बिहार डी.एल.एड. (D.El.Ed) और बी.एड. (B.Ed) के प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम में पत्र S2 (संज्ञान, सीखना और बाल विकास) के अंतर्गत संज्ञानात्मक विकास को समझने के लिए जे.एस. ब्रुनर का सिद्धांत एक मील का पत्थर है। प्रथम इकाई के अंतर्गत अध्याय 4: "जे.एस. ब्रुनर का संप्रत्यय मॉडल (सक्रियता, दृश्य प्रतिमा और सांकेतिक विधि)" हमें यह समझने की नवीन दृष्टि प्रदान करता है कि बच्चे अपनी ज्ञानेंद्रियों और मानसिक संरचनाओं के माध्यम से बाहरी दुनिया के अनुभवों को किस प्रकार आत्मसात करते हैं और ज्ञान का निर्माण करते हैं। जेोम एस. ब्रुनर (J.S. Bruner) एक अमेरिकी मनोवैज्ञानिक थे, जिन्होंने जीन पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांतों को एक नया और व्यावहारिक आयाम दिया। आपकी वेबसाइट के पाठकों और प्रशिक्षुओं के लिए परीक्षा के दृष्टिकोण से तैयार किया गया कम से कम 1500 शब्दों का अत्यंत विस्तृत, गहन और प्रामाणिक नोट्स नीचे दिया गया है:
1. जे.एस. ब्रुनर का वैचारिक परिप्रेक्ष्य (Bruner's Cognitive Perspective)
जे.एस. ब्रुनर (1964, 1966) ने संज्ञानात्मक विकास और संप्रत्यय निर्माण की प्रक्रियाओं का बहुत गहन और सूक्ष्म अध्ययन किया. उनका मानना था कि मानव मस्तिष्क वातावरण में उपस्थित विभिन्न अनुभवों और अनुभूतियों की मदद से संप्रत्ययों (Concepts) का विकास करता है. पियाजे की भाँति ब्रुनर भी एक रचनावादी (Constructivist) विचारक थे, जो यह मानते थे कि बालक अपने ज्ञान का सृजन स्वयं अपनी क्रियाओं के माध्यम से करता है.
ब्रुनर ने मूलतः दो बुनियादी मनोवैज्ञानिक प्रश्नों के उत्तर ढूँढ़ने में अपनी गहरी रुचि दिखाई:
- पहला यह कि बच्चे किस ढंग से अपनी अनुभूतियों (Experiences) को मानसिक रूप से प्रदर्शित या निरूपित (Represent) करते हैं?
- दूसरा यह कि शैशवावस्था, बाल्यावस्था और विकास के विभिन्न चरणों में बच्चे का मानसिक चिंतन किस प्रकार आगे बढ़ता है?
इन दोनों प्रश्नों का उत्तर देने के लिए ब्रुनर ने स्पष्ट किया कि मानव शिशु या बच्चा अपनी अनुभूतियों को मानसिक रूप से तीन विशिष्ट तरीकों या मोड्स (Modes) द्वारा संसार के सामने अभिव्यक्त करता है.
2. ब्रुनर का संप्रत्यय मॉडल: मानसिक निरूपण की तीन विधियाँ (Three Modes of Representation)
ब्रुनर (1966) ने अपने प्रयोगात्मक अध्ययनों के आधार पर यह प्रतिपादित किया कि बच्चे में संप्रत्यय (Concept) का विकास एक निश्चित क्रम में होता है. उन्होंने मानसिक निरूपण की तीन महत्वपूर्ण विधियों की चर्चा की है:
- सक्रियता विधि या गत्यात्मक रूप (Enactive Mode)
- दृश्य प्रतिमा विधि या आइकॉनिक रूप (Iconic Mode)
- सांकेतिक विधि या प्रतीकात्मक रूप (Symbolic Mode)
आइए इन तीनों विधियों का दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक संदर्भ में विस्तृत विश्लेषण करें:
(क) सक्रियता विधि (Enactive Mode)
यह संज्ञानात्मक विकास और संप्रत्यय निर्माण की सबसे पहली और प्राथमिक विधि है. जन्म से लेकर करीब 18 महीनों (डेढ़ वर्ष) की आयु तक बच्चे के चिंतन में इसी सक्रियता विधि की प्रधानता होती है.
- अर्थ और स्वरूप: सक्रियता एक ऐसा तरीका है जिसमें बच्चे अपनी आंतरिक अनुभूतियों, इच्छाओं और विचारों को शब्दों या भाषा के बजाय केवल अपनी शारीरिक क्रियाओं (Actions) और गतियों द्वारा व्यक्त करते हैं. इस अवस्था में बच्चे का ज्ञान उसकी क्रियाओं के माध्यम से ही प्रकट होता है।
- व्याहारिक उदाहरण: पाठ्य-पुस्तक के अनुसार, जब एक छोटा शिशु अपनी दूध की बोतल को देखता है, तो वह सीधे 'दूध' शब्द नहीं बोल पाता. बोतल को देखते ही वह अपनी इच्छा की अभिव्यक्ति करने के लिए अपना मुँह चलाने लगता है, हाथ-पैर फेंकने लगता है और सक्रिय गतियाँ करने लगता है. यह व्यवहार सक्रियता विधि का सबसे सटीक उदाहरण है. इसी प्रकार, पैर से साइकिल के पैडल मारना, खिलौनों को पकड़ना, चूसना या किसी वस्तु को दूर धकेलना इसी विधि के अंतर्गत आता है।
(ख) दृश्य प्रतिमा विधि (Iconic Mode)
यह संप्रत्यय विकास की दूसरी सीढ़ी है, जिसकी प्रधानता सामान्यतः 1 वर्ष या 2 वर्ष की उम्र से लेकर लगभग 6 या 7 वर्ष तक देखी जाती है.
- अर्थ और स्वरूप: इस विधि में बच्चा अपने मन में बाह्य वस्तुओं की कुछ दृश्य प्रतिमाएँ (Visual Images) या मानसिक चित्र बनाकर अपनी अनुभूतियों को संचित और अभिव्यक्त करता है. अब बच्चा वस्तुओं को उनके वास्तविक भौतिक स्वरूप के बिना भी, उनकी मानसिक छवियों के आधार पर समझने और याद रखने में सक्षम हो जाता है।
- व्याहारिक उदाहरण: यदि बच्चे के सामने उसकी माँ या उसका पसंदीदा खिलौना मौजूद न भी हो, तो भी वह अपने मस्तिष्क में उनकी एक स्पष्ट दृश्य प्रतिमा (Image) बना लेता है. इस अवस्था में बच्चे रंगीन चित्रों, रेखाचित्रों और खिलौनों के मॉडलों को देखकर बहुत तेजी से संप्रत्यय ग्रहण करते हैं। यदि आप बच्चे को 'सेब' का संप्रत्यय सिखाना चाहते हैं, तो उसे सेब का रंगीन चित्र या मॉडल दिखाना इस अवस्था में सबसे अधिक प्रभावी होता है.
(ग) सांकेतिक विधि (Symbolic Mode)
यह संज्ञानात्मक निरूपण की तीसरी और सर्वोच्च अवस्था है, जिसकी शुरुआत करीब 7 वर्ष की आयु से होती है और यह आगे किशोरावस्था व प्रौढ़ावस्था तक मानसिक चिंतन का मुख्य आधार बनी रहती है.
- अर्थ और स्वरूप: इस विधि में बच्चा भाषा, अमूर्त संकेतों (Symbols), अंकों, शब्दों और गणितीय या वैज्ञानिक सूत्रों के द्वारा अपनी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति करने में पूरी तरह सक्षम हो जाता है. यहाँ बच्चा मूर्त वस्तुओं या उनके चित्रों पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि वह संकेतों के माध्यम से अमूर्त चिंतन (Abstract Thinking) करने लगता है.
- व्याहारिक उदाहरण: इस अवस्था में पहुँचने पर बच्चा 'सत्य', 'न्याय', 'ईमानदारी' या 'गणितीय समीकरणों' जैसे अमूर्त संप्रत्ययों को केवल भाषा और प्रतीकों के माध्यम से आसानी से समझ लेता है. उसे किसी अवधारणा को समझने के लिए बार-बार चित्र या वास्तविक वस्तु दिखाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। भाषा संबंधी योग्यता तथा संप्रेषणशीलता का विकास इस स्तर पर अपनी ऊँचाई को छूने लगता है.
3. ब्रुनर के संप्रत्यय प्राप्ति मॉडल की अनुदेशात्मक रणनीति (Concept Attainment Model)
ब्रुनर और उनके सहयोगियों के शोध पर आधारित 'संप्रत्यय प्राप्ति मॉडल' (Concept Attainment Model) एक अत्यंत शक्तिशाली अनुदेशात्मक रणनीति (Instructional Strategy) है. इस मॉडल का मुख्य उद्देश्य छात्रों में तार्किक चिंतन और वर्गीकरण के कौशलों का विकास करना है. इसके क्रियान्वयन के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं:
- पूर्व अनुभवों का प्रयोग: शिक्षक किसी भी नए संप्रत्यय की रचना करने के लिए सबसे पहले बच्चों के पूर्व अनुभवों और उनकी ज्ञानेन्द्रियों की अवस्था का सहारा लेता है.
- सकारात्मक और नकारात्मक उदाहरणों का प्रस्तुतीकरण: शिक्षक बच्चों के सामने कुछ विशिष्ट चित्र दिखाता है या शब्द प्रस्तुत करता है. इन उदाहरणों को दो श्रेणियों में बाँटा जाता है—एक श्रेणी 'हाँ' (जिसमें संप्रत्यय की विशेषताएँ मौजूद हैं) और दूसरी श्रेणी 'ना' (जिसमें संप्रत्यय की विशेषताएँ नहीं हैं).
- परिकल्पना का निर्माण और परीक्षण: बच्चे उन दोनों श्रेणियों के चित्रों या शब्दों में समानताओं और अंतरों को ढूँढ़ते हैं और अपने मस्तिष्क में एक परिकल्पना (Hypothesis) बनाते हैं. इसके बाद शिक्षक अन्य नए उदाहरण प्रस्तुत करके बच्चों की उस परिकल्पना का परीक्षण करता है और अंत में बच्चे संप्रत्यय की स्पष्ट परिभाषा का निर्माण करते हैं.
4. पियाजे और ब्रुनर के सिद्धांतों का तुलनात्मक विमर्श
ब्रुनर और जीन पियाजे के सिद्धांतों में कुछ मूलभूत समानताएँ होने के साथ-साथ कतिपय महत्वपूर्ण अंतर भी मौजूद हैं, जिन्हें समझना एक प्रशिक्षु शिक्षक के लिए आवश्यक है:
- समानताएँ: पियाजे की तरह ब्रुनर भी संज्ञानात्मक विकास को एक क्रमिक और विकासात्मक प्रक्रिया मानते हैं. दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि बच्चा ज्ञान का सक्रिय खोजी है और उम्र व बौद्धिक परिपक्वता के साथ चिंतन का स्वरूप बदलता है. दोनों के ही सिद्धांतों में मानसिक चित्रण, संकेत और प्रतिमा को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना गया है.
- भिन्नता (भाषा का महत्व): जहाँ जीन पियाजे की दृष्टि में भाषा बच्चे के संज्ञानात्मक विकास में कोई बहुत केंद्रीय भूमिका नहीं निभाती (वे विचारों को भाषा से पहले मानते हैं), वहीं ब्रुनर संज्ञानात्मक विकास में भाषा और सामाजिक सांस्कृतिक संकेतों को एक अत्यंत महत्वपूर्ण और शक्तिशाली उपकरण मानते हैं. ब्रुनर का मानना है कि भाषा के माध्यम से ही बच्चा अपनी दृश्य प्रतिमाओं को अमूर्त संकेतों (सांकेतिक विधि) में बदलने में सफल होता है.
- भिन्नता (अवस्थाओं का स्वरूप): पियाजे की अवस्थाएँ (Stages) बहुत कठोर हैं जिन्हें उम्र के बंधनों में बाँधा गया है, जबकि ब्रुनर की तीनों विधियाँ (Modes) अधिक लचीली हैं और वे एक-दूसरे के साथ अंतःक्रिया करती रहती हैं.
5. संप्रत्यय विकास को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक
ब्रुनर के मॉडल के आलोक में, बच्चों के भीतर किसी संप्रत्यय के सही और स्पष्ट विकास में निम्नलिखित कारक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं:
- बौद्धिक परिपक्वता (Mental Maturity): बच्चे की मानसिक आयु और उसकी तंत्रिका तंत्र की परिपक्वता संप्रत्यय की जटिलता को निर्धारित करती है.
- ज्ञानेन्द्रियों की अवस्था (State of Sense Organs): संवेदी इनपुट जितने स्पष्ट होंगे, बच्चे की सक्रियता और दृश्य प्रतिमाएँ उतनी ही शुद्ध बनेंगी.
- परिवेशीय अनुभव (Experiences): बच्चे को अपने पर्यावरण से जितनी अधिक विविध अनुभूतियाँ प्राप्त होंगी, उसका संप्रत्यय विकास उतना ही तीव्र और बहुआयामी होगा.
- सामाजिक-आर्थिक स्तर: बच्चे का पारिवारिक और सामाजिक वातावरण उसे मिलने वाले उद्दीपनों की गुणवत्ता को प्रभावित करता है, जिससे उसके संप्रत्ययों का क्षितिज विस्तृत होता है.
6. ब्रुनर के सिद्धांत के शैक्षिक निहितार्थ (Educational Implications)
एक शिक्षक के रूप में ब्रुनर का संप्रत्यय मॉडल हमारी दैनिक शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को सुगम और वैज्ञानिक बनाने के लिए निम्नलिखित व्यावहारिक निर्देश देता है:
- ठोस अनुभवों से शुरुआत (From Concrete to Abstract): प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों को कोई भी अमूर्त अवधारणा सिखाते समय सीधे परिभाषा नहीं रटवानी चाहिए। शिक्षक को सबसे पहले 'सक्रियता विधि' और 'दृश्य प्रतिमा विधि' का उपयोग करते हुए मूर्त वस्तुओं, खिलौनों (टॉय पैडागोजी) और चित्रों का प्रदर्शन करना चाहिए, उसके बाद ही सांकेतिक या भाषाई स्तर पर जाना चाहिए.
- सर्पिल पाठ्यचर्या (Spiral Curriculum): ब्रुनर ने सर्पिल पाठ्यचर्या का विचार दिया। उनका मानना था कि किसी भी विषय या संप्रत्यय को विकास की किसी भी अवस्था में बच्चों को सिखाया जा सकता है, बशर्ते उसे बच्चे के संज्ञानात्मक स्तर (सक्रियता, दृश्य प्रतिमा या सांकेतिक) के अनुरूप सरल और संरचित रूप में प्रस्तुत किया जाए। विषय-वस्तु को हर कक्षा में अधिक व्यापक और गहन रूप में दोहराया जाना चाहिए।
- खोजपूर्ण अधिगम (Discovery Learning): शिक्षकों को कक्षा में ज्ञान को सीधे परोसने के बजाय शिक्षार्थियों को एक खोजकर्ता की भूमिका में रखना चाहिए, जहाँ वे स्वयं उदाहरणों का वर्गीकरण करके, समानताएं और अंतर ढूंढकर नियमों का प्रतिपादन स्वयं कर सकें.
निष्कर्ष:
जे.एस. ब्रुनर का संप्रत्यय मॉडल हमें यह स्पष्ट समझ देता है कि बच्चों का मानसिक विकास संवेदी शारीरिक क्रियाओं (सक्रियता) से शुरू होकर, चित्रों की मानसिक छवियों (दृश्य प्रतिमा) से गुजरते हुए, भाषा और अमूर्त संकेतों (सांकेतिक विधि) की सर्वोच्च तार्किक परिपक्वता तक पहुँचता है. एक भावी शिक्षक के रूप में आपका यह प्राथमिक उत्तरदायित्व है कि आप अपनी कक्षा कक्ष की शिक्षण प्रविधियों को बच्चों की इन तीनों मानसिक अवस्थाओं के अनुकूल ढालें, ताकि रटंत विद्या का समूल नाश हो सके और प्रत्येक बच्चा वैज्ञानिक चेतना के साथ अपनी आसपास की दुनिया की वास्तविक समझ का निर्माण स्वयं कर सके.
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