीं जा सकता। एक सफल और संवेदनशील शिक्षक वही है जो यह भली-भाँति जानता हो कि किस आयु-विशेष या विकासात्मक अवस्था में बच्चों में किस प्रकार के कौशलों को अर्जित करने की योग्यता होती है।
शिक्षकों को चाहिए कि वे कक्षा कक्ष के भीतर बच्चों के स्वाभिमान को बिना ठेस पहुँचाए एक ऐसा भयमुक्त, रुचिकर और आनंदमयी वातावरण तैयार करें जहाँ बच्चों के शारीरिक, संवेगात्मक और मानसिक विकास को समान अवसर मिले। जब हम बच्चों की वैयक्तिक विभिन्नताओं का सम्मान करते हुए, उनकी परिपक्वता के स्तर के अनुकूल सक्रिय और व्यावहारिक अनुभवों के अवसर प्रदान करते हैं, तभी वास्तविक अर्थों में बच्चों का संतुलित और सर्वांगीण व्यक्तित्व निर्धारण सुनिश्चित हो पाता है।
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