बिहार डी.एल.एड. (D.El.Ed) और बी.एड. (B.Ed) के प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम में पत्र S2 (संज्ञान, सीखना और बाल विकास) के अंतर्गत व्यवहारवादी सिद्धांतों की समझ विकसित करना एक मुख्य प्रशासनिक और शैक्षणिक आवश्यकता है। इस पत्र की तृतीय इकाई "सीखने के व्यवहारवादी एवं सूचना प्रसंस्करण सिद्धांतों की समझ" के अंतर्गत अध्याय 2: "सीखने का व्यवहारवादी दृष्टिकोण (Behaviorist View) और इसकी आधारभूत मान्यताएँ" बाल-मनोविज्ञान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आधार स्तंभ है। एक भावी शिक्षक के लिए यह समझना अनिवार्य है कि व्यवहारवाद ने सीखने की प्रक्रिया को किस प्रकार एक वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ धरातल प्रदान किया।
---1. प्रस्तावना: व्यवहारवाद का ऐतिहासिक उदय (Historical Emergence of Behaviorism)
मनोविज्ञान के इतिहास पर दृष्टि डालने से यह स्पष्ट होता है कि यह विषय समय के साथ निरंतर परिमार्जित होता रहा है। प्रारंभ में मनोविज्ञान को 'आत्मा का विज्ञान' माना जाता था, फिर इसे 'मन का विज्ञान' कहा गया, और पुनः इसे 'चेतना का विज्ञान' के रूप में स्वीकार किया गया। परंतु चेतना, मन और आत्मा जैसी अवधारणाएं अत्यंत अमूर्त, आंतरिक और अदृश्य थीं, जिनका प्रयोगशाला में वैज्ञानिक मापन या निरीक्षण करना व्यावहारिक रूप से असंभव था।
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में, वर्ष 1913 में, अमेरिकी मनोवैज्ञानिक जॉन बी. वाटसन (J.B. Watson) ने तत्कालीन 'अंतर्दर्शन' (Introspection) और चेतनावाद के कड़े विरोध में एक नए दृष्टिकोण का प्रतिपादन किया, जिसे व्यवहारवाद (Behaviorism) कहा जाता है। वाटसन ने मनोविज्ञान को पूरी तरह से एक शुद्ध, वस्तुनिष्ठ और प्रयोगात्मक प्राकृतिक विज्ञान के रूप में स्थापित करने का श्रेय प्राप्त किया। व्यवहारवाद में चेतना को केवल एक अमूर्त कल्पना मात्र माना गया और उसके वैज्ञानिक अध्ययन का पूरी तरह से खंडन करते हुए केवल 'प्रकट व्यवहार' पर बल दिया गया।
वाटसन के अनुसार, मनोविज्ञान प्राकृतिक विज्ञान का वह क्षेत्र है, जो मानव के बाह्य व्यवहार (कथनी-करनी, अर्जित-अनार्जित क्रियाएं) को अपने अध्ययन का मुख्य विषय मानता है। समकालीन शिक्षा जगत में बच्चों के व्यवहार को नियंत्रित, व्यवस्थित और परिमार्जित करने में इस दृष्टिकोण ने एक युगांतकारी भूमिका निभाई हैं।
---2. सीखने का व्यवहारवादी दृष्टिकोण क्या है? (Understanding the Behaviorist View)
व्यवहारवादी दृष्टिकोण के अनुसार, सीखना (Learning) व्यक्ति के बाह्य व्यवहार में होने वाला अपेक्षाकृत स्थायी परिवर्तन है, जो अभ्यास, अनुभव और पर्यावरण के उद्दीपनों के कारण घटित होता है। व्यवहारवादी विचारकों का यह दृढ़ विश्वास है कि मनुष्य या पशु की आंतरिक मानसिक प्रक्रियाओं (जैसे—सोचना, इच्छाएं, संवेग) को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा जा सकता, इसलिए सीखने की व्याख्या केवल उन्हीं उद्दीपनों (Stimulus) और अनुक्रियाओं (Response) के आधार पर की जानी चाहिए जिन्हें प्रयोगशाला में देखा और मापा जा सकें।
इस दृष्टिकोण में सीखने की प्रक्रिया को एक यांत्रिक या भौतिक घटना माना जाता है। जब वातावरण से कोई विशिष्ट उद्दीपक (Stimulus) प्राणी के सामने उपस्थित होता है, तो वह उसके प्रति एक विशिष्ट अनुक्रिया (Response) या व्यवहार प्रदर्शित करता है। जब इन दोनों के बीच एक मजबूत साहचर्य (Association) या बंधन स्थापित हो जाता है, तो इसी प्रक्रिया को व्यवहारवाद के अंतर्गत 'सीखना' कहा जाता हैं।
पारंपरिक व्यवहारवाद बच्चों को एक सक्रिय खोजकर्ता नहीं मानता था, बल्कि वे बच्चे को एक 'खाली स्लेट' (Tabula Rasa) की तरह मानते थे, जिस पर बाह्य पर्यावरणीय ताकतों और उद्दीपनों द्वारा कुछ भी लिखा जा सकता है। इसी वैचारिक धरातल पर वाटसन ने अपना वह प्रसिद्ध और ऐतिहासिक कथन दिया था: "मुझे एक दर्जन स्वस्थ बच्चे दें, आप जैसा चाहें मैं उनको उस रूप (डॉक्टर, वकील, चोर या भिखारी) में बना दूँगा।"
---3. व्यवहारवाद की आधारभूत मान्यताएँ (Core Assumptions of Behaviorism)
व्यवहारवादी सीखना सिद्धांतों और दृष्टिकोण की पूरी इमारत कुछ बुनियादी और वैज्ञानिक मान्यताओं पर टिकी हुई है, जिनका सूक्ष्म विश्लेषण निम्नलिखित है:
- 1. बाह्य और प्रकट व्यवहार पर पूर्ण ध्यान (Focus on Observable Behavior): व्यवहारवाद की पहली और सर्वोपरि मान्यता यह है कि मनोविज्ञान का विषय-वस्तु केवल वही व्यवहार हो सकता है जो प्रत्यक्ष रूप से बाह्य जगत में दिखाई देता हो और जिसका वस्तुनिष्ठ वैज्ञानिक विधियों के माध्यम से मापन किया जा सके। यह आंतरिक मानसिक चेतना और मनोवाद का पूरी तरह विरोध करता है।
- 2. लघु प्रक्रिया तत्वों द्वारा व्यवहार का निर्माण (Reductionism): व्यवहारवाद यह मानता है कि मनुष्य का जटिल से जटिल व्यवहार भी वास्तव में छोटी-छोटी सरल प्रतिक्रियाओं, आदतों और लघु प्रक्रिया तत्वों के आपस में जुड़ने से निर्मित होता है। इन बुनियादी तत्वों का पता वैज्ञानिक विधियों से लगाया जा सकता है।
- 3. ग्रन्थियों और पेशीय गतियों की भूमिका (Physiological Basis): व्यवहारवाद की एक अन्य मान्यता है कि प्राणी की प्रत्येक व्यवहार रचना मूलतः उसके शरीर के भीतर मौजूद ग्रन्थियों के स्राव (Glandular Secretion) और पेशीय गतियों (Muscular Movements) के भौतिक अंतर्संबंधों द्वारा ही संचालित होती है।
- 4. उद्दीपन की तीव्रता और अनुक्रिया का संबंध (Stimulus-Response Intensity): व्यवहारवाद के अनुसार, वातावरण से प्राप्त होने वाला उद्दीपक जितना तीव्र, स्पष्ट और शक्तिशाली होगा, प्राणी द्वारा की जाने वाली अनुक्रिया उतनी ही अविलम्ब, त्वरित और प्रभावी होगी। अर्थात, प्रत्येक बाह्य अनुक्रिया के लिए एक पर्याप्त बाह्य उद्दीपन का होना अनिवार्य शर्त है।
- 5. पर्यावरणवाद की प्रधानता (Environmentalism): व्यवहारवादी विचारक व्यवहार के निर्माण में वंशानुक्रम या जन्मजात आनुवंशिक क्षमताओं को बहुत अधिक महत्वपूर्ण नहीं मानते। वे वाटसन की भाँति यह मानते हैं कि पर्यावरणीय बल, अभ्यास, प्रशिक्षण और बाह्य उद्दीपन ही व्यक्ति के भावी व्यवहार और उसके सीखने की दिशा को पूरी तरह से निर्धारित और नियंत्रित करते हैंं।
4. व्यवहारवादी दृष्टिकोण के अनुसार सीखने की मुख्य विशेषताएँ
व्यवहारवाद के आलोक में, सीखने (Learning) की प्रक्रिया में निम्नलिखित वैज्ञानिक विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती हैं:
- अनुबंधित प्रतिवर्त बनाने की क्षमता: रूसी शरीर क्रिया वैज्ञानिक इवान पॉवलॉव के अनुसार, सीखना वास्तव में कृत्रिम उद्दीपकों के प्रति अनुबंधित प्रतिवर्त (Conditioned Reflexes) बनाने की एक जैविक क्षमता हैं।
- प्रतिक्रिया की संभावना में परिवर्तन: बी.एफ. स्किनर के अनुसार, सीखना प्राणी के व्यवहार में आने वाला वह रूपांतरण है जिसके द्वारा भविष्य में किसी वांछित प्रतिक्रिया के प्रकट होने की संभावना या बारंबारता बढ़ जाती हैं।
- उपयुक्त अनुक्रिया का चयन: एडवर्ड एल. थॉर्नडाइक के अनुसार, सीखने का अर्थ किसी समस्या या परिस्थिति के सामने आने पर उपलब्ध विकल्पों में से सबसे उपयुक्त प्रतिक्रिया का चयन करना और उसे बाह्य उद्दीपक के साथ मजबूती से संबद्ध करना हैं।
- पुनर्बलन पर निर्भरता: व्यवहारवाद के अनुसार, सीखना तब तक पुख्ता और स्थायी नहीं हो सकता जब तक कि की गई अनुक्रिया को कोई उचित पुनर्बलन (Reinforcement) या पुरस्कार प्राप्त न हो जाए। जब व्यवहार को पुनर्बलन मिलता है, तो उसके दोहराने की गति बढ़ती हैं।
5. प्रमुख व्यवहारवादी सीखने के सिद्धांत (Major Behaviorist Learning Theories)
व्यवहारवाद की आधारभूत मान्यताओं को सिद्ध करने के लिए अलग-अलग मनोवैज्ञानिकों ने पशुओं और मनुष्यों पर कई ऐतिहासिक प्रयोग किए, जिनके आधार पर निम्नलिखित सिद्धांतों का प्रतिपादन हुआ:
| सिद्धांत का नाम (THEORY) | मुख्य प्रवर्तक (PIONEER) | प्रयोग का जीव (SUBJECT) | सिद्धांत की मुख्य विशेषता (CORE FEATURE) |
|---|---|---|---|
| प्रयत्न एवं भूल का सिद्धांत (Trial and Error Theory) | एडवर्ड ली थॉर्नडाइक | भूखी बिल्ली | यह सिद्धांत उद्दीपक-अनुक्रिया (S-R) बंधन और निरंतर अभ्यास द्वारा सीखने पर बल देता है। यह गणित और विज्ञान जैसे विषयों की त्रुटियों के निराकरण में अत्यधिक उपयोगी है। |
| अनुक्रिया अनुबंधन सिद्धांत (Classical Conditioning) | इवान पी. पॉवलॉव | भूखा कुत्ता | यह सिद्धांत प्राकृतिक उद्दीपक (भोजन) के साथ कृत्रिम उद्दीपक (घंटी) का साहचर्य स्थापित करने पर बल देता है। यह शिशुओं में आदत निर्माण और भय दूर करने के लिए सर्वोत्तम है। |
| सक्रिय अनुबंधन सिद्धांत (Operant Conditioning) | बी.एफ. स्किनर | सफेद चूहा व कबूतर | यह सिद्धांत पूर्व ज्ञात उद्दीपक के स्थान पर प्राणी की स्वतंत्र अनुक्रिया और धनात्मक व नकारात्मक पुनर्बलन (Reinforcement) को सीखने का मुख्य आधार मानता है। |
| प्रबलन या आवश्यकता पूर्ति का सिद्धांत | सी.एल. हल | चूहा | यह सिद्धांत जैविक आवश्यकताओं की न्यूनतम पूर्ति और चालक न्यूनता (Drive Reduction) को सीखने की मुख्य अभिप्रेरणा मानता हैं। |
| समीपता का सिद्धांत (Contiguity Theory) | एडविन गुथरी | विभिन्न जीव | यह सिद्धांत कहता है कि शिक्षक को उत्तेजना और अनुक्रिया के बीच बिना किसी पुनर्बलन के केवल अधिकतम समीपता और साहचर्य स्थापित करने पर ध्यान देना चाहिएं। |
| सामाजिक सीखना सिद्धांत (Social Learning) | अल्बर्ट बंडुरा | मानव बालक | यह सिद्धांत प्रतिपादित करता है कि बच्चे सामाजिक व्यवहारों का केवल यांत्रिक अभ्यास नहीं करते, बल्कि दूसरों के व्यवहारों का प्रेक्षण (Observation) और अनुकरण करके सीखते हैंं। |
6. व्यवहारवादी दृष्टिकोण की समकालीन सीमाएँ और आलोचनाएँ (Critical Limitations)
यद्यपि व्यवहारवाद ने मनोविज्ञान को एक कड़ा वैज्ञानिक रूप प्रदान किया, परंतु आधुनिक संज्ञानात्मक मनोविज्ञान (जैसे—जीन पियाजे, वायगोत्स्की और ब्रुनर) के उदय के बाद इस दृष्टिकोण की कई स्तरों पर कड़ी आलोचना की गई, जिसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- यांत्रिक प्रक्रिया (Mechanical Process): आलोचकों का मानना है कि व्यवहारवाद ने मनुष्य को केवल एक 'जैविक मशीन' मान लिया है और उसके सीखने की पूरी यात्रा को एक यांत्रिक और कृत्रिम प्रक्रिया बना दिया है। यह मनुष्य की अपनी सोच और निर्णय क्षमता की उपेक्षा करता हैं।
- आंतरिक संज्ञानात्मक शक्तियों की उपेक्षा: यह दृष्टिकोण मनुष्य के भीतर चलने वाले चिंतन, तर्क, स्मृति, सूझबूझ, अंतःदृष्टि और संप्रत्यय निर्माण जैसी उच्च मानसिक प्रक्रियाओं की व्याख्या करने में पूरी तरह असमर्थ साबित होता हैं।
- पशु प्रयोगों का अंधानुकरण: व्यवहारवाद के अधिकांश सिद्धांत (थॉर्नडाइक, पॉवलॉव, स्किनर) प्रयोगशाला के नियंत्रित वातावरण में चूहों, बिल्लियों और कुत्तों पर प्रयोग करके विकसित किए गए थे। इन पशुओं के व्यवहार के निष्कर्षों को सीधे तौर पर एक संवेदनशील, विवेकशील और सामाजिक मानव बालक पर हूबहू लागू नहीं किया जा सकतां।
- सीखने के स्थायित्व का अभाव: अनुबंधन या यांत्रिक रटने द्वारा सीखा गया व्यवहार लंबे समय तक स्थायी नहीं रहता। यदि बाह्य उद्दीपक या पुनर्बलन को हटा लिया जाए, तो सीखे गए व्यवहार का धीरे-धीरे विलोपन (Extinction) हो जाता हैं।
7. व्यवहारवादी सिद्धांतों के शैक्षिक निहितार्थ (Educational Implications)
तमाम आलोचनाओं के बावजूद, व्यवहारवादी दृष्टिकोण आज भी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक कक्षाओं के कक्षा कक्ष प्रबंधन (Classroom Management) और बुनियादी कौशलों के विकास में शिक्षकों के लिए एक अत्यंत व्यावहारिक औजार की भूमिका निभाता है:
- बुनियादी कौशलों का विकास (Skill Acquisition): प्राथमिक कक्षाओं के छोटे शिशुओं को भाषा के अक्षरों का सही उच्चारण सिखाने, वर्णमाला लिखने, गणितीय पहाड़े (Tables) याद करवाने और सुंदर हस्तलेखन (Handwriting) के विकास में व्यवहारवाद की अभ्यास और पुनरावृत्ति की विधियाँ आज भी सबसे अधिक कारगर सिद्ध होती हैं क्योंकि इस स्तर पर गहन तार्किक चिंतन की आवश्यकता नहीं होतीं।
- पुरस्कार एवं दण्ड का संतुलित प्रयोग: यह सिद्धांत स्कूल के वातावरण में अनुशासन स्थापित करने और वांछित व्यवहारों को बढ़ावा देने के लिए सकारात्मक पुनर्बलन (जैसे—प्रेम भरी मुस्कान, शाबाश जैसे शब्द, प्रशंसा पत्र) के विवेकपूर्ण उपयोग पर बल देता है। हालांकि, आधुनिक नव-व्यवहारवाद (स्किनर) बच्चों को किसी भी प्रकार का शारीरिक या मानसिक दण्ड देने का सख्ती से विरोध करता है क्योंकि दण्ड से व्यवहार परिमार्जन स्थायी नहीं होतां।
- बुरी आदतों का परिमार्जन (Behavior Modification): अनुक्रिया अनुबंधन और व्यवहार संशोधन (Behavior Modification) की तकनीकों द्वारा बच्चों के भीतर व्याप्त अवांछनीय आदतों (जैसे—झूठ बोलना, चोरी करना, नाखून चबाना) को अच्छी आदतों से प्रतिस्थापित किया जा सकता है। इसके द्वारा बच्चों के मन में बैठे किसी विशिष्ट वस्तु या परीक्षा के प्रति अकारण भय (Phobia) और मानसिक रोगों को भी दूर किया जा सकता हैं।
- स्पष्ट उद्देश्यों और प्रेरणा पर बल: स्किनर का सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि शिक्षक को कक्षा में जाने से पूर्व बच्चों के सामने शिक्षण के स्पष्ट उद्देश्य रखने चाहिए और विषय-वस्तु को इतने छोटे-छोटे रोचक पदों में प्रस्तुत करना चाहिए (जैसे—अभिक्रमित अनुदेशन या प्रोग्राम्ड लर्निंग) जिससे प्रत्येक पद की सफलता पर बच्चों को तत्काल प्रेरणा और प्रतिपुष्टि प्राप्त हो सकें।
निष्कर्ष (Conclusion):
सीखने का व्यवहारवादी दृष्टिकोण और उसकी आधारभूत मान्यताएँ हमें यह अमूल्य समझ देती हैं कि बच्चों का बाह्य व्यवहार और उनका अधिगम काफी हद तक उन्हें मिलने वाले पर्यावरणीय अनुभवों, उद्दीपनों और अभ्यास की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। भले ही आधुनिक रचनावादी युग में हम बच्चों को एक खाली स्लेट नहीं मान सकते, फिर भी कक्षा कक्ष की दैनिक गतिविधियों को व्यवस्थित करने, सही आदतें गढ़ने, और सकारात्मक पुनर्बलन द्वारा बच्चों को अभिप्रेरित रखने में व्यवहारवाद के व्यावहारिक नियमों की उपेक्षा नहीं की जा सकतीं।
एक भावी डी.एल.एड./बी.एड. प्रोग्रेसिव शिक्षक के रूप में, आपका यह व्यावसायिक उत्तरदायित्व है कि आप व्यवहारवाद की यांत्रिक कड़ापन को छोड़कर उसके केवल सकारात्मक और कल्याणकारी तत्वों (जैसे—सकारात्मक पुनर्बलन, भयमुक्ति, और निरंतर अभ्यास) को अपनी समावेशी कक्षा में अपनाएं, ताकि प्रत्येक शिक्षार्थी को एक अनुकूल और समृद्ध मनोवैज्ञानिक वातावरण प्राप्त हो सके और उसके संतुलित व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित हो सकें।
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