बिहार डी.एल.एड. (D.El.Ed) और बी.एड. (B.Ed) के प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम में पत्र S2 (संज्ञान, सीखना और बाल विकास) के अंतर्गत व्यवहारवादी सिद्धांतों की व्यावहारिक कड़ियों को समझना सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस पत्र की तृतीय इकाई "सीखने के व्यवहारवादी एवं सूचना प्रसंस्करण सिद्धांतों की समझ" के अंतर्गत अध्याय 3: "आई.पी. पॉवलॉव का अनुक्रिया अनुबंधन सिद्धांत (Classical Conditioning Theory): स्वाभाविक/अनुबंधित उद्दीपक-अनुक्रिया, सामान्यीकरण, विलोपन, विभेदीकरण एवं शैक्षिक निहितार्थ" बाल-मनोविज्ञान का एक अत्यंत आधारभूत और वैज्ञानिक अध्याय है। एक भावी शिक्षक के लिए यह समझना अनिवार्य है कि बच्चे आदतों का निर्माण कैसे करते हैं, उनके मन से भय को कैसे दूर किया जा सकता है और वातावरण के उद्दीपनों के साथ उनका अनुबंधन कैसे स्थापित होता है।
---1. प्रस्तावना: इवान पी. पॉवलॉव और सिद्धांत का ऐतिहासिक उदय (Historical Background)
सीखने के व्यवहारवादी दृष्टिकोण के अंतर्गत 'अनुबंधन' (Conditioning) की संकल्पना को स्थापित करने का श्रेय रूसी शरीर क्रिया वैज्ञानिक (Physiologist) इवान पेट्रोविच पॉवलॉव (Ivan Petrovich Pavlov) को जाता है। पॉवलॉव मूल रूप से कोई मनोवैज्ञानिक नहीं थे, बल्कि वे पाचन क्रिया (Digestion) के शारीरिकी पक्षों पर शोध कर रहे थे। लार ग्रंथियों के पाचन संबंधी इसी शोध के लिए उन्हें वर्ष 1904 में विज्ञान के सर्वोच्च 'नोबेल पुरस्कार' (Nobel Prize) से सम्मानित किया गया था।
अपने शोध के दौरान पॉवलॉव ने एक अत्यंत विशिष्ट व्यवहारिक घटना देखी कि जब उनके प्रयोग का कुत्ता वास्तविक भोजन को देखता था, तो उसके मुँह से लार (Saliva) टपकने लगती थी, जो कि एक स्वाभाविक शारीरिक क्रिया है। परंतु कुछ दिनों बाद उन्होंने प्रेक्षित किया कि कुत्ता केवल भोजन को देखकर ही नहीं, बल्कि भोजन लाने वाले परिचारक (Assistant) के कदमों की आवाज सुनकर या भोजन परोसने वाले बर्तन की खड़खड़ाहट सुनकर भी लार टपकाना शुरू कर देता था। इस आकस्मिक प्रेक्षण ने पॉवलॉव को झकझोर दिया और उन्होंने मनोविज्ञान की दिशा बदलने वाले 'शास्त्रीय अनुबंधन सिद्धांत' (Classical Conditioning Theory) की नींव रखी। इसे 'सम्बद्ध अनुक्रिया सिद्धांत' या 'टाइप-S अनुबंधन' भी कहा जाता है।
---2. शास्त्रीय अनुबंधन सिद्धांत का मूल अर्थ (Meaning of Classical Conditioning)
पॉवलॉव के अनुसार, प्रत्येक प्राणी के भीतर जन्मजात रूप से कुछ प्राकृतिक या स्वाभाविक उद्दीपक (जैसे—भोजन) को देखकर एक प्राकृतिक या स्वाभाविक अनुक्रिया (जैसे—लार टपकना, डरना या चौंकना) प्रकट करने की एक स्वचालित जैविक क्षमता होती है। इसे प्रतिवर्त क्रिया (Reflex Action) कहा जाता है।
पॉवलॉव ने स्पष्ट किया कि यदि इस स्वाभाविक उद्दीपक के साथ बार-बार कोई अन्य कृत्रिम या तटस्थ उद्दीपक (जैसे—घंटी की आवाज, प्रकाश या कोई विशिष्ट संकेत) प्रस्तुत किया जाए, तो कुछ समय बाद प्राणी उस कृत्रिम उद्दीपक के साथ एक मजबूत मानसिक संबंध या साहचर्य स्थापित कर लेता है। परिणामस्वरूप, वास्तविक स्वाभाविक उद्दीपक की अनुपस्थिति में भी केवल उस कृत्रिम उद्दीपक के सामने आने पर ही प्राणी वही अनुक्रिया करने लगता है जो वह प्राकृतिक वस्तु को देखकर करता था। इसी साहचर्य को मनोवैज्ञानिक भाषा में 'अनुबंधन' (Conditioning) या 'सीखना' कहा जाता है।
---3. पॉवलॉव का सुप्रसिद्ध कुत्ता प्रयोग (The Famous Dog Experiment)
पॉवलॉव ने अपने इस सिद्धांत को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध करने के लिए एक भूखे कुत्ते को एक विशेष उपकरण से सुसज्जित मेज पर बांध दिया। उन्होंने कुत्ते की लार ग्रंथि (Parotid Gland) का एक छोटा ऑपरेशन करके उसमें काँच की एक पतली नली फिट कर दी, ताकि टपकने वाली लार की सही मात्रा और बूंदों को सटीक रूप से मापा जा सके। यह प्रयोग मुख्य रूप से तीन क्रमिक चरणों में संपन्न हुआ, जिनका विवरण निम्नलिखित है:
चरण 1: अनुबंधन से पूर्व की स्थिति (Before Conditioning)
इस प्रारंभिक चरण में कुत्ते के सामने एक स्वाभाविक उद्दीपक यानी भोजन (Unconditioned Stimulus - UCS) प्रस्तुत किया गया। भोजन को देखते ही कुत्ते के मुँह से स्वाभाविक रूप से लार (Unconditioned Response - UCR) टपकने लगी। यह एक पूरी तरह से जन्मजात, बिना सीखी हुई जैविक अनुक्रिया थी।
इसी चरण में जब कुत्ते के सामने एक तटस्थ या कृत्रिम उद्दीपक यानी घंटी की आवाज (Neutral Stimulus) प्रस्तुत की गई, तो कुत्ते ने केवल अपने कान खड़े किए (अवधान अनुक्रिया), लेकिन उसके मुँह से कोई लार नहीं टपकी।
चरण 2: अनुबंधन के दौरान की स्थिति (During Conditioning)
इस चरण में पॉवलॉव ने एक निश्चित नियोजन के तहत कृत्रिम और स्वाभाविक उद्दीपकों को एक साथ जोड़ना शुरू किया। उन्होंने पहले घंटी बजाई (कृत्रिम उद्दीपक) और उसके तुरंत बाद (लगभग 0.5 सेकंड के अंतराल पर) कुत्ते को भोजन (स्वाभाविक उद्दीपक) परोसा। भोजन को पाकर कुत्ते के मुँह से लार टपकने लगी। पॉवलॉव ने घंटी बजाने और भोजन देने के इस युग्म (Pairing) को कई दिनों तक लगातार दर्जनों बार दोहराया।
चरण 3: अनुबंधन के बाद की स्थिति (After Conditioning)
कई दिनों के कड़े अभ्यास के बाद अंतिम चरण में पॉवलॉव ने कुत्ते के सामने एक विशिष्ट बदलाव किया। उन्होंने केवल घंटी बजाई (Conditioned Stimulus - CS) और उसे कोई भोजन नहीं दिया। परंतु परिणाम अत्यंत विस्मयकारी था—भोजन की पूर्ण अनुपस्थिति के बावजूद केवल घंटी की आवाज सुनकर ही कुत्ते के मुँह से उतनी ही लार टपकने लगी। अब जो लार टपकी, वह स्वाभाविक अनुक्रिया नहीं थी, बल्कि उसे अनुबंधित अनुक्रिया (Conditioned Response - CR) कहा गया। कुत्ता घंटी की आवाज के साथ पूरी तरह अनुबंधित हो चुका था और यही व्यवहारवाद में सीखना है।
---4. सिद्धांत के विधिक तकनीकी संकेताक्षर (Technical Terms)
परीक्षा में उत्तर लेखन की प्रामाणिकता के लिए पॉवलॉव के सिद्धांत के इन तकनीकी सूत्रों और संकेताक्षरों को याद रखना अनिवार्य है:
- 1. UCS (Unconditioned Stimulus) - स्वाभाविक उद्दीपक: वह वस्तु या घटना जो बिना किसी पूर्व प्रशिक्षण के प्राणी में स्वाभाविक प्रतिक्रिया पैदा करती है; जैसे—भोजन।
- 2. UCR (Unconditioned Response) - स्वाभाविक अनुक्रिया: स्वाभाविक उद्दीपक के प्रति होने वाली जन्मजात और जैविक प्रतिक्रिया; जैसे—लार का आना।
- 3. CS (Conditioned Stimulus) - अनुबंधित/कृत्रिम उद्दीपक: वह तटस्थ वस्तु जो बार-बार दोहराए जाने पर स्वाभाविक उद्दीपक का स्थान ले लेती है; जैसे—घंटी की आवाज।
- 4. CR (Conditioned Response) - अनुबंधित अनुक्रिया: कृत्रिम उद्दीपक के प्रति होने वाली सीखी गई अनुक्रिया; जैसे—केवल घंटी सुनकर लार का आना।
अनुबंधन का गणितीय सूत्र स्वरूप:
• अनुबंधन से पूर्व: UCS (भोजन) =======> UCR (लार आना)
• अनुबंधन के दौरान: CS (घंटी) + UCS (भोजन) =======> UCR (लार आना)
• अनुबंधन के बाद: CS (घंटी) =======> CR (लार आना)
---5. शास्त्रीय अनुबंधन की पाँच प्रमुख मानसिक प्रक्रियाएँ (5 Major Processes)
पॉवलॉव ने अपने प्रयोगात्मक अध्ययनों के आधार पर यह प्रमाणित किया कि अनुबंधन की प्रक्रिया स्थिर नहीं होती, बल्कि यह पाँच महत्वपूर्ण नियमों और प्रक्रियाओं के तहत संचालित होती है:
1. उद्दीपक सामान्यीकरण (Stimulus Generalization):
जब कोई प्राणी किसी विशिष्ट अनुबंधित उद्दीपक (CS) के प्रति अनुक्रिया करना सीख जाता है, तो वह उस उद्दीपक से मिलती-जुलती या समान ध्वनि/आकृति वाली अन्य वस्तुओं के प्रति भी वैसी ही अनुक्रिया प्रदर्शित करने लगता है। इसी मानसिक प्रवृत्ति को उद्दीपक सामान्यीकरण कहते हैं।
उदाहरण: पॉवलॉव का कुत्ता मूल घंटी से थोड़ी भिन्न आवाज या किसी अन्य बर्तन की खड़खड़ाहट सुनकर भी लार टपकाने लगा था। व्यावहारिक जीवन में, यदि कोई छोटा बच्चा एक बार सफेद रंग के रोएंदार चूहे या बिल्ली से डर जाता है, तो वह भविष्य में सफेद रंग के किसी भी रोएंदार खिलौने या यहाँ तक कि सफेद फर वाले कोट को देखकर भी डरने लगता है।
2. उद्दीपक विभेदीकरण (Stimulus Discrimination):
यह सामान्यीकरण के बिल्कुल विपरीत की प्रक्रिया है। जब प्राणी को लगातार विभिन्न उद्दीपनों के बीच केवल एक विशिष्ट उद्दीपक पर ही स्वाभाविक भोजन दिया जाता है, तो वह धीरे-धीरे अन्य मिलते-जुलते उद्दीपनों और मूल अनुबंधित उद्दीपक के बीच बारीक अंतर करना (Vibhedikaran) सीख जाता है।
उदाहरण: जब कुत्ते को केवल एक खास पिच (Pitch) वाली घंटी की आवाज पर ही भोजन मिला और अन्य घंटियों पर भोजन नहीं दिया गया, तो कुत्ता केवल उसी विशिष्ट घंटी पर लार टपकाने लगा और बाकी आवाजों को नजरअंदाज करने लगा। स्कूल में बच्चा शुरुआत में सभी पुरुषों को 'पापा' कह सकता है (सामान्यीकरण), लेकिन धीरे-धीरे वह अपने वास्तविक पिता और अन्य पुरुषों के बीच अंतर करना सीख जाता है (विभेदीकरण)।
3. विलोपन या विलोप होना (Extinction):
यदि अनुबंधन स्थापित होने के बाद, प्राणी के सामने बार-बार केवल कृत्रिम उद्दीपक (CS - घंटी) ही प्रस्तुत किया जाए और उसके पीछे स्वाभाविक उद्दीपक (UCS - भोजन) को लंबे समय तक पूरी तरह से न दिया जाए, तो स्थापित हुआ अनुबंधन धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है। अंततः एक ऐसी स्थिति आती है जब केवल घंटी बजाने पर कुत्ते के मुँह से लार आना पूरी तरह बंद हो जाता है। इसी प्रक्रिया को विलोपन (Vilopan) कहा जाता है।
शैक्षणिक महत्व: यदि शिक्षक कक्षा में बच्चों के अच्छे व्यवहार पर दी जाने वाली प्रशंसा या पुरस्कार को हमेशा के लिए बंद कर दे, तो बच्चों का वह अच्छा व्यवहार धीरे-धीरे समाप्त या विलोपित हो जाता है।
4. स्वतः पुनरुद्भव या स्वतः प्राप्ति (Spontaneous Recovery):
विलोपन की प्रक्रिया संपन्न होने के कुछ समय बाद, यदि प्राणी को अचानक दोबारा वही अनुबंधित उद्दीपक (CS - घंटी) दिया जाए, तो बिना किसी नए प्रशिक्षण के भी वह दबी हुई अनुबंधित अनुक्रिया (CR - लार आना) अचानक कुछ मात्रा में वापस प्रकट हो जाती है। इसे स्वतः पुनरुद्भव कहते हैं। यह दर्शाता है कि विलोपन के कारण सीखी गई बात मस्तिष्क से पूरी तरह नष्ट नहीं होती, बल्कि केवल निष्क्रिय हो जाती है।
5. समय अंतराल का नियम (Temporal Contiguity):
अनुबंधन को पुख्ता बनाने के लिए कृत्रिम उद्दीपक (घंटी) और स्वाभाविक उद्दीपक (भोजन) के प्रस्तुतीकरण के बीच का समय अंतराल (Time Interval) अत्यंत न्यूनतम होना चाहिए। मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, यह अंतराल आदर्श रूप से 0.5 सेकंड से 5 सेकंड के बीच होना चाहिए। यदि घंटी अभी बजाई जाए और भोजन आधे घंटे बाद दिया जाए, तो उनके बीच कोई अनुबंधन स्थापित नहीं हो सकता।
---6. शास्त्रीय अनुबंधन के मुख्य नियम और परिस्थितियाँ
नीचे दी गई सरल रॉ-तालिका (बिना किसी सीएसएस के) के माध्यम से अनुबंधन को सफल बनाने वाली मुख्य आवश्यक श्रेणियों का एक स्पष्ट खाका प्रस्तुत किया गया है:
| नियम / परिस्थिति का नाम | क्रियान्वयन का मुख्य स्वरूप और वैज्ञानिक अर्थ |
|---|---|
| उद्दीपकों का क्रमिक अनुक्रम | हमेशा कृत्रिम उद्दीपक (घंटी) को स्वाभाविक उद्दीपक (भोजन) से पहले ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए, अन्यथा अनुबंधन संभव नहीं है। |
| बाह्य अवरोधों की अनुपस्थिति | प्रयोगशाला या कक्षा कक्ष पूरी तरह से बाहरी विकर्षणों (जैसे—अचानक होने वाला शोर, अन्य आवाजें) से मुक्त होना चाहिए, ताकि बच्चे का ध्यान केंद्रित रह सके। |
| प्राकृतिक उद्दीपक की प्रभावशीलता | स्वाभाविक उद्दीपक (भोजन) की तीव्रता कृत्रिम उद्दीपक से अधिक होनी चाहिए। भूखे कुत्ते के लिए भोजन का आकर्षण घंटी से कहीं ज्यादा शक्तिशाली था। |
7. सिद्धांत की सीमाएँ और आलोचनात्मक समीक्षा (Critical Analysis)
यद्यपि पॉवलॉव के इस सिद्धांत ने व्यवहार परिमार्जन को एक नया धरातल दिया, परंतु समकालीन संज्ञानात्मक मनोवैज्ञानिकों द्वारा इसकी निम्नलिखित कमियों की ओर संकेत किया गया है:
- यांत्रिक और चेतनाहीन अधिगम: यह सिद्धांत सीखने को पूरी तरह से एक पशुवत और यांत्रिक क्रिया मानता है, जिसमें मनुष्य की अपनी उच्च बौद्धिक शक्तियों—जैसे सूझबूझ, विचारशीलता, कल्पना और निर्णय क्षमता की पूरी उपेक्षा की गई है।
- स्थायित्व का अभाव: अनुबंधन द्वारा सीखी गई आदतें या व्यवहार बहुत लंबे समय तक स्थायी नहीं रहते। यदि बाह्य वातावरण से भोजन या पुनर्बलन हटा लिया जाए, तो व्यवहार का विलोपन होना निश्चित है।
- जटिल संप्रत्ययों के लिए अनुपयुक्त: इस यांत्रिक सिद्धांत के सहारे बच्चों को उच्च स्तर की गणितीय संक्रियाएं, वैज्ञानिक सिद्धांतों का विश्लेषण या अमूर्त दार्शनिक संप्रत्यय नहीं सिखाए जा सकते।
8. शिक्षकों के लिए इस अध्याय के शैक्षिक निहितार्थ (Educational Implications)
तमाम आलोचनाओं के बावजूद, प्राथमिक और उच्च प्राथमिक कक्षाओं के कक्षा कक्ष प्रबंधन (Classroom Management) और शिशुओं के व्यवहार परिमार्जन में पॉवलॉव का सिद्धांत आज भी शिक्षकों के लिए सबसे शक्तिशाली उपकरण माना जाता है:
- शिशुओं में अच्छी आदतों का निर्माण (Habit Formation): प्राथमिक विद्यालयों के छोटे बच्चों में सुबह जल्दी उठने, दांत साफ करने, नियमित रूप से गृहकार्य करने, बड़ों का सम्मान करने और साफ-सुथरे कपड़े पहनने जैसी अच्छी आदतों का निर्माण अनुबंधन के सिद्धांतों द्वारा बहुत आसानी से किया जा सकता है। शिक्षक को बस वांछित कार्य के साथ एक सकारात्मक उद्दीपक (जैसे—प्रशंसा या मुस्कान) को संबद्ध करना होता है।
- भाषा विकास और शब्दार्थ संबंध (Language Acquisition): छोटे बच्चों को भाषा के अक्षरों, शब्दों और वर्णमाला का ज्ञान इसी सिद्धांत के आधार पर दिया जाता है। जब हम बच्चे को 'क' अक्षर सिखाते हैं, तो साथ में 'कबूतर' का चित्र दिखाते हैं। यहाँ कबूतर का चित्र स्वाभाविक उद्दीपक है और 'क' का लिखित अक्षर कृत्रिम उद्दीपक है। बार-बार देखने पर बच्चा चित्र के बिना भी 'क' अक्षर को पहचानना सीख जाता है।
- भय, अंधविश्वास और संवेगात्मक कुंठा का निवारण (Elimination of Fear): यदि किसी बच्चे के मन में गणित विषय, किसी कड़े शिक्षक, या परीक्षा के प्रति अकारण भय (Phobia) बैठ गया है, तो 'वि-अनुबंधन' (De-conditioning) की तकनीक द्वारा उसके उस डर को दूर किया जा सकता है। शिक्षक को चाहिए कि वह कड़े अनुशासन के स्थान पर कक्षा में एक अत्यंत सहानुभूतिपूर्ण, आनंदमयी और भयमुक्त वातावरण (सकारात्मक उद्दीपक) तैयार करे, जिससे बच्चा स्कूल आने से डरना बंद कर दे।
- सहायक शिक्षण सामग्री (TLM) का वैज्ञानिक उपयोग: यह सिद्धांत स्पष्ट करता है कि अमूर्त संप्रत्ययों को सिखाने के लिए कक्षा में मूर्त सहायक सामग्रियों (जैसे—चार्ट, मॉडल, रंगीन चित्र, दृश्य-श्रव्य टूल्स) का होना क्यों आवश्यक है। ये सामग्रियाँ स्वाभाविक उद्दीपक का काम करती हैं, जो बच्चों के मानसिक स्कीमा को पुष्ट करती हैं।
- सुसंगत आवृत्ति और अभ्यास (Repetition and Drill): पॉवलॉव का प्रयोग यह सिद्ध करता है कि सीखने की शुरुआती अवस्था में कड़ियों को बार-बार दोहराना और निरंतर अभ्यास करना कितना महत्वपूर्ण है, क्योंकि अभ्यास से ही उद्दीपक और अनुक्रिया का बंधन सुदृढ़ होता है।
निष्कर्ष (Conclusion):
आई.पी. पॉवलॉव का अनुक्रिया अनुबंधन सिद्धांत हमें यह अमूल्य और प्रगतिशील चेतना प्रदान करता है कि बच्चों का सीखना केवल उनकी आंतरिक इच्छा पर ही निर्भर नहीं करता, बल्कि इसमें उनके आस-पास के पर्यावरणीय उद्दीपनों और अनुबंधन की कड़ियों की बहुत बड़ी भूमिका होती है। रटंत विद्या के कड़े विरोध और बाल-केंद्रित शिक्षा व्यवस्था के निर्माण में इस सिद्धांत का व्यावहारिक उपयोग अपरिहार्य है।
एक भावी डी.एल.एड./बी.एड. संवेदनशील शिक्षक के रूप में, आपका यह प्राथमिक व्यावसायिक उत्तरदायित्व है कि आप औपनिवेशिक काल के डंडे वाले कड़े शासन को छोड़कर, अपनी समावेशी कक्षा में एक ऐसा सुसंस्कृत, भयमुक्त और अभिप्रेरित वातावरण तैयार करें जहाँ प्रत्येक शिक्षार्थी स्कूल की गतिविधियों के साथ एक सकारात्मक और आनंदमयी अनुबंधन स्थापित कर सके, ताकि उसके संतुलित व्यक्तित्व का सर्वांगीण और न्यायपूर्ण विकास सुनिश्चित हो सके।
Quiz360