बिहार डी.एल.एड. (D.El.Ed) और बी.एड. (B.Ed) के प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम में पत्र S2 (संज्ञान, सीखना और बाल विकास) के अंतर्गत बच्चों में तार्किक और वैज्ञानिक सोच के उद्भव को समझना एक मुख्य उद्देश्य है इस पत्र की प्रथम इकाई के अंतर्गत अध्याय 7: "बच्चों में कार्य-कारण (Cause and Effect) की समझ का विकास और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का उम्र से संबंध" बाल-मनोविज्ञान का एक अत्यंत व्यावहारिक, प्रयोगात्मक और वैचारिक अध्याय है यह अध्याय हमें यह समझने की दृष्टि प्रदान करता है कि बच्चे अपने आस-पास घटने वाली घटनाओं के पीछे छिपे कारणों को किस प्रकार ढूँढ़ते हैं और उम्र के साथ उनका नजरिया कैसे अंधविश्वास या अतार्किकता से हटकर वैज्ञानिक बनता जाता है आपकी वेबसाइट के पाठकों और प्रशिक्षुओं के लिए परीक्षा के दृष्टिकोण से तैयार किया गया कम से कम 1500 शब्दों का अत्यंत विस्तृत और प्रामाणिक नोट्स नीचे दिया गया है:

1. कार्य-कारण की समझ क्या है? (Concept of Cause and Effect)

मानव मस्तिष्क की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वह अपने आस-पास होने वाले किसी भी बदलाव या घटना के पीछे का कारण खोजना चाहता है जब हम कहते हैं कि "रात के बाद सुबह होती है" या "बादल छाने पर बारिश होती है", तो यहाँ एक घटना 'कारण' (Cause) है और दूसरी घटना उसका 'परिणाम' या 'प्रभाव' (Effect) है बच्चों में संप्रत्यय निर्माण (Concept Formation) के साथ ही वैज्ञानिक चेतना को बढ़ाने में इस कार्य-कारण की समझ का होना अत्यंत आवश्यक है

पियाजे के अनुसार, "प्रत्येक बच्चा एक नन्हा वैज्ञानिक होता है" वह अपने भौतिक वातावरण की वस्तुओं और घटनाओं पर तरह-तरह की क्रियाएं करके अपनी अवधारणाओं का निर्माण करता रहता है और इसी से वह अपने आस-पास की दुनिया की समझ बनाता है बस बुनियादी फर्क इतना होता है कि एक छोटा बच्चा वयस्कों से अलग तरीके से सोचता है, अलग ढंग से तर्क लगाता है और अपने स्तर पर एक विशिष्ट निष्कर्ष पर पहुँचता है

शिक्षकों के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि वे अपने शिक्षण में किसी भी शैक्षणिक अवधारणा को सीधे रटवाने के बजाय 'कार्य-कारण संबंधों' के माध्यम से ही समझने-समझाने का भरसक प्रयास करें, क्योंकि यही वास्तविक संज्ञान की बुनियाद है

2. वैज्ञानिक दृष्टिकोण का उम्र से संबंध (Scientific Attitude and Age)

बाल-मनोविज्ञान यह स्पष्ट करता है कि गणितीय, तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास बच्चे की उम्र और संज्ञानात्मक परिपक्वता के साथ सीधा संबंध रखता है जैसे-जैसे बच्चे की जैविक आयु और परिवेशीय अनुभव बढ़ते हैं, उसके कार्य-कारण को समझने का तरीका भी बदलता जाता है इस विकास यात्रा को हम पियाजे के अवस्था सिद्धांत के निम्नलिखित चरणों के माध्यम से गहराई से समझ सकते हैं[cite: 1]:

(क) पूर्व संक्रियात्मक अवस्था में कार्य-कारण (2 से 7 वर्ष की आयु):

इस उम्र के छोटे बच्चे घटनाओं के पीछे के वास्तविक वैज्ञानिक कारणों को समझने में चूक करते हैं उनके चिंतन में कुछ विशिष्ट अतार्किक लक्षण पाए जाते हैं:

  • जीववाद (Animism): इस उम्र के बच्चे निर्जीव वस्तुओं को भी सजीव समझने लगते हैं यदि वे दौड़ते समय किसी पत्थर से टकराकर गिर जाते हैं, तो वे समझते हैं कि पत्थर ने उन्हें जानबूझकर मारा है यदि हवा से पत्तियाँ हिल रही हैं, तो वे सोचते हैं कि पेड़ अपनी मर्जी से नाच रहा है यहाँ उनका कार्य-कारण का तर्क पूरी तरह अभौतिक होता है
  • कृत्रिमतावाद (Artificialism): बच्चे समझते हैं कि सूर्य, चंद्रमा, तारे, बारिश और पहाड़ जैसी प्राकृतिक चीजें भी इंसानों द्वारा या इंसानों के लिए ही बनाई गई हैं जैसे—"बारिश इसलिए हो रही है क्योंकि ऊपर कोई पानी डाल रहा है"
  • मात्रा के संरक्षण को समझने में चूक: बच्चे प्रत्यक्ष दिखने वाले बाह्य स्वरूप से इतने प्रभावित होते हैं कि वे आंतरिक कारणों को नहीं देख पाते वे मात्रा और मूल्य के संरक्षण (Conservation) को समझने में पूरी तरह अक्षम होते हैं

(ख) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था में कार्य-कारण (7 से 11 वर्ष की आयु):

जब बच्चा सात वर्ष की आयु को पार करता है, तो उसके भीतर तार्किक और प्रतिवर्ती चिंतन (Reversibility) की शुरुआत होती है अब वह बाहरी रूप बदलने पर भी वस्तुओं के आंतरिक गुणों को पहचानने लगता है

  • अब बच्चे समझ जाते हैं कि यदि हम वस्तुओं की दी गई मात्रा में समान मात्रा जोड़ें या घटाएं, तो मूल मात्रा में कोई परिवर्तन नहीं होता है
  • वे केवल प्रत्यक्ष दिखने वाले छलावे में नहीं आते, बल्कि घटनाओं के पीछे छिपे वास्तविक भौतिक कारणों (जैसे उँचाई और चौड़ाई का संतुलन) को समझने लगते हैं इस अवस्था में उनमें कार्य-कारण की समझ का वास्तविक और वैज्ञानिक विकास तीव्र गति से होने लगता है

(ग) औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था में कार्य-कारण (11 वर्ष से ऊपर):

किशोरावस्था में प्रवेश करते ही बच्चे अमूर्त और परिकल्पनात्मक ढंग से सोचने लगते हैं अब उनके सामने यदि कोई समस्या रखी जाए, तो वे केवल मूर्त वस्तुओं पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि उसके पीछे छिपे अदृश्य वैज्ञानिक नियमों (जैसे गुरुत्वाकर्षण, वाष्पीकरण, वायुदाब) के आधार पर कार्य-कारण संबंध स्थापित करने में पूरी तरह निपुण हो जाते हैं

3. पियाजे का प्रसिद्ध 'संरक्षण प्रयोग' और कार्य-कारण (The Conservation Experiment)

संज्ञानात्मक विकास और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आपसी संबंध को समझने के लिए पाठ्य-पुस्तक में दिया गया 'मात्रा के संरक्षण का प्रयोग' सबसे सटीक और प्रामाणिक माध्यम है इस प्रयोग के चरणों और उम्र के साथ बच्चों के बदलते निष्कर्षों का विवरण निम्नलिखित है[cite: 1]:

प्रयोग की विधि और प्रक्रिया:

चरण १: एक शिक्षक ४ से ६ वर्ष के छोटे बच्चे के सामने मेज पर एक समान आकार और लंबाई के दो काँच के बर्तन (गिलास A और गिलास B) रखता है शिक्षक दोनों बर्तनों में एक बराबर स्तर तक पानी डालता है और बच्चे से पूछता है—"क्या दोनों बर्तनों में पानी की मात्रा बराबर है?"[cite: 1] बच्चा दोनों को ध्यान से देखता है और पूरी सहमति के साथ कहता है—"हाँ, दोनों में पानी बराबर है"

चरण २: अब शिक्षक उसी बच्चे के सामने सब कुछ प्रत्यक्ष रूप से घटाते हुए, गिलास B के पूरे पानी को एक अन्य तीसरे चौड़े और चपटे आकार के बर्तन (बर्तन C) में उलट देता है इस चौड़े आकार के कारण बर्तन C में पानी का स्तर (उँचाई) गिलास A की तुलना में काफी नीचे नजर आता है

चरण ३: अब शिक्षक दोबारा बच्चे से पूछता है—"क्या अब भी दोनों बर्तनों (गिलास A और बर्तन C) में पानी की मात्रा बराबर है या किसी में कम-ज्यादा है?"[cite: 1]

उम्र के अनुसार बच्चों के निष्कर्षों में भिन्नता:

  • ४ से ६ वर्ष के बच्चे का अ-वैज्ञानिक निष्कर्ष: इस उम्र का बच्चा सब कुछ अपनी आँखों के सामने होते देखकर भी यह उत्तर देता है कि "अब दोनों में पानी बराबर नहीं है; गिलास A में पानी ज़्यादा है और चौड़े बर्तन C में पानी कम है क्योंकि वह इतना नीचे चला गया है" पियाजे और इनहेल्डर के अनुसार, बच्चा संज्ञानात्मक रूप से अभी इस कार्य-कारण संबंध को समझने के लिए परिपक्व नहीं हुआ है वह केवल एक समय में वस्तु की एक ही विशेषता (उँचाई) पर ध्यान केंद्रित कर पा रहा है इस चरण में यदि शिक्षक बच्चे को कितना भी समझाए कि पानी वही है, तो भी बच्चा आश्वस्त नहीं होता और अपने अ-वैज्ञानिक निष्कर्ष पर अड़ा रहता है
  • ७ वर्ष से ऊपर के बच्चे का वैज्ञानिक निष्कर्ष: अब यदि आप यही समान प्रयोग ७ वर्ष से ऊपर के मूर्त संक्रियात्मक अवस्था के बच्चे के साथ दोहराएंगे, तो परिणाम बिल्कुल बदल जाएगा बच्चा तुरंत मुस्कुराकर कहेगा—"दोनों बर्तनों में पानी की मात्रा बिल्कुल बराबर है" केवल निष्कर्ष ही नहीं, वह बच्चा आपको इसका तार्किक कारण भी समझाएगा कि "चूंकि बर्तन C चौड़ा है, इसलिए पानी का स्तर नीचे दिख रहा है, लेकिन पानी में कुछ भी जोड़ा या घटाया नहीं गया है; यदि इस पानी को वापस गिलास में डालेंगे तो वह फिर से उतना ही हो जाएगा" अब बच्चे में विकेंद्रीकरण और प्रतिवर्तीयता के गुण आ चुके हैं, जिससे उसकी तार्किक क्षमता बेहतर हो गई है और उसमें कार्य-कारण की वैज्ञानिक समझ का विकास हो चुका है

4. संज्ञान और कार्य-कारण के व्यावहारिक उदाहरण (Rain and Round Earth)

बच्चों के संज्ञानात्मक विकास में जटिल वैश्विक या भौगोलिक अवधारणाओं को समझने में कार्य-कारण की समझ कैसे काम करती है, इसके दो मुख्य व्यावहारिक उदाहरण निम्नलिखित हैं[cite: 1]:

उदाहरण क: क्या दुनिया गोल है?
यह समझना बहुत सारे प्राथमिक विद्यालय के बच्चों के लिए शुरुआत में मानसिक रूप से अत्यंत मुश्किल होता है चूंकि वे जहाँ भी खड़े होते हैं, उन्हें पृथ्वी पूरी तरह समतल दिखाई देती है, इसलिए वे अपनी 'संवेदना' और प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर पृथ्वी को चपटा मानते हैं पृथ्वी गोल है, इस वैज्ञानिक तर्क को आत्मसात करने के लिए उनके मस्तिष्क में इससे संबंधित उपयुक्त 'स्कीमा' का विकसित होना अनिवार्य है जब तक उनका संज्ञान परिपक्व नहीं होता, वे अंतरिक्ष, गुरुत्वाकर्षण और गोल पृथ्वी के कार्य-कारण संबंधों को स्वीकार नहीं कर पाते

उदाहरण ख: बारिश क्यों और कैसे होती है?
एक छोटा बच्चा सोचता है कि जब भगवान रोते हैं या ऊपर कोई पानी से खेलता है, तो बारिश होती है (कृत्रिमतावाद) परंतु जैसे-जैसे उसका संज्ञानात्मक विकास आगे बढ़ता है, वह वाष्पीकरण, बादलों का बनना, संघनन और तापमान के गिरने जैसे कड़ियों के अंतर्संबंधों को समझने लगता है यह समझ पूरी तरह से उसके संज्ञान और कार्य-कारण की परिपक्वता पर निर्भर करती है

5. संप्रत्यय विकास और कार्य-कारण की समझ को प्रभावित करने वाले कारक

बच्चों में कार्य-कारण की तार्किक समझ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास की गति निम्नलिखित कारकों द्वारा गहराई से प्रभावित और परिमार्जित होती है[cite: 1]:

  • बौद्धिक परिपक्वता (Mental Maturity): मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र का जैविक विकास जैसे-जैसे होता है, बच्चा जटिल अमूर्त संबंधों को समझने योग्य बनता है
  • ज्ञानेंद्रियों की अवस्था (State of Sense Organs): स्वस्थ ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से प्राप्त होने वाली संवेदना और प्रत्यक्षीकरण जितना सटीक होगा, बच्चा घटनाओं का उतना ही शुद्ध प्रेक्षण कर सकेगा
  • परिवेशीय अनुभव और क्रियाएं (Richness of Experience): जो बच्चे अपने पर्यावरण में वस्तुओं के साथ जितनी अधिक स्वतंत्र क्रियाएं करते हैं, प्रयोग करते हैं और त्रुटियाँ करते हैं, उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण उतनी ही तेजी से विकसित होता है
  • सामाजिक-आर्थिक स्तर और सांस्कृतिक तत्व: बच्चे के आस-पास का समाज और परिवार अंधविश्वासों को बढ़ावा देता है या तार्किक प्रश्नों को? माता-पिता बच्चों के "क्यों और कैसे" वाले प्रश्नों का क्या उत्तर देते हैं? यह वातावरण बच्चों के कार्य-कारण की चेतना को आकार देता है

6. शिक्षकों के लिए इस अध्याय का शैक्षणिक महत्व (Educational Implications)

पियाजे का यह पूरा विमर्श प्राथमिक और मध्य विद्यालय के शिक्षकों के लिए शिक्षण विधियों को सुधारने हेतु निम्नलिखित अमूल्य सुझाव और निर्देश प्रदान करता है[cite: 1]:

  1. रटने की प्रवृत्ति का निषेध: शिक्षकों को विज्ञान या सामाजिक विज्ञान की अवधारणाओं की परिभाषाएं कॉपियों में सीधे रटवानी नहीं चाहिए। पाठ्यचर्या का विकास इस तरह किया जाना चाहिए जो बच्चे के मानसिक विकास के अंतर्संबंधों के अनुकूल हो
  2. कक्षा में प्रयोगों को प्राथमिकता: प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों के सामने प्रत्यक्ष रूप से छोटी-छोटी गतिविधियाँ (जैसे पौधों में पानी देना, धूप में कपड़े सुखाना, या पानी के बर्तनों का प्रयोग) करके दिखाना चाहिए जब बच्चे प्रत्यक्ष बदलाव देखते हैं, तो उनके मस्तिष्क की पुरानी स्कीमा में 'संज्ञानात्मक असंतुलन' होता है, जो उन्हें 'समायोजन' करके नए वैज्ञानिक नियमों को सीखने के लिए प्रेरित करता है
  3. प्रश्नों और शंकाओं को प्रोत्साहन: यदि बच्चा कक्षा में अतार्किक या अ-वैज्ञानिक प्रश्न भी पूछता है, तो उसका उपहास उड़ाने या उसे दंडित करने के बजाय शिक्षक को उसकी सोच की अवस्था को समझना चाहिए शिक्षक को उसे ऐसे नए अनुभव या काउंटर-प्रश्न देने चाहिए जिससे वह स्वयं अपने विरोधाभासों को समझकर सही कार्य-कारण संबंध तक पहुँच सके

निष्कर्ष:

बच्चों में कार्य-कारण की समझ का विकास कोई अचानक होने वाला चमत्कार नहीं है, बल्कि यह आयु, जैविक परिपक्वता और पर्यावरण के साथ की जाने वाली सक्रिय अंतःक्रियाओं का एक क्रमिक और सुंदर परिणाम है संवेदी अनुभवों से शुरू होकर, संरक्षण के प्रयोगों से गुजरते हुए, बच्चा धीरे-धीरे एक अंधविश्वासी सोच से मुक्त होकर एक तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण हासिल करता है एक संवेदनशील और प्रगतिशील शिक्षक के रूप में हमारा यह दायित्व है कि हम बच्चों को केवल 'तथ्य' याद करवाने वाले यांत्रिक कारखाने न बनें, बल्कि अपनी कक्षाओं को एक ऐसी जीवंत प्रयोगशाला बनाएं जहाँ प्रत्येक बच्चा अपनी खोजी प्रवृत्ति के साथ स्वतंत्र रूप से 'कार्य-कारण संबंधों' को खोज सके और स्वयं सच्चे ज्ञान का निर्माता बन सके