बिहार डी.एल.एड. (D.El.Ed) और बी.एड. (B.Ed) के प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम में पत्र S2 (संज्ञान, सीखना और बाल विकास) के अंतर्गत व्यवहारवादी सिद्धांतों की व्यावहारिक कड़ियों को समझना सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस पत्र की तृतीय इकाई "सीखने के व्यवहारवादी एवं सूचना प्रसंस्करण सिद्धांतों की समझ" के अंतर्गत अध्याय 4: "बी.एफ. स्किनर का सक्रिय अनुबंधन सिद्धांत (Operant Conditioning Theory): स्किनर बॉक्स प्रयोग, धनात्मक व नकारात्मक पुनर्बलन (Reinforcement), दण्ड और पुनर्बलन में अंतर" बाल-मनोविज्ञान का एक अत्यंत आधारभूत, वैज्ञानिक और परीक्षा-उपयोगी अध्याय है। एक भावी शिक्षक के लिए यह समझना अनिवार्य है कि बच्चे अपनी मर्जी से सक्रिय होकर कैसे सीखते हैं, पुनर्बलन (इनाम) का सही उपयोग कैसे किया जाता है और दण्ड देने से बच्चों के व्यवहार पर क्या नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
---1. प्रस्तावना: बी.एफ. स्किनर और सिद्धांत का ऐतिहासिक उदय (Historical Background)
सीखने के व्यवहारवादी दृष्टिकोण के अंतर्गत जहाँ इवान पी. पॉवलॉव ने 'शास्त्रीय अनुबंधन' (Type-S Conditioning) का प्रतिपादन किया, जिसमें प्राणी निष्क्रिय होकर केवल बाह्य उद्दीपक (घंटी) के प्रति अनुक्रिया करता है, वहीं अमेरिकी मनोवैज्ञानिक बुरहस फ्रेडरिक स्किनर (Burrhus Frederic Skinner) ने इस यांत्रिक कड़ेपन को चुनौती दी। स्किनर ने स्पष्ट किया कि दैनिक जीवन में प्राणी हमेशा किसी बाह्य उद्दीपक के दबाव में ही क्रिया नहीं करता, बल्कि वह अपने वातावरण में स्वयं सक्रिय होकर स्वतंत्र रूप से अनेक अनुक्रियाएँ (Operations) करता रहता है।
स्किनर ने वर्ष 1938 में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'The Behavior of Organisms' और बाद में वर्ष 1953 में 'Science and Human Behavior' में एक नवीन सिद्धांत का प्रतिपादन किया, जिसे 'सक्रिय अनुबंधन सिद्धांत' (Operant Conditioning Theory) या 'क्रियाप्रसूत अनुबंधन सिद्धांत' कहा जाता है। इसे 'टाइप-R अनुबंधन' या 'साधनात्मक अनुबंधन' (Instrumental Conditioning) भी कहते हैं। इस सिद्धांत ने स्पष्ट किया कि व्यवहार को उसके परिणामों (Consequences) द्वारा नियंत्रित और परिमार्जित किया जा सकता है।
---2. सक्रिय अनुबंधन सिद्धांत का मूल अर्थ (Meaning of Operant Conditioning)
स्किनर के अनुसार, व्यवहार मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है:
- 1. प्रतिक्रियात्मक व्यवहार (Respondent Behavior): वह व्यवहार जो किसी ज्ञात बाह्य उद्दीपक के कारण प्रत्यक्ष रूप से उत्पन्न होता है; जैसे—आँखों पर तेज रोशनी पड़ने पर पलकों का स्वतः बंद हो जाना, या स्वादिष्ट भोजन देखकर मुँह में लार आ जाना (जैसा पॉवलॉव के प्रयोग में हुआ था)।
- 2. क्रियाप्रसूत व्यवहार (Operant Behavior): वह व्यवहार जिसका संबंध किसी ज्ञात बाह्य उद्दीपक से नहीं होता, बल्कि प्राणी अपने पर्यावरण में स्वयं आगे बढ़कर स्वतंत्र रूप से सक्रिय अनुक्रियाएँ करता है; जैसे—बच्चे का कमरे में खिलौने ढूँढ़ना, हाथ-पैर मारना, या शिक्षक के पूछने पर छात्र द्वारा स्वयं हाथ खड़ा करना।
स्किनर का मूल सिद्धांत यह प्रतिपादित करता है कि यदि किसी स्वतंत्र क्रियाप्रसूत व्यवहार या अनुक्रिया के बाद प्राणी को कोई सुखद परिणाम या 'पुनर्बलन' (Reinforcement) प्राप्त होता है, तो भविष्य में उस व्यवहार के दोबारा दोहराए जाने की संभावना या बारंबारता अत्यधिक बढ़ जाती है। इसके विपरीत, यदि किसी कार्य का परिणाम अरुचिकर या दण्ड स्वरूप होता है, तो वह व्यवहार धीरे-धीरे धीमा होकर समाप्त हो जाता है।
---3. बी.एफ. स्किनर के सुप्रसिद्ध प्रयोगात्मक अध्ययन (The Famous Experiments)
स्किनर ने अपने सक्रिय अनुबंधन के नियमों को प्रमाणित करने के लिए मुख्य रूप से चूहों और कबूतरों पर नियंत्रित प्रयोगशाला वातावरण में कई ऐतिहासिक प्रयोग किए, जिनका विवरण नीचे दिया गया है:
सफेद चूहे पर प्रयोग (The Rat Experiment):
स्किनर ने एक भूखे सफेद चूहे को अपने द्वारा विशेष रूप से निर्मित एक बक्से में बंद कर दिया, जिसे बाद में शिक्षा जगत में 'स्किनर बॉक्स' (Skinner Box) का नाम दिया गया। इस बॉक्स की बनावट अत्यंत वैज्ञानिक थी। यह पूरी तरह से ध्वनि-प्रूफ था और इसके भीतर एक लीवर (Lever) लगा हुआ था, जिसका सीधा संबंध बॉक्स के बाहर रखी एक भोजन तश्तरी (Food Dish) और एक स्वचालित रिकॉर्डर से था। जब भी वह लीवर दबता था, बॉक्स के भीतर लगे एक मैकेनिज्म से भोजन की एक छोटी गोली (Pellet) तश्तरी में अपने-आप गिर जाती थी।
भूखा चूहा शुरुआत में बॉक्स की दीवारों को सूंघने, कूदने और पैर मारने जैसी कई स्वतंत्र क्रियाप्रसूत अनुक्रियाएँ (Operant Responses) करने लगा। इन बेतरतीब गतियों के दौरान अचानक चूहे का पैर बक्से के उस लीवर पर पड़ गया। लीवर के दबते ही एक 'क्लिक' की आवाज हुई और भोजन की एक गोली तश्तरी में आ गिरी। भूखे चूहे ने तुरंत उस भोजन को खा लिया।
स्किनर ने देखा कि जब चूहे को दोबारा बॉक्स में रखा गया, तो उसकी दीवारों को निरर्थक सूंघने की गतियां धीरे-धीरे कम होने लगीं। अब चूहा पहले की अपेक्षा बहुत जल्दी लीवर के पास जाकर उसे दबाने लगा। कई प्रयासों के बाद चूहे ने यह पूरी तरह सीख लिया कि लीवर दबाने से भोजन की प्राप्ति होती है। यहाँ लीवर दबाना एक सक्रिय अनुक्रिया (Operant Response) है और भोजन की गोली एक पुनर्बलन (Reinforcer) का कार्य करती है, जिसने लीवर दबाने के व्यवहार को सुदृढ़ कर दिया।
कबूतर पर प्रयोग (The Pigeon Experiment):
स्किनर ने कबूतरों के लिए भी एक विशेष बॉक्स (Pigeon Box) तैयार किया। इसमें भोजन की प्राप्ति के लिए लीवर के स्थान पर एक विशिष्ट स्थान पर चोंच मारनी (Pecking) होती थी। जब भूखा कबूतर उस गोल घेरे या कुंजी पर चोंच मारता था, तो उसे अनाज के दाने प्राप्त होते थे। कबूतर ने भी बार-बार चोंच मारकर पुनर्बलन प्राप्त करने की इस कला को सक्रिय अनुबंधन के नियमों के तहत आसानी से सीख लिया।
---4. पुनर्बलन की संकल्पना और इसके प्रकार (Concept and Types of Reinforcement)
स्किनर के सक्रिय अनुबंधन सिद्धांत की सबसे महत्वपूर्ण और केंद्रीय आत्मा 'पुनर्बलन' (Reinforcement) है। पुनर्बलन से तात्पर्य किसी भी ऐसे उद्दीपक, घटना या परिणाम से है, जो किसी की गई अनुक्रिया के तुरंत बाद उपस्थित होने पर उस व्यवहार के दोबारा दोहराए जाने की संभावना या दर को शक्तिशाली ढंग से बढ़ा देता है।
स्किनर ने पुनर्बलन को मुख्य रूप से दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया है, जिनका सूक्ष्म और व्यावहारिक विश्लेषण निम्नलिखित है:
1. धनात्मक पुनर्बलन (Positive Reinforcement):
धनात्मक पुनर्बलन से तात्पर्य किसी ऐसे सुखद या वांछित उद्दीपक को अनुक्रिया के बाद कक्षा कक्ष या वातावरण में प्रस्तुत करने से है, जिसे पाकर प्राणी आनंद का अनुभव करता है और अपने उस व्यवहार को बार-बार दोहराना चाहता है।
शैक्षणिक उदाहरण: जब कोई छात्र कक्षा में शिक्षक के प्रश्न का बिल्कुल सही उत्तर देता है, और शिक्षक उसे तुरंत "शाबाश!", "बहुत अच्छे!", "उत्कृष्ट!" जैसे शब्द कहता है, या उसकी कॉपी पर एक स्टार (Star) देता है, या पूरी कक्षा से उसके लिए ताली बजवाता है, तो ये सभी सुखद उद्दीपक धनात्मक पुनर्बलन (Positive Reinforcer) का कार्य करते हैं। इससे छात्र भविष्य में और अधिक पढ़ने और सही उत्तर देने के लिए आंतरिक रूप से अभिप्रेरित होता है।
2. नकारात्मक पुनर्बलन (Negative Reinforcement):
नकारात्मक पुनर्बलन को लेकर अक्सर प्रशिक्षु शिक्षकों में बहुत बड़ी भ्रांति पाई जाती है। वे इसे दण्ड समझ लेते हैं, जबकि यह दण्ड से बिल्कुल अलग है। नकारात्मक पुनर्बलन से तात्पर्य किसी भी ऐसी कष्टदायक, अरुचिकर या दमनकारी परिस्थिति/उद्दीपक को वातावरण से पूरी तरह हटा लेना या दूर कर देना है, जिसके हटने से प्राणी को राहत महसूस होती है और उसका वांछित व्यवहार सुदृढ़ हो जाता है। अर्थात, यह भी व्यवहार की दर को बढ़ाता है, कम नहीं करता।
शैक्षणिक उदाहरण: यदि कक्षा कक्ष की खिड़की के बाहर से आ रहे अत्यधिक शोर के कारण बच्चे शांति से पढ़ नहीं पा रहे हैं, और शिक्षक जाकर खिड़की को बंद कर देता है जिससे शोर आना बंद हो जाता है और बच्चे आराम से पढ़ने लगते हैं। यहाँ उस 'कष्टदायक शोर को हटाना' एक नकारात्मक पुनर्बलन (Negative Reinforcement) है, जिसने बच्चों के शांत होकर पढ़ने के व्यवहार को बढ़ा दिया। इसी प्रकार, धूप से बचने के लिए छाता लगाना, या सीटबेल्ट की कष्टदायक अलार्म ध्वनि से बचने के लिए कार चालक द्वारा सीटबेल्ट बांधना इसके प्रमुख व्यावहारिक उदाहरण हैं।
5. पुनर्बलन अनुसूचियाँ (Schedules of Reinforcement)
स्किनर ने अपने प्रयोगों में यह भी खोजा कि बच्चों या पशुओं को पुनर्बलन किस समय और किस क्रम में दिया जाना चाहिए। इसके आधार पर उन्होंने दो मुख्य अनुसूचियाँ बताईं:
- सतत पुनर्बलन अनुसूची (Continuous Reinforcement Schedule): इसमें प्राणी जब भी कोई सही अनुक्रिया करता है, उसे प्रत्येक बार पुनर्बलन दिया जाता है। जैसे—बच्चे द्वारा लिखे गए हर सही शब्द पर शाबाशी देना। यह अनुसूची किसी नए व्यवहार को **शुरुआत में सिखाने** के लिए सबसे उत्तम मानी जाती है, लेकिन इसमें व्यवहार का विलोपन भी बहुत तेजी से होता है।
- आंशिक या रुक-रुक कर पुनर्बलन अनुसूची (Partial/Intermittent Reinforcement Schedule): इसमें प्रत्येक अनुक्रिया पर पुनर्बलन न देकर कुछ चुनिंदा सही अनुक्रियाओं पर या एक निश्चित समय अंतराल के बाद पुनर्बलन दिया जाता है। स्किनर के अनुसार, सीखे गए व्यवहार को लंबे समय तक स्थायी बनाए रखने के लिए आंशिक पुनर्बलन अनुसूची सतत अनुसूची से कहीं अधिक शक्तिशाली होती है। इसके अंतर्गत निश्चित अनुपात और निश्चित अंतराल जैसी कड़ियाँ काम करती हैं।
6. दण्ड और पुनर्बलन में अंतर (Difference Between Punishment and Reinforcement)
शिक्षक प्रशिक्षण की परीक्षाओं और कक्षा कक्ष के मनोवैज्ञानिक प्रबंधन के दृष्टिकोण से 'दण्ड' (Punishment) और 'पुनर्बलन' (Reinforcement) के सैद्धांतिक व व्यावहारिक अंतर को समझना सबसे अनिवार्य शर्त है। कई पुराने ढर्रे के शिक्षक दण्ड को ही नकारात्मक पुनर्बलन मान लेते हैं, जो पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण सोच है।
इन दोनों के मूल स्वरूप, मनोवैज्ञानिक प्रभाव और उद्देश्यों के कड़े अंतर को स्पष्ट करने के लिए नीचे एक सरल रॉ-तालिका (बिना किसी सीएसएस के) प्रस्तुत की गई है:
| तुलना का आधार | पुनर्बलन (REINFORCEMENT) | दण्ड (PUNISHMENT) |
|---|---|---|
| मूल उद्देश्य | इसका उद्देश्य किसी वांछित या अच्छे व्यवहार के प्रकट होने की संभावना और उसकी दर को हमेशा बढ़ाना होता है। | इसका उद्देश्य किसी अवांछित, बुरे या अनुशासनहीन व्यवहार के दोहराए जाने की संभावना को कम करना या समाप्त करना होता है। |
| स्वरूप (धनात्मक/नकारात्मक) | • धनात्मक: सुखद वस्तु देना (जैसे—पुरस्कार)। • नकारात्मक: कष्टदायक वस्तु को हटा लेना (जैसे—शोर बंद करना)। |
• धनात्मक: कष्टदायक उद्दीपक सीधे देना (जैसे—डाँटना, मारना)। • नकारात्मक: किसी सुखद वस्तु को छीन लेना (जैसे—खेलने का समय बंद करना)। |
| व्यवहार पर प्रभाव | यह बच्चों को यह सिखाता है कि उन्हें भविष्य में क्या करना चाहिए और सही रास्ता क्या है। | यह बच्चों को केवल यह बताता है कि उन्हें क्या नहीं करना चाहिए, लेकिन यह सही व्यवहार का विकल्प नहीं देता। |
| मनोवैज्ञानिक प्रभाव | यह बच्चे के भीतर आत्मविश्वास, आत्म-सम्मान और सीखने के प्रति सकारात्मक रुचि जाग्रत करता है। | यह बच्चे के मन में शिक्षक और स्कूल के प्रति गहरा भय, गुस्सा, हीनभावना, कुंठा और विद्रोह की भावना पैदा करता है। |
| स्थायित्व | इसके द्वारा सुदृढ़ किया गया व्यवहार लंबे समय तक स्थायी और प्रगतिशील बना रहता है। | दण्ड द्वारा व्यवहार केवल कुछ समय के लिए दबता है (डर के कारण), लेकिन जैसे ही दण्ड का भय हटता है, अवांछित व्यवहार दोबारा शुरू हो जाता है। |
7. सक्रिय अनुबंधन की अन्य महत्वपूर्ण मानसिक प्रक्रियाएँ
पॉवलॉव की भाँति स्किनर के सिद्धांत में भी कुछ विशिष्ट विकासात्मक प्रक्रियाएँ निरंतर क्रियाशील रहती हैं:
- आकृति निर्माण या शेपिंग (Shaping / Successive Approximations): जब कोई बच्चा किसी जटिल या कठिन कार्य को एक बार में नहीं सीख पाता, तो शिक्षक उसके व्यवहार को छोटे-छोटे क्रमिक चरणों में विभाजित करता है। बच्चा जैसे-जैसे लक्ष्य के करीब पहुँचने वाली छोटी-छोटी सही अनुक्रियाएँ करता है, शिक्षक उसे प्रत्येक कदम पर पुनर्बलन देकर वांछित रूप प्रदान करता है। इसे ही 'शेपिंग' या 'आकृति निर्माण' की कला कहा जाता है। सर्कस में जानवरों को कड़े करतब सिखाना या मूक-बधिर बच्चों को बोलना सिखाना इसी तकनीक पर आधारित है।
- विलोपन (Extinction): यदि चूहे द्वारा लीवर दबाने पर उसे भोजन देना पूरी तरह बंद कर दिया जाए, तो चूहा धीरे-धीरे लीवर दबाना बंद कर देता है। इसी प्रकार, कक्षा में यदि कोई छात्र रचनात्मक कार्य करता है और शिक्षक उसे लंबे समय तक कोई धनात्मक पुनर्बलन (प्रशंसा) नहीं देता, तो छात्र का वह अच्छा व्यवहार धीरे-धीरे समाप्त या विलोपित हो जाता है।
8. सिद्धांत की समकालीन सीमाएँ और आलोचनात्मक समीक्षा (Critical Analysis)
यद्यपि स्किनर का सक्रिय अनुबंधन सिद्धांत व्यवहार परिमार्जन का एक अत्यंत सशक्त वैज्ञानिक प्रतिमान प्रस्तुत करता है, परंतु समकालीन संज्ञानात्मक और निर्माणवादी मनोवैज्ञानिकों द्वारा इसकी निम्नलिखित सीमाओं की ओर संकेत किया गया है:
- मानव विवेक की उपेक्षा: आलोचकों का मानना है कि स्किनर ने मनुष्य को केवल पर्यावरण के हाथों की कठपुतली या एक रोबोट मान लिया है, जो केवल पुनर्बलन के लालच में क्रिया करता है। यह सिद्धांत मनुष्य की अपनी आंतरिक इच्छाशक्ति, आत्म-प्रेरणा और सूझबूझ की पूरी उपेक्षा करता है।
- यांत्रिक रटंत को बढ़ावा: इसके द्वारा निर्मित प्रविधियाँ कई बार कक्षा कक्ष को अत्यंत यांत्रिक और उबाऊ बना देती हैं, जहाँ बच्चा बिना सोचे-समझे केवल पुरस्कार पाने के लिए कड़ियों को रटने लगता है।
- आंतरिक अभिप्रेरणा का ह्रास: यदि बच्चों को प्रत्येक छोटे कार्य के लिए बार-बार बाहरी पुरस्कार (जैसे—चॉकलेट या खिलौने) दिए जाएं, तो उनकी काम के प्रति अपनी वास्तविक **आंतरिक अभिप्रेरणा (Intrinsic Motivation)** नष्ट हो जाती है। जब पुरस्कार मिलना बंद हो जाता है, तो वे पढ़ना भी बंद कर देते हैं।
9. शिक्षकों के लिए इस अध्याय के शैक्षिक निहितार्थ (Educational Implications)
तमाम आलोचनाओं के बावजूद, स्किनर का सक्रिय अनुबंधन सिद्धांत आधुनिक बाल-केंद्रित शिक्षा व्यवस्था और कक्षा कक्ष प्रबंधन (Classroom Management) में शिक्षकों के लिए सबसे व्यावहारिक मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है:
- अभिक्रमित अनुदेशन (Programmed Instruction): स्किनर के सिद्धांत के आधार पर ही शिक्षा जगत में अभिक्रमित अनुदेशन की नींव पड़ी। इसके तहत पाठ्य-पुस्तक की कठिन विषय-वस्तु को छोटे-छोटे तार्किक पदों (Frames) में विभाजित किया जाता है। छात्र अपनी गति से पढ़ते हुए प्रत्येक पद का उत्तर देते हैं और सही उत्तर होने पर उन्हें तत्काल प्रतिपुष्टि (पुनर्बलन) प्राप्त होती है, जिससे वे बिना किसी शिक्षक के भी स्वयं सीख सकते हैं। वर्तमान कंप्यूटर-आधारित शिक्षा (CAL) इसी पर टिकी है।
- कक्षा कक्ष में धनात्मक पुनर्बलन का विवेकपूर्ण उपयोग: एक कुशल शिक्षक को यह भली-भाँति जानना चाहिए कि कक्षा में 'शाबाश' या 'बहुत अच्छे' जैसे शब्दों की क्या ताकत होती है। शिक्षक को हाशियाकृत और विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के छोटे-छोटे प्रयासों की भी प्रशंसा करके उन्हें मुख्यधारा से जोड़ना चाहिए।
- दण्ड का पूर्ण निषेध (No Punishment Policy): स्किनर का सिद्धांत बाल-मनोविज्ञान के आधार पर यह पूरी तरह सिद्ध करता है कि बच्चों को मारना, डाँटना या मानसिक रूप से प्रताड़ित करना (दण्ड देना) उनके अधिगम के लिए पूरी तरह हानिकारक है। दण्ड देने से बच्चे स्कूल से भागने लगते हैं और उनमें नकारात्मक ग्रंथियों का निर्माण होता है। इसलिए आरटीई 2009 के तहत भी शारीरिक दण्ड को पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है। अवांछित व्यवहार को सुधारने के लिए दण्ड के स्थान पर 'विलोपन' या 'नकारात्मक दण्ड' (सुखद वस्तु को कुछ समय के लिए दूर करना) का सहारा लेना चाहिए।
- व्यवहार संशोधन और शेपिंग तकनीकों का प्रयोग: शिक्षक इस सिद्धांत की मदद से मंदबुद्धि, गंभीर अधिगम अक्षमता (जैसे—डिस्ग्राफिया, डिस्लेक्सिया) से जूझ रहे बच्चों के कठिन पाठ्यक्रमों को छोटे-छोटे सरल अंशों में तोड़कर, 'शेपिंग' की प्रविधि द्वारा उन्हें बुनियादी लेखन और पठन कौशल आसानी से सिखा सकते हैं।
- वांछित आदतों का सुदृढ़ीकरण: कक्षा में अनुशासन बनाए रखने, समय पर गृहकार्य पूरा करने और सहपाठियों के साथ सहयोगात्मक सामाजिक आदतें विकसित करने में स्किनर के पुनर्बलन के नियम आज भी अचूक अस्त्र माने जाते हैं।
निष्कर्ष (Conclusion):
बी.एफ. स्किनर का सक्रिय अनुबंधन सिद्धांत हमें यह अमूल्य और प्रगतिशील चेतना प्रदान करता है कि बच्चे अपनी दुनिया में केवल निष्क्रिय रहकर वातावरण के थपेड़े नहीं खाते, बल्कि वे अपनी क्रियाओं के माध्यम से सक्रिय होकर नए अनुभवों का सृजन स्वयं करते हैं। एक शिक्षक के रूप में हमारी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि हम उनकी इस सक्रियता को दण्ड के भय से कुचलने के बजाय, धनात्मक पुनर्बलन और रचनात्मक प्रतिपुष्टि के माध्यम से एक सही और वैज्ञानिक दिशा प्रदान करें।
एक भावी राष्ट्र-निर्माता प्रोग्रेसिव शिक्षक के रूप में, आपका यह नैतिक और व्यावसायिक उत्तरदायित्व है कि आप अपनी कक्षाओं से भय और दण्ड के औपनिवेशिक आतंक को समूल नष्ट करें। जब आप स्किनर के इन व्यावहारिक नियमों, शेपिंग की तकनीकों और आंशिक पुनर्बलन के सिद्धांतों को अपनी समावेशी कक्षा में संवेदनशीलता के साथ प्रयुक्त करेंगे, तभी प्रत्येक शिक्षार्थी को अपनी गति से बढ़ने का एक गरिमापूर्ण और समतामूलक अवसर प्राप्त होगा, जिससे एक सुशिक्षित और सुसंस्कृत लोकतांत्रिक समाज का स्वप्न साकार हो सकेगा।
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