बिहार डी.एल.एड. (D.El.Ed) और बी.एड. (B.Ed) के प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम में पत्र S2 (संज्ञान, सीखना और बाल विकास) के अंतर्गत बच्चों के संज्ञानात्मक विकास को समझने के लिए रूसी मनोवैज्ञानिक लेव वायगोत्स्की का सिद्धांत सबसे प्रगतिशील और समकालीन आधार प्रस्तुत करता है। इस पत्र की चतुर्थ इकाई "बच्चे के विकास एवं सीखने में समाज की भूमिका" के अंतर्गत अध्याय 2: "सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में सीखने की समझ: लेव वायगोत्स्की (Lev Vygotsky) का सिद्धांत" बाल-मनोविज्ञान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और परीक्षा-उन्मुख अध्याय है। यह अध्याय हमें यह समझने की शिक्षक-अनुकूल दृष्टि देता है कि बच्चे ज्ञान का निर्माण बंद कमरों में अकेले नहीं करते, बल्कि समाज और संस्कृति के साथ अंतःक्रिया करके करते हैं।
---1. लेव वायगोत्स्की और सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत का उदय (Historical Background)
मनोविज्ञान के इतिहास में संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development) को लेकर दो बड़े दृष्टिकोण समानांतर रूप से उभरे। पहला दृष्टिकोण स्विट्जरलैंड के जीन पियाजे (Jean Piaget) का था, जिन्होंने 'विकासात्मक रचनावाद' (Developmental Constructivism) का प्रतिपादन किया। पियाजे ने बच्चे को एक 'नन्हा वैज्ञानिक' माना जो अपने भौतिक वातावरण में वस्तुओं के साथ स्वतंत्र क्रियाएं करके अपने ज्ञान का निर्माण स्वयं करता है। पियाजे के अनुसार विकास पहले होता है और अधिगम (सीखना) बाद में। उन्होंने बच्चे के संज्ञानात्मक विकास में समाज, संस्कृति और भाषा को बहुत अधिक महत्व नहीं दिया।
पियाजे के इसी एकाकी और जैविक दृष्टिकोण को चुनौती देते हुए सोवियत संघ (रूस) के महान मनोवैज्ञानिक लेव सेमनोविच वायगोत्स्की (Lev S. Vygotsky) ने **सामाजिक रचनावाद (Social Constructivism)** की मजबूत नींव रखी। वायगोत्स्की का जीवनकाल अत्यंत छोटा (1896-1934) था और मात्र 38 वर्ष की आयु में तपेदिक (Tuberculosis) के कारण उनका निधन हो गया। परंतु इस अल्पायु में भी उन्होंने जो विचार दिए, उसने समकालीन शिक्षाशास्त्र का कायाकल्प कर दिया।
वायगोत्स्की ने स्पष्ट किया कि बच्चे के संज्ञानात्मक विकास को उसके सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषाई परिवेश से अलग करके कभी नहीं समझा जा सकता। पियाजे के विपरीत, वायगोत्स्की ने प्रतिपादित किया कि "सीखना (Learning) एक सामाजिक गतिविधि है और समाज के सहयोग से होने वाला अधिगम ही बालक के संज्ञानात्मक विकास (Development) को गति प्रदान करता है।" अर्थात, अधिगम विकास का मार्ग प्रशस्त करता है।
---2. वायगोत्स्की के सिद्धांत के तीन मुख्य आधार स्तंभ (Three Core Pillars)
वायगोत्स्की का पूरा सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत मुख्य रूप से तीन बुनियादी तत्वों के अंतर्संबंधों पर टिका हुआ है, जिनका कड़ा विश्लेषण निम्नलिखित है:
1. सामाजिक अंतःक्रिया (Social Interaction):
वायगोत्स्की के अनुसार, बालक के भीतर सभी उच्च मानसिक प्रक्रियाएं—जैसे तार्किक चिंतन, अमूर्त सोच, समस्या समाधान और स्मृति—सबसे पहले सामाजिक स्तर पर लोगों के बीच अंतःक्रिया के रूप में प्रकट होती हैं, और उसके बाद वे बच्चे के भीतर व्यक्तिगत स्तर पर आत्मसात (Internalize) होती हैं। बच्चा समाज में अपने से बड़ों, माता-पिता, और शिक्षकों के साथ संवाद स्थापित करके ही ज्ञान की कड़ियों को गढ़ता हैं।
2. संस्कृति (Culture):
संस्कृति बच्चे को केवल रीति-रिवाज नहीं सिखाती, बल्कि वह बच्चे को सोचने और व्यवहार करने के लिए 'संज्ञानात्मक उपकरण' (Cognitive Tools) प्रदान करती है। प्रत्येक संस्कृति के अपने प्रतीक, लेखन प्रणालियाँ, मानचित्र, और कलाएं होती हैं। बच्चा जिस सांस्कृतिक माहौल में पलता है, उसका बौद्धिक स्वरूप भी उसी संस्कृति के सांचे में ढल जाता है। उदाहरण के लिए, एक आदिवासी परिवेश में रहने वाले बच्चे की स्थानिक और प्रकृतिवादी समझ शहरी मॉल संस्कृति में रहने वाले बच्चे से बिल्कुल भिन्न होगीं।
3. भाषा (Language):
वायगोत्स्की ने भाषा को संज्ञानात्मक विकास का सबसे शक्तिशाली और अनिवार्य माध्यम माना है। भाषा केवल दूसरों से बात करने का साधन नहीं है, बल्कि यह हमारे स्वयं के विचारों को नियंत्रित और सुव्यवस्थित करने का एक आंतरिक मानसिक उपकरण है। भाषा के अभाव में बच्चा अमूर्त चिंतन और जटिल सामाजिक संप्रत्ययों को आत्मसात करने में पूरी तरह असमर्थ रहता हैं।
---3. वायगोत्स्की के सिद्धांत के प्रमुख तकनीकी संप्रत्यय (Key Concepts)
डी.एल.एड. और बी.एड. की परीक्षाओं में शत-प्रतिशत प्रामाणिक अंक प्राप्त करने के लिए वायगोत्स्की द्वारा दिए गए निम्नलिखित तीन विधिक तकनीकी शब्दों को गहराई से समझना और उत्तर पुस्तिका में लिखना अनिवार्य है:
क. समीपस्थ विकास का क्षेत्र (Zone of Proximal Development - ZPD):
ZPD वायगोत्स्की के सिद्धांत का सबसे केंद्रीय संप्रत्यय है। यह बच्चे की सीखने की क्षमता के दो स्तरों के बीच का एक गत्यात्मक खाली क्षेत्र (Gap) है:
- वास्तविक विकास का स्तर (Level of Actual Development): वह सीमा जहाँ तक बच्चा बिना किसी बाह्य सहायता या मदद के, स्वयं स्वतंत्र रूप से किसी समस्या का समाधान कर सकता है।
- संभावित विकास का स्तर (Level of Potential Development): वह सर्वोच्च सीमा जहाँ तक बच्चा समाज के किसी कुशल मार्गदर्शक, शिक्षक या योग्य सहपाठी के सहयोग से पहुँच सकता है।
इन दोनों स्तरों के बीच का जो अंतर या क्षेत्र होता है, उसे ही समीपस्थ विकास का क्षेत्र (ZPD) कहा जाता है। इसी क्षेत्र के भीतर वास्तविक और गुणात्मक शिक्षण-अधिगम संभव होता है।
ZPD का गणितीय सूत्र स्वरूप:
$$\text{ZPD} = \text{संभावित विकास का स्तर (Potential Level)} - \text{वास्तविक विकास का स्तर (Actual Level)}$$
ख. पाड़, ढांचा, मचान या स्काफ़ोल्डिंग (Scaffolding):
ZPD के भीतर बच्चे को संभावित विकास के स्तर तक पहुँचाने के लिए किसी वयस्क या शिक्षक द्वारा जो अस्थायी सहायता (Temporary Support) दी जाती है, उसे मनोविज्ञान में 'पाड़', 'ढांचा' या 'स्काफ़ोल्डिंग' (Scaffolding) कहा जाता है।
स्काफ़ोल्डिंग की मुख्य वैज्ञानिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- यह सहायता स्थायी नहीं होती। जैसे ही बच्चा स्वयं उस कार्य को करने में सक्षम होने लगता है, शिक्षक इस सहायता को धीरे-धीरे कम करके पूरी तरह हटा लेता है।
- इसके रूपों में बच्चे को सीधे उत्तर बताना शामिल नहीं है, बल्कि उसे संकेत देना (Hints), सुराग देना, समस्या को छोटे टुकड़ों में तोड़ना, प्रोत्साहित करना, और जहाँ बच्चा अटक रहा हो वहाँ आधा समाधान करके दिखाना शामिल है।
- व्यावहारिक उदाहरण: जब एक छोटा बच्चा साइकिल चलाना सीखता है, तो उसके पिता शुरुआत में पीछे से साइकिल के करियर को पकड़ते हैं (अस्थायी सहायता/पाड़)। जैसे ही बच्चा पैडल मारकर संतुलन बनाना सीख जाता है, पिता करियर को धीरे से छोड़ देते हैं। यही स्काफ़ोल्डिंग है।
ग. अधिक ज्ञानवान अन्य (More Knowledgeable Other - MKO):
MKO से तात्पर्य समाज के किसी भी ऐसे व्यक्ति से है, जिसके पास सीखने वाली विशिष्ट कला, संप्रत्यय या विषय में शिक्षार्थी से अधिक ज्ञान, अनुभव या बौद्धिक क्षमता होती है।
- MKO केवल स्कूल का कड़ा शिक्षक या माता-पिता ही हों, यह आवश्यक नहीं है।
- यदि कक्षा का कोई सहपाठी (Peer) गणित के सवालों को हल करने में आपसे अधिक कुशल है, तो वह आपके लिए MKO है। वर्तमान कंप्यूटर युग में यदि कोई छोटा बच्चा अपने दादाजी को मोबाइल चलाना सिखा रहा है, तो वह बच्चा अपने दादाजी के लिए MKO की भूमिका निभा रहा है।
4. भाषा और चिंतन का क्रमिक विकास (Language and Thought)
भाषा और चिंतन के अंतर्संबंधों को लेकर पियाजे और वायगोत्स्की में कड़ा वैचारिक मतभेद था। पियाजे का मानना था कि विचार (Thought) पहले आता है और भाषा बाद में, अर्थात विचार भाषा को निर्धारित करता है। उन्होंने छोटे बच्चों द्वारा स्वयं से की जाने वाली बातचीत को 'आत्म-केंद्रित भाषा' (Egocentric Speech) कहा और उसे संज्ञानात्मक रूप से निरर्थक माना।
इसके विपरीत, वायगोत्स्की ने प्रतिपादित किया कि शुरुआती दो वर्षों तक बालक के भीतर भाषा और चिंतन दोनों पूरी तरह स्वतंत्र रूप से अलग-अलग समानांतर रेखाओं में चलते हैं। लगभग तीन वर्ष की आयु के आसपास ये दोनों रेखाएँ आपस में मिल जाती हैं और भाषा चिंतन का मुख्य माध्यम बन जाती है। वायगोत्स्की ने भाषाई विकास के तीन मुख्य चरण बताए हैं:
- 1. सामाजिक वाक (Social Speech - जन्म से 2 वर्ष): इसमें बच्चा समाज के लोगों से अपनी जैविक आवश्यकताओं को व्यक्त करने, रोने, हंसने या प्राथमिक संवाद गढ़ने के लिए बाह्य ध्वनि और भाषा का उपयोग करता है। इसका संज्ञान से सीधा संबंध नहीं होता।
- 2. निज वाक या आंतरिक वैयक्तिक वाक (Private Speech - 3 से 7 वर्ष): यह वायगोत्स्की के सिद्धांत की सबसे सुंदर खोज है। जब बच्चा किसी कठिन कार्य या खेल को खेलते समय स्वयं से जोर-जोर से बातें करता है, तो उसे निज वाक (Private Speech) कहते हैं। वायगोत्स्की के अनुसार, बच्चा यहाँ पागलपन में बात नहीं कर रहा होता, बल्कि वह भाषा के माध्यम से अपने स्वयं के कार्यों को दिशा (Self-direction) देने, अपनी योजनाओं को नियंत्रित करने, और अपनी सोच को सुव्यवस्थित करने का प्रयास करता है। इसलिए प्रोग्रेसिव स्कूल में शिक्षकों को बच्चों के इस निज वाक को डाँटकर बंद नहीं कराना चाहिए।
- 3. आंतरिक मौन वाक (Inner Speech - 7 वर्ष से ऊपर): जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, उसका निज वाक बिना आवाज के मस्तिष्क के भीतर शांत चिंतन के रूप में रूपांतरित हो जाता है। अब वह मन ही मन बिना होंठ हिलाए अपनी योजनाओं पर विचार करने में सक्षम हो जाता है।
5. जीन पियाजे बनाम लेव वायगोत्स्की: कड़ा वैचारिक अंतर
बिहार डी.एल.एड. और बी.एड. के प्रशिक्षुओं की परीक्षाओं में इन दोनों रचनावादी मनोवैज्ञानिकों के दृष्टिकोणों का तुलनात्मक विश्लेषण बार-बार पूछा जाता है। इसे नीचे दी गई एक सरल रॉ-तालिका (बिना किसी सीएसएस के) के माध्यम से स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है:
| तुलना का आधार | जीन पियाजे का दृष्टिकोण (PIAGET) | लेव वायगोत्स्की का दृष्टिकोण (VYGOTSKY) |
|---|---|---|
| रचनावाद की प्रकृति | यह विकासात्मक और 'संज्ञानात्मक/व्यक्तिगत रचनावाद' है। | यह पूरी तरह से 'सामाजिक रचनावाद' (Social Constructivism) है। |
| विकास व अधिगम का क्रम | विकास पहले होता है (परिपक्वता से) और अधिगम बाद में आता है। | अधिगम (सीखना) पहले होता है, जो विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। |
| समाज और संस्कृति की भूमिका | संज्ञानात्मक विकास में समाज और संस्कृति का स्थान बहुत गौण या न्यूनतम है। | संज्ञानात्मक विकास का मुख्य आधार ही सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश है। |
| भाषा और विचार का संबंध | विचार पहले जन्म लेता है, भाषा विचार के अधीन और पीछे चलती है। | भाषा और विचार शुरू में स्वतंत्र होते हैं, बाद में भाषा चिंतन का साधन बनती है। |
| निज वाक (Private Speech) | इसे 'आत्म-केंद्रित भाषा' (Egocentric) मानकर संज्ञानात्मक रूप से व्यर्थ माना। | इसे बच्चे द्वारा स्व-नियमन (Self-regulation) का सबसे बड़ा उपकरण माना। |
| शिक्षक की भूमिका | शिक्षक केवल एक 'सुविधादाता' है जो बच्चों को स्वतंत्र प्रयोग के अवसर देता है। | शिक्षक एक MKO और मार्गदर्शक है जो ZPD के भीतर पाड़ (Scaffolding) देता है। |
6. वायगोत्स्की के सिद्धांत की समकालीन आलोचनाएँ (Critical Review)
यद्यपि वायगोत्स्की का सिद्धांत वर्तमान बाल-केंद्रित शिक्षा व्यवस्था का मुख्य संबल है, फिर भी कुछ मनोवैज्ञानिकों द्वारा इसकी निम्नलिखित सीमाओं की ओर संकेत किया गया है:
- जैविक व आनुवंशिक पक्षों की उपेक्षा: आलोचकों का मानना है कि वायगोत्स्की ने बच्चे के संज्ञानात्मक विकास में समाज और संस्कृति को इतना अधिक महत्व दे दिया कि उन्होंने बच्चे के मस्तिष्क के जैविक विकास, परिपक्वता, और जन्मजात आनुवंशिक (Genetic) क्षमताओं की पूरी तरह उपेक्षा कर दी।
- आयु-वार चरणों का अभाव: पियाजे की भाँति वायगोत्स्की ने विकास के किसी निश्चित आयु-वार चरणों का निर्धारण नहीं किया, जिससे यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि किस विशिष्ट उम्र में बच्चे की मानसिक क्षमता का आंतरिक स्वरूप कैसा होता है।
- वैयक्तिक शैलियों की अनदेखी: यह सिद्धांत कई बार उन बच्चों की व्यक्तिगत सीखने की शैलियों की अनदेखी करता है जो बिना किसी सामाजिक सहयोग के, पूरी तरह एकांत में स्वाध्याय द्वारा उच्च संज्ञानात्मक लक्ष्य हासिल करते हैं।
7. शिक्षकों के लिए इस अध्याय के व्यावहारिक शैक्षिक निहितार्थ (Educational Implications)
लेव वायगोत्स्की का सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत मैकाले की पारंपरिक, शुष्क और यांत्रिक रटंत प्रणालियों को समूल नष्ट करने के लिए आधुनिक शिक्षकों को निम्नलिखित पाँच क्रांतिकारी शिक्षण रणनीतियाँ प्रदान करता है:
- सहयोगात्मक अधिगम (Collaborative and Cooperative Learning): शिक्षक को कक्षा कक्ष में केवल एकतरफा व्याख्यान देने से बचना चाहिए। शिक्षक को छात्रों को छोटे-छोटे मिश्रित योग्यता समूहों (Mixed-ability Groups) में बांटकर उन्हें सामूहिक प्रोजेक्ट, व्यावहारिक असाइनमेंट और समस्या समाधान के कार्य देने चाहिए। जब बच्चे आपस में विमर्श करते हैं, तो वे एक-दूसरे के लिए MKO की भूमिका निभाते हैं और उनके संज्ञान का तीव्र संवर्धन होता हैं।
- पारस्परिक शिक्षण (Reciprocal Teaching): यह वायगोत्स्की के सिद्धांतों पर आधारित एक अचूक प्रविधि है, जो विशेषकर पठन कौशल (Reading Skill) को सुधारने में काम आती है। इसमें शिक्षक और छात्रों का समूह मिलकर किसी गद्यांश को पढ़ता है। इस प्रक्रिया में चार क्रमिक चरण काम करते हैं—प्रश्न पूछना (Questioning), सारांश बनाना (Summarizing), स्पष्ट करना (Clarifying), और भावी पूर्वानुमान लगाना (Predicting)। इसमें छात्र बारी-बारी से शिक्षक की भूमिका निभाते हैं, जिससे उनकी भाषाई और तार्किक क्षमता अत्यंत पुष्ट हो जाती है।
- कक्षा कक्ष में स्काफ़ोल्डिंग (Scaffolding) का सटीक उपयोग: एक कुशल शिक्षक को यह भली-भाँति जानना चाहिए कि बच्चे को कब, कहाँ और कितनी सहायता देनी है। जब कोई छात्र किसी गणितीय सूत्र या विज्ञान के संप्रत्यय पर अटक जाए, तो उसे सीधे दंडित करने या पूरा उत्तर बताने के बजाय शिक्षक को उसे छोटे-छोटे संकेत (Hints) देने चाहिए, पुराने पाठों का संदर्भ याद दिलाना चाहिए, या समस्या को सरल अंशों में तोड़ देना चाहिए। जैसे ही छात्र का आत्मविश्वास बढ़े, शिक्षक को अपनी सहायता वापस ले लेनी चाहिए।
- शिक्षार्थी के ZPD की सही पहचान: शिक्षक का यह प्राथमिक व्यावसायिक उत्तरदायित्व है कि वह सतत एवं व्यापक मूल्यांकन (CCE) के माध्यम से अपनी कक्षा के प्रत्येक बच्चे के वास्तविक विकास के स्तर (वह अकेले क्या कर सकता है) और उसके समीपस्थ विकास के क्षेत्र (ZPD) की सटीक पहचान करे। पाठ्यक्रम और गतिविधियों का निर्माण हमेशा बच्चे के ZPD के भीतर होना चाहिए। यदि कार्य बहुत सरल होगा, तो बच्चा कुछ नया नहीं सीखेगा; यदि कार्य बच्चे के ZPD से बहुत बाहर (अत्यंत कठिन) होगा, तो बच्चा कुंठा और तनाव का शिकार हो जाएगा।
- मातृभाषा और बहुभाषिकता को संसाधन मानना (Multilingualism as a Resource): वायगोत्स्की का सिद्धांत यह कड़ा नीतिगत निर्देश देता है कि प्राथमिक विद्यालयों में हाशियाकृत, ग्रामीण, या वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चों की मातृभाषा या घरेलू बोली (Home Language) पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए और न ही उसका उपहास उड़ाया जाना चाहिए। मातृभाषा ही बच्चे के मस्तिष्क में विचारों को गढ़ने का पहला सांस्कृतिक उपकरण है। कक्षा में बहुभाषिकता को एक 'समस्या' के स्थान पर एक समृद्ध 'संसाधन' के रूप में स्वीकार कर बच्चों को खुलकर अपने निज वाक और सामाजिक वाक का प्रयोग करने का लोकतांत्रिक अवसर मिलना चाहिए।
निष्कर्ष (Conclusion):
लेव वायगोत्स्की का सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य हमें यह अमूल्य और मानवीय चेतना प्रदान करता है कि बच्चों का संज्ञानात्मक विकास किसी जड़ डिब्बे में बंद होकर नहीं होता, बल्कि यह समाज के सहयोग, संस्कृति के उपकरणों, और भाषा के जीवंत संवादों से निर्मित होने वाला एक सुंदर और गतिशील महल है। रटंत विद्या के कड़े निषेध और समतामूलक, समावेशी शिक्षा के निर्माण में वायगोत्स्की के विचार आज भी सबसे बड़े मार्गदर्शक हैंं।
एक भावी राष्ट्र-निर्माता प्रोग्रेसिव शिक्षक के रूप में, आपका यह नैतिक उत्तरदायित्व है कि आप औपनिवेशिक काल के कड़े अनुशासन, मूक कक्षाओं, और परीक्षाओं के आतंक को समूल नष्ट करें। जब आप अपनी समावेशी कक्षा को एक लोकतांत्रिक प्रयोगशाला (Miniature Society) के रूप में रूपायित करेंगे, जहाँ प्रत्येक छात्र को अपने सहपाठियों के साथ अंतःक्रिया करने, खुलकर प्रश्न पूछने, और शिक्षक की स्काफ़ोल्डिंग की मदद से अपने ZPD के सर्वोच्च शिखर को छूने का गरिमापूर्ण अवसर प्राप्त होगा, तभी वास्तविक अर्थों में एक समतामूलक, न्यायपूर्ण और प्रगतिशील प्रजातांत्रिक राष्ट्र का स्वप्न साकार हो सकेगां।
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