एस.सी.ई.आर.टी. (SCERT), बिहार के डी.एल.एड. (D.El.Ed.) पाठ्यक्रम के आधिकारिक पत्र "S-5 : विद्यालय में स्वास्थ्य, योग एवं शारीरिक शिक्षा" के द्वितीय इकाई "खेल एवं खेलकूद" के नौवें अध्याय "खो-खो (Kho-Kho)" का संपूर्ण प्रामाणिक एवं परीक्षा-उन्मुख विस्तृत नोट्स नीचे दिया गया है।
1. खो-खो का इतिहास व सांगठनिक विकास (History & Evolution)
खो-खो पूर्ण रूप से एक पारम्परिक भारतीय खेल है, जिसकी जड़ें प्राचीन काल से भारतवर्ष में गहरी जमी हुई हैं। इस खेल के प्रादुर्भाव और विकास का वास्तविक श्रेय विधिक रूप से महाराष्ट्र राज्य को दिया जाता है। आरम्भ में इस खेल के नियम अत्यंत शिथिल थे; मैदान का कोई निश्चित माप नहीं था और स्तम्भों (पोस्ट) की संख्या भी तय नहीं थी। खेल को वैज्ञानिक और नियमबद्ध स्वरूप देने के लिए **सन् 1955 में भारतीय खो-खो संघ (Kho-Kho Federation of India - KKFI)** का सुगठित गठन किया गया।
अंतर्राष्ट्रीय विस्तार: भारतीय खो-खो संघ की स्थापना के बाद सन् 1960 में प्रथम राष्ट्रीय खो-खो पुरुष प्रतियोगिता का सफल आयोजन हुआ। इसके अगले ही वर्ष, सन् 1961 में कोल्हापुर राष्ट्रीय प्रतियोगिता में महिलाओं को भी विधिक रूप से शामिल कर जेंडर समावेशन को बढ़ावा दिया गया। खो-खो के प्रसार के लिए सन् 1982 में दिल्ली में आयोजित 9वें एशियाई खेलों के दौरान इसे प्रदर्शन मैच के रूप में प्रदर्शित किया गया, जिसके बाद बंगलादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका और नेपाल जैसे एशियाई देशों में यह खेल बड़े चाव से खेला जाने लगा।
---2. खेल का मैदान एवं विधिक परिमाप (Court Dimensions)
वरिष्ठ (Seniors) वर्ग के लिए खो-खो का क्रीड़ा क्षेत्र पूर्णतः आयताकार होता है। मैदान की विधिक लंबाई 27 मीटर तथा चौड़ाई 16 मीटर होती है। मैदान के दोनों सुदूर अंत में दो आयताकार क्षेत्र होते हैं जिन्हें विधिक भाषा में मुक्त क्षेत्र (Free Zone Area) कहा जाता है; इसकी भुजा 16 मीटर × 1.50 मीटर होती है। इन दोनों मुक्त क्षेत्रों के मध्य में लकड़ी के दो मजबूत स्तम्भ गाड़े जाते हैं।
---3. तकनीकी शब्दावली का शास्त्रीय संप्रत्यय (Technical Terms)
- स्तम्भ या पोस्ट (Post): मध्य लेन के दोनों छोरों पर गाड़े जाने वाले दो स्तम्भ, जो भूमि से 1.20 मीटर से 1.25 सेंटीमीटर के बीच ऊँचे होते हैं और जिनकी परिधि 30 सेंटीमीटर से अधिक नहीं हो सकती।
- केन्द्रीय गली या लेन (Centre Lane): दोनों स्तम्भों के ठीक मध्य में स्थित पट्टी को केन्द्रीय गली कहते हैं। इसकी कुल लंबाई 24 मीटर तथा चौड़ाई 30 सेंटीमीटर होती है जो मैदान को दो बराबर अर्धकों में विभाजित करती है।
- क्रॉस लेन (Cross Lane): केन्द्रीय लेन को समकोण (90 डिग्री) पर काटने वाली प्रत्येक आयताकार पट्टी को क्रॉस लेन कहते हैं। इसकी लंबाई 16 मीटर व चौड़ाई 30 सेमी होती है। मैदान में ऐसी कुल 8 क्रॉस लाइन होती हैं, जहाँ अनुधावक बैठते हैं।
- अनुधावक या चेज़र (Chaser): क्रॉस लेन के वर्गों (ब्लॉक्स) में एक-दूसरे के विपरीत मुँह करके बैठे खिलाड़ी अनुधावक कहलाते हैं। विरोधी को पकड़ने के लिए सक्रिय रूप से भागने वाले चेज़र को सक्रिय अनुधावक (Active Chaser) कहते हैं।
- धावक या रनर (Runner): चेज़रों के विरोधी खिलाड़ी जो मैदान में अपनी रक्षा हेतु दौड़ते हैं, उन्हें धावक या रनर कहा जाता है। ये तीन-तीन के समूह में मैदान में प्रवेश करते हैं।
- खो देना (To Give Kho): बैठे हुए साथी चेज़र को पीछे से हाथ के हथेली द्वारा स्पर्श करते हुए ऊँचे और स्पष्ट स्वर में 'खो' शब्द कहना खो देना कहलाता है। छूने और मुख से आवाज निकलने का समय विधिक रूप से एक-साथ होना अनिवार्य है।
4. खेल के विधिक नियम, मैच निर्णायक व समय चक्र (Rules & Officials)
समय चक्र (Time Duration): खो-खो का मैच दो पारियों (Innings) का होता है। प्रत्येक पारी में दौड़ने और पीछा करने का काम बारी-बारी से होता है। वरिष्ठ वर्ग के लिए खेल का समय 9-5-9 मिनट (9 मिनट खेल, 5 मिनट विश्राम, 9 मिनट खेल) का टर्न होता है। दो पारियों के मध्य 3 मिनट का मध्यान्तर होता है। जूनियर वर्ग के लिए यह समय चक्र 7-5-7 मिनट का निर्धारित है। एक टीम में कुल 12 खिलाड़ी होते हैं परंतु मैदान में केवल 9 खिलाड़ी ही भाग लेते हैं।
मैच निर्णायक (Match Officials): मैच के विधिक संचालन हेतु 1 रेफरी, 2 अम्पायर, 1 समयपाल (Timekeeper) और 1 स्कोरर (Scorer) विधिक रूप से नियुक्त किए जाते हैं। अम्पायर फाउल की घोषणा करते हैं; रेफरी स्कोरशीट की जाँच व टॉस कराता है; समयपाल सीटी बजाकर टर्न के समय का नियमन करता है और स्कोरर आउट धावकों के अंकों का हिसाब रखता है।
---5. फाऊल के प्रतिमान एवं 4 मुख्य दोष (Fouls & Core Faults)
जब बैठा हुआ या सक्रिय अनुधावक खेल के विधिक नियमों का उल्लंघन करता है, तो उसे फाऊल (Fault) करार दिया जाता है। खो-खो के अंतर्गत आने वाले 4 मुख्य दोष निम्नलिखित हैं:
- 1. मुँह मोड़ना (Changing Shoulder Direction): सक्रिय अनुधावक जब एक विशेष दिशा (एक स्तम्भ से दूसरे स्तम्भ की ओर) में जाते समय अपने कंधे की रेखा को 90 डिग्री के कोण से अधिक विपरीत दिशा में मोड़ लेता है, तो इसे मुँह मोड़ना कहते हैं जो एक कड़ा फाउल है।
- 2. निवर्तन या पलटना (Receding / Turning Back): किसी निश्चित दिशा की ओर जाता हुआ सक्रिय अनुधावक जब चलते-चलते अचानक विपरीत दिशा में कदम पीछे खींच लेता है या पलट जाता है, तो उसे निवर्तन दोष माना जाता है।
- 3. केन्द्रीय गली को छूना (Touching Centre Lane): दौड़ते या खो देते समय सक्रिय चेज़र के शरीर का कोई भी अंग या पैर केन्द्रीय गली (सेन्टर लाइन) को लांघता या स्पर्श करता है, तो वह विधिक रूप से दोष है। उसे अगली क्रॉस लेन पर जाकर ही खो देना होता है।
- 4. गलत तरीके से खो देना (Improper Kho): मुख से 'खो' शब्द की आवाज निकलने से पहले ही वर्ग में बैठे खिलाड़ी का उठ जाना, या बिना छुए केवल आवाज देना, अथवा छूने और बोलने के समय में अंतर होना फाउल की श्रेणी में आता है। इसके अतिरिक्त यदि रनर के दोनों पैर सीमा रेखा से बाहर चले जाएँ, तो उसे पाँव बाहर (Out of Bounds) के तहत आउट माना जाता है।
6. खो-खो के सांगठनिक व तकनीकी मापदंडों का एकीकृत ढांचा
उत्तर लेखन की दृश्यता को पुख्ता करने के लिए खो-खो के विधिक परिमापों को नीचे एक सरल रॉ-तालिका (बिना किसी सीएसएस के) के माध्यम से संकलित किया गया है:
| क्र.सं. | खो-खो विधिक मापदंड घटक | वरिष्ठ वर्ग (Seniors/S. Men) | कनिष्ठ वर्ग (Juniors) |
|---|---|---|---|
| 1 | मैदान का कुल परिमाप (Court Dimensions) | 27 मीटर × 16 मीटर | 23 मीटर × 14 मीटर |
| 2 | स्तम्भों के मध्य की दूरी (Post to Post) | 24 मीटर | 20 मीटर |
| 3 | मुक्त क्षेत्र का आकार (Free Zone Area) | 16 मीटर × 1.50 मीटर | 14 मीटर × 1.50 मीटर |
| 4 | क्रॉस लेन ब्लॉक्स का आकार (Sit Block) | 35 सेमी × 30 सेमी | 30 सेमी × 30 सेमी |
| 5 | समय चक्र प्रति टर्न (Time Per Turn) | 9 मिनट | 7 मिनट |
| 6 | कुल खिलाड़ी संख्या (मैदान + अतिरिक्त) | 12 खिलाड़ी (9 + 3) | 12 खिलाड़ी (9 + 3) |
7. प्रोग्रेसिव शिक्षक के लिए व्यावहारिक शैक्षिक निहितार्थ
बिहार के प्राथमिक विद्यालयों के रचनावादी यथार्थ में एक प्रगतिशील शिक्षक को निम्नलिखित रणनीतियाँ अपनानी चाहिए:
- 3Rs के स्थान पर 7Rs पेडागोजी: खो-खो के मैदान के विधिक मापों, ब्लॉकों के ज्यामितीय ढाँचे और समय चक्र के अंकों को सिखाते समय शिक्षक को बच्चों को रटंत प्रणाली के स्थान पर खेल-खेल में तार्किक 7Rs (Reading, Writing, Arithmetic, Right, Responsibility, Relationship, Recreation) के मार्ग पर ले जाना चाहिए।
- जेंडर रूढ़िवादिता का कड़ा प्रतिवाद (Deconstructing Gender Stereotypes): शिक्षक को खेल मैदान पर यह कड़ाई से सुनिश्चित करना होगा कि खो-खो में लड़कियों और लड़कों दोनों को समान रूप से सक्रिय अनुधावक (Active Chaser) बनने, मुँह मोड़ने व निवर्तन के विधिक नियमों को सीखने और टीम का नेतृत्व (Leadership) करने के बराबर लोकतांत्रिक अवसर मिलें।
- Evaluation का रचनात्मक प्रतिमान (CCE): इन कौशलों का मूल्यांकन लिखित परीक्षा से संभव नहीं है। शिक्षक को सतत एवं व्यापक मूल्यांकन (CCE) के तहत खेल के दौरान बच्चों की गामक चपलता, त्वरित निर्णय क्षमता, आत्म-अनुशासन और नियमों के प्रति वफादारी का सूक्ष्म अवलोकन (Observation) कर पोर्टफोलियो में दर्ज करना चाहिए।
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8. निष्कर्ष (Conclusion)
खो-खो खेल का इतिहास, भारतीय खो-खो संघ १९५५ के विधिक प्रतिमान, कोर्ट का परिमाप, तकनीकी शब्दावलियाँ (चेज़र, रनर, खो देना) तथा ४ मुख्य दोषों (मुँह मोड़ना, निवर्तन) का यह सांगोपांग अध्ययन हमें यह अमूल्य चेतना प्रदान करता है कि "खो-खो केवल एक दौड़ने का खेल नहीं है, बल्कि यह बच्चों के भीतर गामक चपलता, तीक्ष्ण संज्ञान, न्यूरोमस्कुलर समन्वय, संवेगात्मक स्थिरता और तात्कालिक निर्णय क्षमता गढ़ने की सर्वोत्कृष्ट प्रोग्रेसिव प्रयोगशाला है"। जब एक भावी प्रोग्रेसिव शिक्षक इन विधिक और वैज्ञानिक नियमों को बाल-केंद्रित शिक्षाशास्त्र के साथ एकीकृत करता है; तभी वास्तविक अर्थों में प्रत्येक शिक्षार्थी आत्मनिर्भर व अनुशासित नागरिक बनता है, और एक समतामूलक प्रगतिशील भारत की नींव सुदृढ़ होती है।
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